
डॉ. सुशीलसिंह चौहान/ उदयपुर . हमारे न्यूरोलॉजी, मॉलीक्यूलर बायोलॉजी एवं बायोकेमेस्ट्री विशेषज्ञों ने मेडिकल क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल की है। इन्होंने रक्त नमूनों की जांच से स्ट्रॉक (लकवा) की सही-सही अंदाजा लगाने की तकनीक विकसित करने का दावा किया है।
इस शोध के निष्कर्ष अंतरराष्ट्रीय न्यूरो इंटरवेशन जनरल में प्रकाशित हुए हैं। इसको लेकर जर्मनी की कील यूनिवर्सिटी से करार हुआ है। निजी विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों की इस शोध पर प्रदेश सरकार ने मुहर लगाते हुए 80 लाख रुपए का आर्थिक सहयोग किया गया है। अब तक एमआरआई से ब्लड क्लॉट (थक्का) देखने की व्यवस्था थी। इसके अलावा सिटी स्कैन भी कुछ हद तक इस जांच को पूरा करने में सहायक हुआ करता है, लेकिन अधिकतर जिला अस्पतालों में एमआरआई व सिटी स्कैन सुविधा नहीं मिलने के कारण बड़ी संख्या में स्ट्रॉक पीडि़तों की अकाल मृत्यु हो जाती है।
स्ट्रॉक के आंकड़ों ने दी प्रेरणा
स्ट्रॉक से बढ़ते मौतों के आंकड़ों को देखते हुए एम्ब्रियोलॉजी एंड मॉलीक्यूलर बायोलॉजी विभाग की डॉ. मनीषा वाजपेयी, न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. अतुलाभ वाजपेयी, इंडोनेशिया के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. टेडी एवं बायोकेमेस्ट्री विभाग के डॉ. अंजूल की टीम ने यह शोध किया। इनका दावा है कि भारत में पहली बार इस तरह के शोध में सफलता मिली है, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है।
सेल फ्री प्लाज्मा डीएनए अहमशोध परिणामों के अनुसार स्ट्रॉक में सबसे पहले सेल नष्ट होकर फटती है जिससे डीएनए शरीर में बहने वाले रक्त (प्लाज्मा) में मिल जाता है। ब्लड ब्रेन बैरियर इस अवस्था में काम करना बंद कर देता है। मस्तिस्क में स्ट्रॉक के कारण मरीज को लकवा हो जाता है। ऐसे रोगी का आईवी सैंपल (रक्त नमूने) लिए जा सकते हैं, जो संभवत: हर छोटे-बड़े अस्पतालों में संभव होता है।
ऐसे जांचेंगे डीएनए की उपस्थिति
शोध विशेषज्ञों की मानें तो पीसीआर तकनीकी कहती है कि सामान्य व्यक्ति के प्रति लीटर रक्त में 2000 केजी (किलोजिनोम) पाया जाता है। स्ट्रॉक के दौरान रक्त में यह किलोजिनोम बढ़ जाता है। शरीर सामान्य स्थिति से अधिक किलोजिनोम को सहन नहीं कर सकता। ऐसे में ब्लड ब्रेन बैरियर की क्षमता निष्क्रिय हो जाती है। 5 गुना यानी 10 हजार तक किलोजिनोम प्रति लीटर की स्थिति में टीपीए इंजेक्शन लगाना गलत हो जाएगा। प्लाज्मा में डीएनए लेवल हाई होने की स्थिति में एंजियोग्राफी आधारित मैकेनिकल थोम्बेकटॉमी अथवा स्टंट रिट्रीवल डिवाइज से खून का थक्का निकालना भी महंगा पड़ सकता है। रक्त नमूनों की जांच को सेल फ्री प्लाज्मा डीएनए एस्टीमेशन टेस्ट का नाम दिया गया है। यह प्रक्रिया लकवे के निदान एवं रोगी के स्वस्थ होने में सहायक होगी।
भारत सरकार में एप्लाई
शोध परिणामों से भारत सरकार को अवगत करवाया है। प्रदेश सरकार ने मामले में ग्रांट दी है। विशेषज्ञों के प्रयास हैं कि सरकार इस पेंटेंट को रजिस्टर्ड कराए ताकि गरीब तबके को स्टॉक से बचाया जा सके।
डॉ. मनीषा वाजपेयी, मॉलीक्यूलर बायोलॉजी एवं बायोकेमेस्ट्री
टीपीए से जान बचने के बजाय हेमरेज का खतरा
रक्त में मिक्स डीएनए की उपस्थिति से मस्तिष्क की कोशिकाओं को क्षति का पता लगता है। अमूमन ऐसे स्ट्रॉकके मामलों में राजकीय एवं निजी चिकित्सालयों में टीपीए इंजेक्शन की सुविधा है, लेकिन कई मौकों पर रोगी को यह इंजेक्शन बचाने की बजाय ब्रेन हैमरेज कर मौत की नींद सुला देता है। इसलिए नया शोध रोगियों के उपचार में मददगार होगा। रक्त में मिश्रित डीएनए की जांच केवल सिटी स्कैन से संभव नहीं है। प्राथमिक शोध परिणामों के अनुसार इस नमूना जांच की कीमत 500 रुपए आ रही है, जबकि बहुतायत में इसके निर्माण से यह कीमत कम हो सकती है।
Published on:
15 Apr 2018 12:40 pm
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