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तो कैसे साकार होगा सपना ऑलम्पिक का: जर्मन राइफल की जरूरत,’शूटर्स, के हाथों में थमाई देसी राइफल

- महाराणा प्रताप खेल गांव - केवल 10 मीटर की रेंज, जबकि 50 मीटर की स्वीकृत- ना एयर कम्प्रेसर मशीन

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तो कैसे साकार होगा सपना ऑलम्पिक का: जर्मन राइफल की जरूरत,'शूटर्स, के हाथों में थमाई देसी राइफल

तो कैसे साकार होगा सपना ऑलम्पिक का: जर्मन राइफल की जरूरत,'शूटर्स, के हाथों में थमाई देसी राइफल

भुवनेश पंड्या

उदयपुर. इस बार हमारे हाथ से शूटिंग का ऑलम्पिक मेडल फिसला तो ये दर्द हर किसी को गहरा घाव कर गया। केवल सपने के बूते तो ऐसे शूटर्स तैयार नहीं किए जा सकते जो अन्तरराष्ट्रीय मेडल लेकर देश का नाम दुनिया भर में रोशन कर दें। ऐसा इसलिए क्योंकि हमारे महाराणा प्रताप खेल गांव में भी शूटिंग रेंज केवल नाम की ही। यहां ना तो खिलाडिय़ों को जरूरत के मुताबिक सुविधाएं उपलब्ध है और ना ही प्रेक्टिस के लिए जरूरी जर्मन राइफल व पिस्टल। यहां उस देशी राइफल से खिलाडिय़ों को प्रेक्टिस करवाई जाती है, जो किसी भी स्तर पर मान्य ही नहीं है। राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय स्तर के लिए जर्मन राइफल पिस्टल की जरूरत है, तो इन्हें चलाने के लिए कम्प्रेसर की मशीन यहां नहीं है।
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50 मीटर की रेंज स्वीकृत है, लेकिन उपलब्ध है दस मीटर
- खेलगांव में सरकार ने 50 मीटर की शूटिंग रेंज स्वीकृत कर रखी है, लेकिन यहां पर केवल 10 मीटर की शूटिंग रेंज है। हालांकि ज्यादातर खिलाड़ी दस मीटर की रेंज के हैं, लेकिन कई नए खिलाड़ी 50 मीटर की रेंज के भी आगे आ रहे हैं, जो मेडल भी लाने लगे हैं। ऐसे में उन्हें प्रेक्टिस के लिए राजधानी जयपुर तक की दौड़ लगानी पड़ रही है।

- जिस राइफल से यहां पर खिलाड़ी प्रेक्टिस कर रहे हैं वह इंडियन मेड है, जो जो प्रोफेशनल शूटिंग में काम नहीं आती हैं। केवल डमी की तरह इसका इस्तेमाल किया जाता है। यहां एक भी पिस्टल नहीं है, जबकि प्रेक्टिस के लिए राइफल व पिस्टल दोनों की जरूरत होती है। ऐसे में खिलाड़ी जैसे-तैसे कर खुद ही खरीद इसे लाते हैं। यहां कम से कम 4 जर्मन राइफल व 4 जर्मन पिस्टल की जरूरत है।
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ये होता है अन्तर
- राइफल इंडियन है जो ओपन साइड है, जबकि पीप साइड चाहिए। ओपन साइड में पीछे यू व आगे आई होता है। पीप साइड में पीछे सर्कल व आगे भी सर्कल होता है। टारगेट पर शूट करने की एक्यूरेसी ओपन साइड में इतनी नहीं होती है, जितनी पीप साइड में होती है। हालांकि यहां ओपन साइड से काम चला रहे हैं, जबकि प्रोफेशनल में केवल पीप साइड ही चलती हैं।

- प्रोफेशनल इस्तेमाल होने वाली राइफल वह कम्प्रेस्ड एयर सिस्टम पर काम करती है, जबकि देसी राइफल स्प्रिंग पिस्टल सिस्टम पर काम करती है। इससे शॉट को स्प्रिंग धक्का देती है, ऐसे में उसकी गति में भी अन्तर आ जाता है, तो यहां से सीखने के बाद प्रोफेशनल शूटिंग में निशाना खरा नहीं उतरता।
- इलेक्ट्रॉनिक टारगेट मशीन का मेंटेंनेंस समय पर नहीं होने से वह खराब हो जाती है। वॉल्टेज सही नहीं रहता। साथ ही सॉफ्टवेयर अपडेशन समय पर नहीं होते हैं। डेढ़-डेढ़ लाख के पांच और 12-12 हजार वाले 14 टारगेट मशीन है।

- .177 केलिपर दस मीटर में और .22, 50 मीटर में रेंज में इस्तेमाल होता है।
- वर्तमान में यहां नियमित 35 से 40 शूटर्स प्रेक्टिस के लिए आ रहे है, जबकि 50 जुड़े हुए है। सभी खुद की राइफल लेकर आते है।

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नहीं है कम्प्रेस एयर सिस्टम

यह डेढ़ लाख का मशीन है, इससे राइफल में एयर भरी जाती है, लेकिन यहां नहीं होने से प्रशिक्षक के निजी सिलेंडर्स से ये काम किया जा रहा है। करीब डेढ़ हजार तक का मासिक खर्च आता है।
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केवल ड्राय प्रेक्टिस
खिलाडिय़ों को खासी मशक्कत करनी पड़ती है, स्वयं के लाइसेन्ससुदा हथियार से राइफल पकडऩा सिखा रही हूं ।फि र ड्राय प्रेक्टिस करवाना पड़ता है। करीब एक महीने यहां प्रेक्टिस के बाद दो दिन जयपुर जगतपुरा शूटिंग रेंज में जाकर शॉट लगवा कर प्रेक्टिस करवानी होती है। यदि ये प्रेक्टिस नियमित हो जाए तो हमारे खिलाड़ी बेहतर कर सकते हैंं। 50 मीटर की इतनी कम प्रेक्टिस मिलने के बावजूद भी बच्चे मेडल ले कर आ रहे है। हुनर की हमारे पास कमी नहीं है। उदयपुर की आत्मिका गुप्ता दस मीटर रेंज में अभी इंडिया टीम तक पहुंची है।

आकांक्षा कानावत, शूटिंग कोच, खेलगांव

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