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मौत का मेलामाइन: इससे बनता है प्लास्टिक, लेकिन इसे दूध में डालने की सरकार की ‘हांÓ

- भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण ने दे रखी है स्वीकृति - १ पीपीएम की स्वीकृति

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मौत का मेलामाइन: इससे बनता है प्लास्टिक, लेकिन इसे दूध में डालने की सरकार की 'हांÓ

मौत का मेलामाइन: इससे बनता है प्लास्टिक, लेकिन इसे दूध में डालने की सरकार की 'हांÓ

भुवनेश पण्ड्या

उदयपुर. मेलामाइन, जिससे प्लास्टिक बनता है, जो खतरनाक है, इतना कि किसी जहर से कम नहीं, लेकिन इसे दूध या दुग्ध पदार्थाे में मिलाने की सरकार की हां यानी स्वीकृति है। बकायदा इसे दूध संग्रहण कंपनियों से लेकर दुग्ध पदार्थ निर्माता कंपनियां बेरोकटोक इस्तेमाल कर रही हैं। भारतीय खाद्य संरक्षा मानक प्राधिकरण यानी एफएसएसएआई ने इसे स्वीकृति दे रखी है। भारत में खाद्य पदार्थो के मापदण्‍ड भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण द्वारा लागू किये जाते हैं।

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ये है नियम

- मेलामाईन पदार्थ को दूषित पदार्थों के रूप में पाये जाने की अधिकतम मात्रा के मापदण्‍ड का निर्धारण खाद्य संरक्षा एवं मानक अधिनियम 2006 एवं विनियम 2011 कन्‍टामीनेन्‍टस टॉक्सिन्‍स एवं रैसीड्यूस के अन्‍तर्गत नियम 2.5.1 में किया गया है।

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बच्चों के लिए तैयार होने वाले दुग्ध पदार्थों में इस्तेमाल

मेलामाइन का इस्तेमाल खाद्य पदार्थों में किये जाने की सूचना के बीच संयुक्त राष्ट्र की खाद्य मानक इकाई कोडेक्स एलमेन्टेरियस कमीशन ने शिशुओं के लिए तैयार किए जाने वाले मिल्क पाउडर और अन्य आहार में तथा पशुओं के आहार में मेलामाइन के उपयोग को लेकर नये दिशा-निर्देश जारी किए हैं। हालांकि कोई भी देश इन दिशा निर्देशों को लागू करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं होगा।
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विश्व स्वास्थ्य संगठन डब्ल्यूएचओ, की एक नयी रिपोर्ट के अनुसार संयुक्त राष्ट्र की खाद्य मानक इकाई कोडेक्स एलमेन्टेरियस कमीशन के नये दिशा निर्देशों के अनुसार शिशुओं के लिए तैयार किए जाने वाले मिल्क पाउडर में मेलामाइन की मात्रा प्रतिकिलो में एक मिलीग्राम और अन्य आहार तथा पशुओं के लिए इस रसायन की मात्रा 2.5 मिलीग्राम प्रति किलो से अधिक नहीं होनी चाहिये।
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क्या है मेलामाइन
मेलामाइन एक प्रकार का रासायनिक पदार्थ है, इसका इस्तेमाल प्लास्टिक बनाने सहित औद्योगिक प्रक्रिया में किया जाता है। इसका इस्तेमाल क्राकरी बनाने, केन कोटिंग और निशान लगाने आदि में भी होता है। न चाहते हुए भी इसके कुछ अंश भोजन के साथ हमारे शरीर में चले जाते हैं, जो हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं। मेलामाइन क्रॉकरी में जब हम भोजन करते हैं तो न चाहते हुए भी इसके कुछ अंश हमारे शरीर में चले जाते हैं। लंबे समय तक इसका इस्तेमाल करने से यह स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकता है। इससे मुख्य रूप से मूत्राशय क्षतिग्रस्त हो जाता है और कभी-कभी मूत्राशय कैंसर होने का खतरा भी हो जाता है।

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इस पर भी एक नजर:

- एक रिपोर्ट के अनुसार देश में 68.7 दूध को दूषित बताया गया था। 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्य सरकारों को मोबाइल लैब बनाए जाने, नकली दूध के मामलों में फैसला जल्दी करते हुए जुर्माना लगाने के आदेश दिए थे।
- एफ एसएसएआई द्वारा 27 नवंबर, 2018 को जारी किए आदेश के अनुसार उसने 2018 में एक सर्वे किया, इसे वो अब तक का सबसे समुचित सर्वे बताती है। 6400 से ज्यादा कच्चे और प्रोसेस्ड दूध के सेंपल लिए गए, इनको 12 मिलावटों और 4 दूषणों के लिए टेस्ट किया गया। इसमें से केवल दस प्रतिशत से भी कम सेंपल दूषित पाए गए।

- डब्लूएचओ की एडवाईजरी के अनुसार 8 सालों में 2025 तक 87 प्रतिशत भारतियों को कैंसर हो जाएगाण। भारत में बिकने वाले दूधों में मिलावट है, इस दूध को पीने से कैंसर का खतरा है। भारत में बिकने वाले 68.7 प्रतिशत दूध में मिलावट है।
- पशुओं पर किए गए अध्ययन से पता चलता है कि इसकी विषाक्तता कम नही, पशु आहार वाले अध्ययन में मेलामाइन की उच्च खुराक मूत्राशय पर प्रभाव डालती है और सूजन का कारण बनती है। मूत्राशय में स्टोन और क्रिस्टल का कारण बनती है। पशु आहार के अध्ययन से ये भी पता चला है कि लंबी अवधि और उच्च खुराक के बाद ही गुर्दे की विषाक्तता की आशंका बनती है।

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इसलिए घातक:

मेलामाइन के कण गुर्दों में जमा हो जाते हैं। सफेद-सफेद टाइल्स के जैसी पथरी बनाते हैं। इसके संपर्क में आने वाली कोशिकाएं आरओएस नामक केमिकल बनाती हैं, जो खतरनाक कैंसर पैदा करती हैं। इसके ऊपर वर्ष 2015 से लेकर अब तक सैकड़ो रिसर्च पेपर आ चुके हैं।

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एक मिलीग्राम मेलामाइन

भारत में बिकने वाले दूध में मेलामाइन लीगल है। इन्फेंट फॉर्मूला बनाने वाली कोई भी कंपनी अपने मिल्क पाउडर में 1 मिलीग्राम मेलामाइन मिला सकती है। लिक्विड मिल्क में ये लिमिट .15 मिलीग्राम लीटर की है। बाकी सभी खाद्य पदार्थ में ये 2.5 मिलीग्राम किलो के हिसाब से मेलामाइन मिलाने की खुली स्वीकृति है। कई लोगों ने इसका विरोध किया है, लेकिन इस पर निर्णय उच्च स्तर से ही हो सकता है।
रवि से_ी, फूल एनालिस्ट खाद्य सुरक्ष लैब उदयपुर