
उदयपुर . तिनका-तिनका बटोर कर एक आशियाना सुकून के लिए बनाया तो था, लेकिन जीवन मूल्यों एवं संवेदनशीलता में गिरावट के तेज अंधड़ में आखिर बह गया। जीवन का एक बड़ा हिस्सा जिस घर के छप्पर की मजबूती में लगा दिया, जिस आंगन की गुनगुनी धूप में खेलती चिरैया के पंखों की छुअन को लालायित रहे, वह आंगन बीच मझधार में ऐसा छूटा कि मौत के बाद भी नसीब नहीं हो पाया।
मरती संवेदनाओं की ये कहानी ऐसे बुजुर्गों की है, जो रोज की झिझक -झिझक से परेशान होकर घर छोड़ आए, आत्म सम्मान पर रोज चोट से बचने के लिए अपना आंगन छोड़ आए, लेकिन परिजनों ने उन्हें इतना दूर कर दिया कि मृत्यु होने के बाद उन्हें घर ले जाना तक उचित नहीं समझा। चाहे बेटा हो या बेटी या कोई और परिजन, किसी ने भी उनका अंतिम संस्कार नहीं किया।
तारा संस्थान वृ़द्धाश्रम ने किया अंतिम संस्कार
बुजुर्गों की सार संभाल कर रहे कालू भाई ने बताया कि वर्ष 2012 से अब तक आठ लोगों की मौत पर परिजनों ने उन्हें घर ले जाना उचित नहीं समझा। वृद्धाश्रम परिवार ने परिजनों को इसकी सूचना दी, लेकिन इस पर ध्यान नहीं दिया। इनका अंतिम संस्कार वृद्धाश्रम परिवार ने किया।
इनमें जमुना कॉलोनी पुणे की शैलजा राव, जो 26 सितम्बर को 2012 को वृद्धाश्रम में आई थी और 10 अक्टूबर 12 को उनका देहावसान हुआ। इसी प्रकार नई दिल्ली के दिगन्दोनाथ लाहिरी का 2013 में, उदयपुर के रघुनाथसिंह का 2015 में, नई दिल्ली के देवकुमार को 2016 में, नीमच के अनिल दांडेकर का 2013 में, महाराष्ट्र के विवेकानन्द खरे का 2017 में और पुणे की ईश्वरीबाई का वर्ष 2018 में अंतिम संस्कार किया गया।
हम प्रयास करते हैं कि अन्तिम समय पर उनके परिजनों को सूचना दी जाए, जब मृत्यु के काफी देर तक कोई नहीं आता या परिजन ध्यान नहीं देते तो संस्थान की ओर से ऐसे वृद्धजनों का अंतिम संस्कार किया जाता है।
दीपेश मित्तल, सीईओ, तारा संस्थान, उदयपुर
Published on:
08 Feb 2018 05:40 pm

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