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पानिये, ढोकले और राब के बिना नहीं कटती मेवाड़ की सर्दियां

मार्गशीर्ष व पौष महीने में खास तौर पर बनाए जाते हैं पारंपरिक मेवाड़ी व्यंजन, सालों से ये पौष्टिक खानपान करता आ रहा है इम्यूनिटी बूस्‍ट

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उदयपुर. सुलगते कंडों पर पलाश के पत्तों में सिकते मक्की के पानिये हों या भाप में पक कर तैयार हुए ढोकले हों या फिर कडकड़़ाती सर्दी में शरीर में गर्मी भर देने वाली गर्मागर्म राब हो...। ये सभी मेवाड़ी खाने ऐसे हैं, जिनके बिना सर्दियां नहीं काटी जा सकतीं। इन्हें खाने से जुकाम, सर्दी का उपचार और जाड़े का मुकाबला करने की क्षमता मिल जाती है। फिर इनके साथ ही मैथी, उड़द, नेगड़ के लड्डू सर्दियों में ना मिले तो खाने का स्वाद ही अधूरा रह जाए। मेवाड़ के ये पारंपरिक खाने सर्दियों में सालों से हर घर में बनते आ रहे हैं। इन दिनों मार्गशीर्ष का महीना चल रहा है और आगे पौष माह लगेगा। ऐसे में इन महीनों में ही सबसे ज्यादा सर्दी की खुराक खाई जाती है जो हाड़ कंपानी वाली सर्दियों से शरीर को लडऩे की ताकत देती है और इम्युनिटी बूस्ट तो करती ही है।


पानिये खाने की परंपरा बस्तर तक, ढोकले की सिंध तक

इतिहासकार डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू के अनुसार मार्गशीर्ष से आरम्भ कर पौष तक मेवाड़ में पानिये व ढोकले खाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। मेवाड़ के ये पानिये आदिवासी इलाके कोटड़ा से लेकर मध्यप्रदेश तक व छत्तीसगढ़ के आदिवासी बस्तर तक में प्रचलित है। वहीं, ढोकले की परंपरा राजस्थान से लेकर सिंध पार तक रही है। मेवाड़ में ढोकले कभी ज्वार के बनते थे, दो सदियों से मक्का के बनाए और खाए जा रहे हैं। इन दिनों घर-घर स्वाद और चर्चा ही ढोकले की है। उड़द की दाल के साथ तेल डले ढोकले और उस पर गुड़ की मिठास...। सुनते ही दूसरे के घर भी तैयारी शुरू हो जाती है, जिनके घर ब्याह हुआ है वहां अभी ढोकले नहीं बनेंगे। वहीं, मक्की की राब तो स्वाद के कारण अब 12 महीने ही बनने लगी है।

सर्दी के खाने आयुर्वेदिक औषधि
मेवाड़ में सर्दी में संधाणा बनाने की परंपरा है। इसका अर्थ है, जो शरीर की संधियों को जोड़ दे। इस समय खाने को आयुर्वेदिक औषधि के तौर पर खाया जाता है। खाने में उड़द, घी, मैथी, अजमा, गुड़ आदि का उपयोग सबसे अधिक होता है। भांगमा पराठे, मूंग की दाल, चंदलोई, आलणी की साग इनको खाने से शरीर की खुराक पूरी हो जाती है। विशिष्ठ खानों में मक्की का हाजिया, साजी, पापड़ खार आदि खूब बनाए जाते हैं। फूड हैरिटेज ऑफ राजस्थान के लेखक और सुखाडिय़ा विवि के प्रो. पीयूष भादविया के अनुसार, सर्दियों में मेवाड़ के खानों का जायका और पौष्टिकता अधिक बढ़ जाती है। ना केवल शहरी बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में कई तरह के विशेष खाने बनते हैं। इनमें आलणी की साग मशहूर है।


सर्दियों में बनने वाली प्रमुख रोटियां व सब्जियां -

मक्का, ज्वार, बाजरे की रोटियां
मैथी की आलणी

अमल की आलणी
हन्दुरिया की साग

सील का साग
कलीजड़ा की साग

हरजणो की फलियां की साग
धमका की फलियों की साग

सलगम की साग
मूला की साग

लीलवा की साग
हरे कांदे की साग