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Rajasthan: धर्मांतरित लोगों से ग्राम सभाओं के जरिए वापस लेंगे आदिवासी आरक्षण! MP की तर्ज पर होगा काम

राजस्थान में धर्मांतरण का बड़ा मुद्दा सामने आया है। मुद्दे पर प्रभावी कार्रवाई के लिए संगठनात्मक कमेटियों का गठन हो चुका है।

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राजस्थान में धर्मांतरित हुए परिवारों को जनजाति आरक्षण का लाभ लेने से वंचित करने की तैयारी की जा रही है। इसके लिए ग्राम सभाओं में प्रस्ताव पारित कराए जाएंगे। विशिष्ट ग्राम सभाओं में सांस्कृतिक सर्वे से अभियान की शुरुआत होगी। पिछले दिनों उदयपुर-सलूम्बर-डूंगरपुर दौरे पर रहे भाजपा के बड़े नेताओं, सांसद-विधायकों ने चर्चा की। दक्षिण राजस्थान में धर्मांतरण का बड़ा मुद्दा सामने आया। मुद्दे पर प्रभावी कार्रवाई के लिए संगठनात्मक कमेटियों का गठन हो चुका है। आगामी दिनों में बड़े स्तर पर आयोजन के माध्यम से सरकार अभियान की घोषणा करेगी।

उदयपुर सांसद डॉ. मन्नालाल रावत की पहल पर योजना पर काम शुरू हो गया है। सांसद डॉ. रावत ने इस संबंध में राजस्थान मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को पत्र लिखा है, इसमें बताया कि प्रदेश में विशेष ग्राम सभाओं का आयोजन किया जाए। इसके एजेंडे में विशिष्ट संस्कृति छोड़कर अन्य धर्म अपनाने वाले परिवारों का सांस्कृतिक सर्वे कराने का प्रस्ताव लिया जाए। सर्वे के बाद ग्राम सभाओं में ही धर्मांतरित परिवारों को अनुसूचित जनजाति की श्रेणी के बारे आरक्षण का लाभ नहीं दिए जाने संबंधी प्रस्ताव पारित कराए जाएं। पूर्व में मध्यप्रदेश की कई ग्राम सभाओं में इस तरह के प्रस्ताव पारित किए जा चुके हैं।

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नियम: जिनके आधार पर होगा काम

  • धर्मान्तरण के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय केरल बनाम चंद्र मोहनन एआईआर 2004 एससी 1972 और गुवाहाटी उच्च न्यायालय का निर्णय एवान लंकाए रिंबाई बनाम जयंतियां हिल्स डिस्ट्रिक्ट काउंसिल और अन्य-2006 के द्वारा पारित निर्णय है, जो धर्मांतरित लोगों को आरक्षण लाभ लेने से रोकते हैं।
  • केंद्र सरकार ने भी स्पष्ट व्याख्या की है कि जो व्यक्ति संस्कृति छोड़कर ईसाई या मुस्लिम धर्म में परिवर्तित हुआ है, वह अल्पसंख्यक की परिभाषा में आता है। यह तथ्य 1931 की आदिम जाति जनगणना रिपोर्ट और 27 अगस्त 1947 को संविधान सभा में अल्पसंख्यकों के प्रतिवेदन में भी स्पष्ट है।

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अनुसूचित जनजातियों की पहचान के लिए पांच मानक स्थापित किए गए हैं, जिनमें आदिम लक्षण, विशिष्ट संस्कृति, भौगोलिक अलगाव, बड़े पैमाने पर समुदाय में संकोच व पिछड़ापन है। इनके आधार पर राज्य में अनुसूचित जनजातियों की मान्यता है। संविधान के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए इन पांच मानकों में से यदि कोई सदस्य किसी भी एक मानक से बाहर हो तो उनके लिए प्रावधान है कि अनुसूचित जनजाति की श्रेणी से बाहर हो जाएगा। धर्मांतरित सदस्य को अनुसूचित जनजाति का लाभ देय नहीं होगा। यह संस्कृति की विशिष्टता को बदलने का प्रभाव है।- डॉ. मन्नालाल रावत, उदयपुर सांसद

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