16 जनवरी 2026,

शुक्रवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

सावन लगते ही कभी पेड़ों पर पड़ जाते थे झूले, अब खो गई परंपरा

सावन में पहले थी झूला झूलने की परंपरा, गांवों में पेड़ों पर झूले डाले जाते थे, बहू-बेटियां सावन के गीत गाती थी, अब केवल यादें ही बाकी

2 min read
Google source verification
sawan_jhule.jpg

सावन मनभावन, लेकिन भूले, वो सावन के झूले...

सावन के झूले पड़े, तुम चले आओ.., सावन के झूलों ने मुझको बुलाया.. जैसे गीत सावन में झूला झूलने की परंपरा को याद दिलाते हैं। सावन मास की शुरुआत हो चुकी है, लेकिन अब पेड़ों पर ना तो सावन के झूले पड़ते हैं और ना ही बाग-बगीचों में सखियों की रौनक होती है, जबकि एक जमाने में सावन लगते ही बाग-बगीचों में झूलों का आनंद लिया जाता था। विवाहित बेटियाें को ससुराल से बुलाया जाता था। वे मेहंदी लगाकर सावन के इस मौसम में सखियों के संग झूला झूलने का आनंद लिया करती थी और वहीं, बरसती बूंदें मौसम का मजा और दोगुना कर देती थी, लेकिन अब ये परंपरा खत्म होती जा रही है। अब न तो झूले पड़ते हैं और न ही गीत सुनाई देते हैं।

पहला सावन मायके का, बहन-बेटियाें के लिए पड़ते थे पेड़ों पर झूले

शहर की बुजुर्ग महिला सुशीला देवी ने बताया कि पहले सावन का महीना आते ही पेड़ों पर झूले पड़ जाते थे। पहला सावन मायके में ही मनाने की परंपरा रही है। ऐसे में बहन-बेटियां ससुराल से मायके बुला ली जाती थीं और हाथों में मेहंदी रचा कर पेड़ों पर झूला डाल कर झूलती थीं। महिलाएं सावनी गीत गाया करती थीं। अब जगह के अभाव में शहरों में तो कहीं झूले नहीं डाले जाते। घरों में जरूर कहीं-कहीं झूले मिलते हैं, लेकिन पेड़ों पर झूला डालकर झूलने का मजा ही अलग होता था। एक अन्य बुजुर्ग महिला बादामी बाई ने बताया कि वे अपने गांव के पेड़ पर मोटी रस्सी में झूला डाल कर झूला झूलते थे और सारे गांव की बहन-बेटियां झूलती थीं। अब ऐसी जगह नहीं हैं, जहां झूला डालें। ऐसे में सावन के झूले भी यादें बन गए हैं। केवल कृष्ण मंदिरों में सावन माह में भगवान को झूला झुलाने की परंपरा जरूर अभी भी निभाई जा रही है।

सावन मेवाड़ में उत्सव से कम नहीं

इतिहासकार प्राे. श्रीकृष्ण जुगनू के अनुसार मेवाड़ में बाबा अपनी बेटियों, बहुओं के लिए और बेटियाें के अपनी सखियों और बहुएं देवरानी - जेठानी के साथ पेंग देती हुई झूले झूलने की परंपरा रही है। सावन के मेलों में पलकीदार झूलों, डोलर में कौन सवार नहीं होना चाहता। मंदिरों में, विशेष रूप से वैष्णव मंदिरों में हिंडोले में लड्डू गोपाल के विग्रह को झूला देने के लिए श्रद्धा उमड़ती है। सावन के कजरारे पक्ष से ही हिंडोले शुरू होते हैं। श्रीनाथजी के मंदिर में तो हिंडोल विजय होने तक नित्य उत्सव होते हैं। अनेक हिंडोला कीर्तन राग मेघ, मल्हार, हिंदोल आदि रागिनियों में गाए जाते हैं। उनवास में तैंतीस लाख देवियां बड़लिया पर हिंदने झूलने क्या लगती है, मेवाड़ में थाली मांदल बज उठती है और गांव-गांव गवरी रमण शुरू हो जाता है। मेवाड़ सच में सावन भादौ में झूलों में झूलता है और प्रकृति के रंजन रूप को जीता है।


बड़ी खबरें

View All

उदयपुर

राजस्थान न्यूज़

ट्रेंडिंग