केन्द्र और राज्य सरकारें हर वर्ष शिक्षा के नाम पर करोड़ों रुपए पानी की तरह बहा रही हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर हाल जस के तस नजर आते हैं। सरकारी स्तर पर आधे-अधूरे प्रयासों का ही नतीजा है कि निजी विद्यालयों में जाने वाले विद्यार्थी सरकारी विद्यालयों का रुख नहीं कर पा रहे हैं। सरकार ने नए बजट में नए विद्यालय खोलने और क्रमोन्नत करने पर करोड़ों रुपए का पिटारा खोल दिया, लेकिन अब भी सरकारी विद्यालय में पढऩे वाले छात्रों को स्कूल पहुंचते ही चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के कार्य करने पड़ रहे हैं। स्कूलों में विद्यार्थियों को झाडू लगानी पड़ रही है।