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जापान और यूएस में चैरी ब्‍लॉसम की तर्ज पर राजस्‍थान के उदयपुर में मना पलाश पुष्‍पन उत्‍सव

अरावली के खूबसूरत ‘फ्लेम ऑफ द फॉरेस्ट’ कहे जाने वाले पलाश के फूल की खूबसूरती के रंग सब तक पहुंचाने के लिए पहली बार उदयपुर और राजस्थान में पलाश उत्सव मनाया गया

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उदयपुर. जापान और यूएस में जिस तरह चेरी के फूलों के खिलने के बाद चेरी ब्लाॅसम फेस्टिवल मनाया जाता है ठीक उसी तरह दक्षिण राजस्थान में पलाश के पेड़ों के पुष्पित होने की स्थितियों को देखते हुए पलाश महोत्सव आयोजित क‍िया गया। फागुन में अरावली की पहाडि़यों के जंगलों से कभी गुजरें तो इन जंगलों की लाल सुर्खी दूर से नजर आने लगेगी। ऐसे लगेगा जैसे जंगल में आग लग रही हो। जंगल की ये आग कुछ और नहीं बल्कि पलाश के फूलों का शृंगार है। हर ओर इसी के फूल नजर आते हैं शायद इसलिए कवि नरेंद्र शर्मा ने अपनी कविता में लिखा है कि धरती से लेकर आसमां तक यही है और हवा भी इसे छूकर रंगभरी हो जाती है। पलाश ही एक ऐसा फूल है, जो सूरज का भीषण ताप सहकर खिलता है। यही कारण है कि सूरज की लालिमा इसके सुर्ख रंगों में नजर आती है। ये रंग होली के रंगों में घुलकर सबके चेहरों पर भी खिल उठता है। अरावली के इसी खूबसूरत ‘फ्लेम ऑफ द फॉरेस्ट’ कहे जाने वाले फूल की खूबसूरती के रंग सब तक पहुंचाने के लिए पहली बार उदयपुर और राजस्थान में पलाश उत्सव मनाया गया। पिछले साल लॉकडाउन हो जाने के कारण ये उत्सव स्थगित करना पड़ा था।


चले आइए...किटोड़ा के पलाश कुंज में, दिखेगा प्रकृति का होली उत्सव

पलाश के खूबसूरत सुर्ख फूलों को देखने के लिए मेवाड़ के जंगलों की ओर चलना पड़ेगा। पलाश पुष्पन महोत्सव पलाश महोत्सव का आयोजन शहर से मात्र 15 किलोमीटर की दूरी पर अहमदाबाद मार्ग स्थित ग्राम पंचायत देवाली ग्रामीण के किटोड़ा (दईमाता) गांव स्थित पलाश कुंज के वन खण्ड समर में हो रहा है। यहां बहुतायत में पलाश के वृक्ष पाए जाते हैं। इन दिनों पलाश के वृक्ष फूलों से आच्छादित हैं। फूलों के सौन्दर्य एवं प्रकृति के प्रति आमजन में जागरुकता लाने के उद्देश्य से यह आयोजन किया जा रहा है। पर्यावरणी विषयों के जानकार व सूचना उपनिदेशक डॉ. कमलेश शर्मा के अनुसार, ढाक या पलाश का वृक्ष कई जगहों पर आज अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है, लेकिन यह सुखद है कि अरावली की छितराई पहाड़ी वाले मेवाड़-वागड़ के जंगलों में यह वृक्ष आज भी न्यूनाधिक मात्रा में पाया जाता है। उत्तर प्रदेश के राज्यपुष्प के रूप में घोषित पलाश के सुंदर फूल पर भारतीय डाक विभाग ने डाक टिकट भी जारी किया है।

भारतीय संस्कृति में माना गया है पवित्र वृक्ष
वन्य जीव विशेषज्ञ डॉ. सतीश शर्मा के अनुसार, पलाश को खाकरा, ढाक, पलाश, टेसू, किंशुक, छीला, छोला, फ्लेम ऑफ द फ ॉरेस्ट आदि कई नामों से जाना जाता है। इसके पत्ते ‘छोला पत्ता’ एवं फू ल ‘केसूला’ नाम से जाने जाते हैं। पलाश फेबेसी कुल का सदस्य है, इसका वानस्पतिक नाम ब्यूटीया मोनोस्पर्मा है। यह वृक्ष उन भूमियों में उगना पसंद करता है जहां जल निकासी की अच्छी व्यवस्था नहीं होती। राजस्थान में यह वृक्ष अरावली की तलहटियों से लेकर विंध्याचल की तलहटियां व मालवा के पठार तक आती अरावली के अलावा अरावली पर्वतमाला के पूर्व दिशा के मैदानों में पाया जाता है। खुरदरी भूरे रंग की छाल के साथ टेढ़े-मेढ़े तने वाला यह वृक्ष 20 से 40 फ ीट ऊंचाई का मध्यम आकार का वृक्ष है। इसे भारतीय संस्कृति में पवित्र वृक्ष माना जाता है। वेद, पुराण, उपनिषद, सुश्रुत संहिता आदि ग्रंथों में इसका उल्लेख है।


पलाश कई तरह से है उपयोगी -

- पलाश के फूल, पत्तियों, छाल, जड़, बीच व लकड़ी का औषधीय उपयोग होता है। ये घाव भरने, सूजन कम करने, उदर पीड़ा, नेत्ररोग, मधुमेह, कृमिनाशी आदि के उपचारों में काम आते हैं। इसका गोंद, जिसमें टैनिन होता है, बहुत उत्तम श्रेणी का माना जाता है। लाल रंग के इसके गोंद का डायरिया के इलाज में उपयोग होता है।
- इसके पत्तों से पत्तल व दोने बनते हैं। इसके फूलों से रंग बनता है। यह रंग होली खेलने और गुलाल बनाने के काम आता है।

- इस पर लाख के कीड़े भी पाले जाते हैं। इसकी टहनियां को रेशा बनाने में प्रयोग किया जाता है। इसके फू लों में मकरंद होता है जिसे पाने के लिए दर्जनों अलग-अलग तरह के पक्षी व कीट-पतंगे इस पर आते हैं।

पलाश पर पाए जाने वाले पक्षी
परपल सनबर्ड, रोजी मैना, ब्राह्मनी मैना, कॉमन मैना, रोज़ रिंग्ड पैराकीट, व्हाइट आई, यलो आइड वैबलर, टेलर बर्ड के अलावा लंगूर, तितलियां व गिलहरियों का भी ये घर है।


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