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उदयपुर

Video: इसलिए कलक्ट्रेट पर जुटे आदिवासी, किया प्रदर्शन

उदयपुर विकास प्राधिकरण के गठन के साथ ही आसपास की पेराफेरी में आने वाले 136 गांवों में सर्वाधिक जनजाति बहुल इलाके की पंचायतों के आने पर लोगों का विरोध शुरू हो गया। शुक्रवार को गिर्वा सहित कई पंचायतों के आदिवासी समाज के लोगों ने शहर में रैली निकालते हुए जिला कलक्ट्रेट पर विरोध प्रदर्शन किया।

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उदयपुर . उदयपुर विकास प्राधिकरण के गठन के साथ ही आसपास की पेराफेरी में आने वाले 136 गांवों में सर्वाधिक जनजाति बहुल इलाके की पंचायतों के आने पर लोगों का विरोध शुरू हो गया। शुक्रवार को गिर्वा सहित कई पंचायतों के आदिवासी समाज के लोगों ने शहर में रैली निकालते हुए जिला कलक्ट्रेट पर विरोध प्रदर्शन किया। राज्य सरकार ने यूडीए की घोषणा करते हुए उदयपुर की पेराफेरी के 30 किलोमीटर क्षेत्र के 136 गांवों को शामिल किया है। इन गांवों में गिर्वा, कुराबड़, बडग़ांव, मावली, गोगुन्दा, वल्लभनगर, झाड़ोल, सराड़ा सहित कई पंचायत समितियों के गांव शामिल हैं। अधिकांश पंचायत जनजाति बहुल है। इन क्षेत्रों के गांव यूडीए में शामिल होने पर इन क्षेत्रों में विरोध शुरू हो गया। दोपहर को भील प्रदेश मुक्ति मोर्चा के नेतृत्व में कई पंचायतों के पंच, सरपंच व जनप्रतिनिधि अपने-अपने क्षेत्र के ग्रामीणों के साथ उदियापोल पहुंचे। जहां से सूरजपोल, टाउनहॉल, देहलीगेट होते हुए जिला कलक्टे्रट पहुंचे। यहां विरोध प्रदर्शन के दौरान सभा हुई। जहां भील प्रदेश मुक्ति मोर्चा के जिला संयोजक अमित खराड़ी, कांतिभाई आदिवासी, बबीता कश्यप, मांगीलाल ननामा, उंदरी सरपंच अनिल पारगी, अलसीगढ़ सरपंच पुष्कर कलासुआ, पीपलवास सरपंच अटलीबाई, पोपल्टी मीरबाई ,चोकडिय़ा खेमली बाई, उपसरपंच टेकचंद, नया खेड़ा सरपंच विमल खराड़ी व रामलाल, गोदानकला सरपंच उदयलाल कटारा, पई सरपंच विजय कटारा, समाजसेवी किशन पारगी आदि ने संबोधित किया। सभा के बाद जिला कलक्टर को ज्ञापन दिया। ज्ञापन में उन्होंने समस्त पंचायतों को यूडीए में शामिल नहीं करने की मांग की।
अधिकांश बरसों से काबिज, कब्जा मानने से विरोध
आदिवासी जनप्रतिनिधियों का कहना है कि अधिकांश पंचायतों आदिवासी बहुल इलाके की है। यहां आदिवासियों का जमीनों को बरसों से कब्जा है। वहां खेतीबाड़ी करते आ रहे हैं। यूडीए में शामिल होने पर इन जमीनों पर कब्जा मानकर अधिकारी आदिवासियों को हटा देंगे। यह कृत्य वे पूर्व में नेला, बलीचा, जोगीतालाब व अन्य क्षेत्रों में कर चुके हैं। आदिवासी प्रकृति प्रेमी है और उनकी वजह से ही यहां के पहाड़ बचे हुए हैं। यूडीए में जाने के बाद विस्तार के नाम पर इन पहाड़ों को उद्योगपतियों को दे दिया जाएगा। जो कङ्क्षटग कर प्रकृति को नुकसान पहुंचाएंगें।