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मिलिए, स्ट्रीट डॉग व एनिमल लवर्स से, ये बने बेजुबान पशु-पक्षियों का सहारा..

कोई अगर डॉग्स को परेशान कर रहा है या मार रहा है तो वे इसकी शिकायत भी करते हैं और इसके लिए लड़ भी पड़ते हैं। कुछ ऐसा ही मदद और सेवा का जज्बा है शहर के स्ट्रीट डॉग लवर्स का।

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मधुलिका सिंह/उदयपुर. अगर सड़क पर किसी स्ट्रीट डॉग को दर्द में कराहते हुए देखेंगे तो ये उसकी मरहम पट्टी करेंगे और अस्पताल ले जाकर वेटरनरी डॉक्टर से इलाज कराएंगे, गर्मियों में स्ट्रीट डॉग्स के लिए जगह-जगह पानी और खाने की व्यवस्था करेंगे, वहीं सर्दियों व बारिश में इनके लिए पेट हाउस या शेड्स बना कर शहर भर में रखेंगे। कोई अगर डॉग्स को परेशान कर रहा है या मार रहा है तो वे इसकी शिकायत भी करते हैं और इसके लिए लड़ भी पड़ते हैं। कुछ ऐसा ही मदद और सेवा का जज्बा है शहर के स्ट्रीट डॉग लवर्स का। कुछ लोग ग्रुप बना कर इनके लिए काम कर रहे हैं तो कुछ अकेले ही इनकी मदद में जुटे हुए हैं। आइए आपको कुछ ऐसे ही युवा स्ट्रीट डॉग लवर्स से मिलवा रहे हैं जो पशु-पक्षियों का सहारा बन कर खड़े हैं:

अब तक 2000 से अधिक का कर चुके रेस्क्यू, रोज खिला रहे खाना - डिम्पल

उदयपुर एनिमल फीड संस्था की फाउंडर डिम्पल भावसार ने बताया कि उन्होंने वर्ष 2019 में पशु-पक्षियों का दर्द समझते हुए उनके खाने-पीने की व्यवस्था के लिए ये मुहिम शुरू की। इसमें उनकी टीम के सदस्य शहर भर में घूम-घूमकर पक्षियों और सभी पशुओं के लिए खाने के अलावा गर्मी, सर्दी व बारिश से बचाव के लिए उनके रहने के लिए भी पेट हाउस रखते हैं। वहीं, जहां कभी घायल पशु व पक्षी मिलते हैं उन्हें अस्पताल भी ले जाते हैं और उनके ठीक होने तक ख्याल भी रखते हैं। इस मुहिम में उनके भाई रवि के साथ करीब 150 युवा सदस्य हैं। अब तक वे 2000 से अधिक घायल पशु-पक्षियों का रेस्क्यू कर चुके हैं। साथ ही 50 से अधिक डॉग्स को अडॉप्ट करवाया है।

इनकी जिंदगियां बेहतर करने के लिए 24 घंटे भी कम: चांदनी

भट्टियानी चौहट्टा निवासी चांदनी सोनी भी पिछले 6 साल से स्ट्रीट डॉग्स की सेवा में जुटी हुई है। चांदनी ने बताया कि कॉलेज जाते समय एक दिन एक डॉग और उसके बच्चों को देखा, उनकी हालत अच्छी नहीं थी तो उनको देखकर दिल पसीज गया। उनके लिए तुरंत खाने-पीने की व्यवस्था की। कुछ दिन बाद ना तो मां रही और ना उसके बच्चे, केवल एक बच्चा बच गया। उसे ही लेकर घर आ गई और तब से सभी स्ट्रीट डॉग्स को रेस्क्यू करने व उनके लिए खाने की व्यवस्था का जिम्मा उठा लिया। सपोर्ट स्ट्रे के नाम से संस्था शुरू कर दी है। अब तक 200 से ऊपर डॉग्स, गायों का रेस्क्यू, वैक्सीनेशन, उनके लिए पानी, खाना, बिस्तर आदि की व्यवस्था की है, ताकि उनकी जिंदगी भी अच्छी हो सके। इसके लिए शायद 24 घंटे भी कम हैं।

स्ट्रीट डॉग्स के लिए सीखा फर्स्ट एड, ली ट्रेनिंग - रानी

राजसमंद के कांकरोली में रहने वाली रानी पिछले 8-9 सालों से बेसहारा और बेजुबानों की आवाज और सेवादार बनी हुई हैं। वे बताती है कि मूलत: कोलकाता से हूं। यहां पति की जॉब है इसलिए यहां काफी समय से हैं। उन्होंने बताया कि मुझे सब रानी के नाम से जानते हैं। पहले मैं सिर्फ स्ट्रीट डॉग्स को रेस्क्यू कर, खाना खिलाने और अस्पताल पहुंचाने तक का काम करती थी। लेकिन अधिकतर डॉग्स ऐसे होते थे जिन्हें अस्पताल ले जाना संभव नहीं होता था, कई बार अस्पताल वाले भी मना कर देते थे, ऐसे में उदयपुर की एनिमल एड संस्था में जाकर फर्स्ट एड की ट्रेनिंग ली। इसके बाद डिप्लोमा भी किया, ताकि घायलों का इलाज अच्छे से कर सकूं। लोगों को जैसे-जैसे पता चला, वैसे-वैसे वे ऐसे बेजुबानों को खुद-ब-खुद मेरे पास लाने लगे। ज्यादा सीरियस कंडीशन होने पर उन्हें उदयपुर रैफर करती हूं।

घायल पशु-पक्षी दर्द नहीं बता सकते लेकिन हम समझ तो सकते हैं : माला

शहर की एनिमल लवर डॉ.माला मट्ठा पिछले 13 सालों से मूक पशुओं के लिए सेवा कार्य में जुटी हुई है। उन्होंने इसके लिए एनिमल प्रोटेक्शन सोसायटी भी शुरू की है, जिसमें करीब 80 से अधिक सदस्य जुडे हैं। उन्होंने बताया कि अपने मां-पिता को भी पशुओं को खाना खिलाते हुए देखा। कोरोना में काफी पशु खाने-पीने को तरस गए। हम हर दिन हजार से दो हजार पशुओं काे खाना बना कर खिलाते थे। अब आसपास के 100 किमी. के दायरे के पशुओं व पक्षियों का रेस्क्यू करते हैं, उनका इलाज कराते हैं। गौरेया बचाओ अभियान भी चला रहे हैं। कुछ दिन पूर्व ही करंट से एक बंदर का बच्चा घायल हो गया था। इसकी सूचना पर वह अपनी टीम के सदस्य गौरव पाण्डे के साथ गुड़ली क्षेत्र पहुंची और मौके पर घायल बंदर की सुध ली। उन्होंने वन अधिकारी जीएल गोठवाल के सहयोग से घायल बच्चे को आईसीयू में भर्ती किया, जहां पशु चिकित्सकों ने तुरंत उपचार शुरू किया।

इनकी जिंदगी भी है कीमती : रूपीना

इसी तरह सिख कॉलोनी निवासी रूपीना अरोड़ा को पशु पक्षियों की सेवा-सहायता करते हुए करीब 18 साल हो चुके हैं। रूपीना ने बताया कि जिस तरह इंसान की जिंदगी कीमती होती है, उसी तरह हर पशु-पक्षी का जीवन भी बहुत कीमती है। कई लोग मूक जानवरों को मजे-मस्ती के लिए बहुत सताते हैं या उन्हें चोट पहुंचाते हैं। वहीं, कई बार गाडि़यों की टक्कर, बिजली तारों के करंट से वे घायल हो जाते हैं। ऐसे में अपना कर्त्तव्य समझ कर वे इनके लिए खाने-पीने व इलाज की व्यवस्था करती हैं। वे मानती हैं कि लोगों को भी इन मूक प्राणियों के प्रति दयाभाव रखना चाहिए।