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गांव के 1 स्कूल ने कैसे पहुंचाया दुलाराम सहारण को साहित्य अकादमी के अध्यक्ष पद तक, पढि़ए उनके संघर्ष की कहानी…

अभावों के बाद भी पुस्तकों से नाता जोड़े रखा और साहित्य के प्रति लगाव इस मुकाम तक लाया, राजस्थान साहित्य अकादमी के अध्यक्ष दुलाराम सहारण से विशेष बातचीत

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मधुलिका सिंह/उदयपुर . चुरू जिले के तारानगर तहसील के छोटे से गांव भाड़ंग में मेरा जन्म हुआ। उस समय ना तो गांव में बिजली, पानी ही था और ना ही सड़कें। पिता किसान थे। एक बात अच्छी थी कि वहां एक मिडिल स्कूल था, जिसमें मैं 8वीं तक पढ़ा। ये विद्यालय अभिभावकों की देन था, उनकी मांग पर खोला गया था। अगर वह विद्यालय नहीं होता तो मैं भी आज कहीं बकरियां चरा रहा होता। यह कहना है राजस्थान साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डॉ. दुलाराम सहारण का। सहारण ने अगस्त 2022 में उदयपुर में अकादमी अध्यक्ष का पद ग्रहण किया था। अगले माह उन्हें एक वर्ष पूर्ण हो जाएगा। इस अवधि में उन्होंने कई नवाचार किए और कई योजनाओं पर कार्य किया। अपने अब तक के सफर के बारे में उन्होंने राजस्थान पत्रिका से विशेष बातचीत की -

प्रश्न : एक किसान के बेटे को साहित्य से लगाव किस प्रकार हुआ और अकादमी अध्यक्ष तक की यात्रा कैसे तय हुई?

उत्तर . जैसा कि मैंने बताया गांव में जीवन संघर्षशील था। बड़े भाई उस समय आर्थिक िस्थतियों को देखते हुए 10वीं के बाद ही फौज में भर्ती हुए। वे जब घर आते थे तो मेरे लिए चंपक, नंदन आदि बाल पत्रिकाएं ले आते थे। साहित्य से ये लगाव तब से शुरू हुआ। राजस्थान पत्रिका की बालहंस में रंग भरो, चित्र देखो, कहानी लिखो आदि प्रतियोगिताएं में भाग लेते थे। अनंत कुशवाहा उस समय बालहंस के संपादक थे और वे बाल रचनाकारों को छापकर प्रोत्साहन देते थे। कॉलेज पहुंचे तो वहां की लाइब्रेरी में कई पुस्तकें मिलीं। इससे लगाव और बढ़ता गया। फिर राजस्थानी व हिंदी में लेखन शुरू कर दिया। इस तरह लिखते-लिखते पहचान मिली, पुरस्कार मिले और आज इस मुकाम तक पहुंचे हैं।

प्रश्न : अगस्त माह में अध्यक्ष पद पर एक साल हो जाएगा, इस कार्यकाल में क्या खास उपलिब्ध रही?

उत्तर - एक साल के कार्यकाल में कई नवाचार हमने किए। मधुमती को पूरी तरह से बदला। इसमें प्रांत के साहित्यकारों को 75 प्रतिशत स्थान और 25 प्रतिशत युवा लेखकों को स्थान दिया। लेखकों के मानदेय में वृदि्ध की। मधुमती के साथ जवाबी पोस्टकार्ड भी दिया जा रहा है ताकि पाठक इस पर कोई बदलाव के लिए अपनी राय दे सकें। पहली बार महिला उपाध्यक्ष नियुक्त की गई हैं। वहीं, दिवंगत साहित्यकारों के लिए हमारे पुरोधा और साहित्यकार प्रस्तुति योजना के तहत उन पर आधारित किताबों का प्रकाशन शुरू किया है, जिसमें साहित्यकारों का जीवन परिचय व लेखन यात्रा बताई जाती है।

प्रश्न : अकादमी ने इस साल कई पुरस्कारों की घोषणा की है, लेकिन देश की दूसरी अकादमियों के मुकाबले पुरस्कार राशि कम है, ऐसा क्यों?

उत्तर. राजस्थान साहित्य अकादमी की ओर से पहले तीन साल के बकाया पुरस्कारों की घोषणा की गई है। ये देश की पहली अकादमी होगी, जो बकाया पुरस्कार देगी। वहीं, इस साल पहली बार सबसे अधिक 121 पांडुलिपियों को सहयोग देने की स्वीकृति दी है। जहां तक पुरस्कारों की राशि की बात है, मुख्यमंत्री से इसमें 10 प्रतिशत वृदि्ध की मांग की है। इससे पुरस्कार राशि में बढ़ोतरी होगी।

प्रश्न : पिछले कई सालों से अकादमी की तरफ से गतिविधियां नहीं हो पाई, अब आगे क्या गतिविधियां होने वाली हैं?

उत्तर . मेरा मानना है कि साल के 365 दिन हैं तो 365 दिन ही गतिविधियां होनी चाहिए। विधागत और वर्गगत कई कार्यक्रमों की योजनाएं बनाई हैं, जिनमें युवा लेखक शिविर का आयोजन होगा। इसके माध्यम से प्रदेश के युवा लेखकों को बढ़ावा दिया जाएगा। आदिवासी व दलित लेखकों के लिए भी सम्मेलन करेंगे, स्त्री लेखन के प्रोत्साहन के लिए महिला लेखक सम्मेलन होगा।

प्रश्न : डिजिटलाइजेशन के इस दौर में मधुमती समेत अकादमी की लाइब्रेरी में मौजूद अन्य पुस्तकों के लिए क्या प्रयास किए गए हैं?

उत्तर . मधुमती 63वें साल में है। ये काफी पुरानी पत्रिका है। इसके अभी 1500 से 2000 तक ही सदस्य हैं। इन सदस्यों को बढ़ाकर करीब 5000 तक ले जाने का प्रयास है। मधुमती को डिजिटलाइज करते हुए वेबसाइट पर इसके अंक देने शुरू किए हैं। ताकि लोग यहां भी इसे पढ़ सकें। वहीं, अकादमी की लाइब्रेरी में मौजूद पुस्तकों की जानकारी भी वेबसाइट पर उपलब्ध कराई गई है।

प्रश्न: आप राजस्थानी भाषा में लिखते रहे हैं, इसे मान्यता दिलाने के लिए भी प्रयासरत रहे हैं, लेकिन अब तक इसे मान्यता ना मिल पाने के क्या कारण मानते हैं?

उत्तर . महात्मा गांधी त्रिस्तरीय भाषा के पक्षधर थे, एक मातृभाषा, दूसरी देश की भाषा और तीसरी दुनिया की भाषा। मैं भी यही मानता हूं भाषाएं एक-दूसरे की पूरक होती हैं। जहां तक राजस्थानी भाषा की बात है, यह एक समृद्ध भाषा है, लेकिन अब तक इसे मान्यता दिलाने वाला मजबूत नेता नहीं मिला। इसके लिए विधानसभा में प्रस्ताव पारित हो चुका, यहां से इसे दिल्ली भिजवा दिया गया। ये प्रस्ताव दिल्ली में ही अटका पड़ा है। ये मुद्दा दलगत राजनीति का नहीं है, इस पर सभी को सोचना चाहिए और प्रयास करने चाहिए।


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