
विभिन्न खेलों में बाजी मार रही हैं बेटियां
(women empowerment)
भुवनेश पण्ड्या
उदयपुर. ये ऐसी बेटियां है, जिनके पैरों में परिवार ने बेडिय़ां नहीं डाली। जिन्हें उडऩे के लिए खुला आसमान मिल गया। जो उन्मुक्त गगन में स्वच्छन्द हो उस उड़ान की ओर बढ़ चली जहां से उन्हें अब पूरी दुनिया देख रही है। ये ऐसी हुनरबाज है जो जहां जाती है, अपने शहर, अपने प्रदेश और अपने देश का नाम ऊंचा कर लौटती है। जहां-जहां उन्होंने अपनी ताकत, अपनी हिम्मत दिखाई प्रतिद्वंद्वी ने उनके सामने घुटने टेक दिए हैं। आइए बात करते हैं उदयपुर की कुछ ऐसे हुनरबाज बेटियों (women empowerment) की जिनके लिए हर किसी को ये कहना चाहिए कि ‘तुम उड़ो हौसला हम देंगे...
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मौका मिले तो हर मैदान मारती है बेटियां झलक तोमर: उदयपुर की झलक ने बॉक्सिंग में अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर अपना नाम किया है। झलक का कहना है कि वे फिलहाल 12 वीं कक्षा में हैं, उन्होंने 2017 में ब्रिटेन में हुई अन्तरराष्ट्रीय प्रतियोगिता बॉक्सिंग प्रतियोगिता में रजत पदक प्राप्त किया है। कई बार खेल के दौरान झलक चोटिल हो जाती हैं, लेकिन कुछ ही देर में उन्हें लगता है कि ये तो चलता रहेगा, नजर लक्ष्य पर रखनी है। वे कहती है कि यदि बेटियों को परिवार का सपोर्ट मिल जाए तो वे कहां से कहां पहुंच सकती है। अपने पिता तेजबहादुर व मां सीमा तोमर की ओर से मिलने वाले सपोर्ट से बेहद खुश है।(women empowerment)
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मनवा चुकी है राष्ट्रीय स्तर पर लोहा गरिमा सिरोया: 2005 से बॉक्सिंग कर रही उदयपुर की गरिमा नेशनल गेम्स में अपना लोहा मनवा चुकी हैं। वे खेल के साथ-साथ पढ़ाई को भी पूरा महत्व देती है। वे सुबह-शाम बॉक्सिंग का प्रशिक्षण लेती हैं, तो एलएलबी की पढ़ाई भी कर रही है। राष्ट्रीय स्तर पर वे 2009 गोवा और 2010 में पटना व तमिलनाडु में मेडल ले चुकी हैं। पांचवीं से बॉक्सिंग में बढक़र नाम कर चुकी गरिमा मजिस्ट्रेट बनकर परेशान लोगों के साथ न्याय करना चाहती है। इसे लेकर वे आरजेएस की तैयारी में जुटी हैं। पिता प्रेमप्रकाश सिरोया का साया सिर से उठने के बाद भी मां प्रतीक्षा ने उनका हर कदम पर साथ दिया है। बड़े पापा मुकेश सिरोया ने भी गरिमा का काफी सहयोग किया है।(women empowerment)
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झुड़वा बहने चली एक राह मिनल और मानवी: 25 दिसम्बर 2003, एक ही दिन जन्मी मिनल और मानवी राजपूत दोनों ने एक साथ बॉक्सिंग शुरू किया था। (women empowerment) मानवी ने राष्ट्रीय स्तर पर अपना नाम कर दिया तो दूसरी मिनल ने राज्य स्तर पर अपनी तूती बुलवाई है। पांच वर्ष से खेल रही दोनों बहने एक मन से अपने खेल को निखारने में लगी है। सुबह से लेकर शाम तक वे लगातार मेहनत कर आगे बढऩा चाहती हैं। पिता मुकेश टेलर हैं तो मां प्रतीक्षा शिक्षिका है। दोनों बहने बॉक्सिंग में ऑलम्पिक में मेडल लाना चाहती हैं।(women empowerment)
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मेहनत से बड़ा होता है नाम कनिष्का चौहान: नवीं कक्षा से हॉकी खेल रही कनिष्का सीनियर नेशनल प्लेयर हैं। राजस्थान टीम की मजबूत खिलाड़ी कनिष्का चौहान पूरी दुनिया में अपना नाम करना चाहती है। भारतीय महिला हॉकी खिलाड़ी रानी रामपाल, सुशीला जानू, वन्दना से प्रेरणा मिली है। इन अन्तरराष्ट्रीय खिलाडिय़ों के साथ खेल चुकी कनिष्का कहती है कि हॉकी में दौड़ और प्रेक्टिस दोनों की जरूरत होती है, साथ ही खान-पान बेहतर होना चाहिए। पिता बीएल चौहान बैंकर हैं और मां नम्रता ब्यूटिशीयन हैं। बकौल कनिष्का पहले अभिभावकों ने इनके खेल को लेकर स्वीकार नहीं किया था, लेकिन जैसे-जैसे उसने खुद को सा(women empowerment)बित किया तो वे उसे खूब सपोर्ट करने लगे।
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सेल्फ डिफेंस से नेशनल प्लेयर तक छविसिंह राव: पांच साल पहले जब छवि सेल्फ डिफेंस से जुड़ी तो उसे जूड़ो से उसे लगाव हो गया। जापान के खिलाडिय़ों को टीवी पर खेलता देख वह प्रेक्टिस में जुटी रही। अब छवि नेशनल प्लेयर के तौर पर आगे आई है। जापान व ताइवानी खिलाडिय़ों को लेकर छवि का कहना है कि विदेशों में खिलाड़ी कम उम्र में खेलने लगती हैं तो उन्हें सामाजिक तौर पर पूरा सहयोग मिलता है। पिता राजेन्द्रसिंह राव अकाउन्टेंट व मां सुनीता राव प्रधानाचार्य हैं। परिवार पूरी तरह से उनके साथ है, लेकिन कई रिश्तदारों ने माता-पिता से कहा था कि खेल पर कम ध्यान दिलवा पढ़ाई में आगे बढ़ाओ। 2014 और 2017 में राष्ट्रीय प्रतियोगिता में रजत पदक पा चुकी छवि विश्वविद्यालयी खेलों में भी हिस्सा ले चुकी है।
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Published on:
27 Jul 2019 12:09 pm
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