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दो लाख जगह जिंदगी को करंट से मौत का खतरा

प्रदेश में करंट से लगातार हो रहे हादसे, करंट से प्रतिदिन औसत मृत्यु दर 3 से बढ़कर 5 हुई, मानवाधिकार आयोग ने ऊर्जा सचिव को जारी किया नोटिस

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दो लाख जगह जिंदगी को करंट से मौत का खतरा

दो लाख जगह जिंदगी को करंट से मौत का खतरा

उदयपुर. प्रदेश में जहां सरकार बढ़ती विद्युत दरों पर नियंत्रण करने में विफल रही है, वहीं विद्युत वितरण कंपनियां करंट से होने वाले हादसे रोकने में नाकामयाब साबित हुई है। इन्हीं कंपनियों की ओर से किए गए सर्वे के मुताबिक प्रदेश में 2.75 लाख जगह ऐसी खतरे से भरी कमियां रही है, जहां करंट संबंधी हादसे हो सकते हैं। इन्हें एक माह में सुधारना था, लेकिन सात माह बीतने तक महज 71 हजार जगहों पर ही सुधारी गई। प्रदेश में अब भी दो लाख जगह करंट से मौत के खतरे बरकरार है। प्रदेश में बीते तीन साल में करंट की घटनाओं से 1200 लोगों की मौत हो चुकी है। हादसों के पीडि़तों को बतौर मुआवज 23 करोड़ रुपए भुगतान करना पड़ा।

अफसर गिनाते हैं मजबूरियां

राज्य मानवाधिकार आयोग सदस्य एमके देवराजन की मौजूदगी में हाल ही में हुई चर्चा में चौंकने वाली स्थिति सामने आई है। सुरक्षा मानकों की अनदेखी पर जवाब मांगा गया तो अधिकारी सीधा जवाब देने के बजाय मजबूरियां गिनाने लगे। आयोग ने विद्युत हादसों में मौत की स्थिति को गंभीरता से लेते हुए बिजली अधिकारियों से हादसों की रोकथाम के लिए एक्शन प्लान बनाने को कहा। काफी संख्या में हादसों के कारण खोजे जाने के निर्देश दिए गए।

इन्होंने समझी जिम्मेदारी

समता पावर और आरएसइबी रिटायर्ड अभियन्ता एवं अधिकारी जन कल्याण ट्रस्ट जयपुर ने मानवाधिकार आयोग को याचिका दी थी। प्रदेश की विद्युत वितरण कम्पनियों की ओर से सुरक्षा नियमों की अवहेलना और हर रोज होती विद्युत दुर्घटनाओं से मौतों पर अंकुश के लिए आवाज उठाई। इसके लिए राजस्थान विद्युत नियामक आयोग सचिव, जयपुर विद्युत वितरण निगम एमडी, अजमेर विद्युत वितरण निगम एमडी, जोधपुर विद्युत वितरण निगम एमडी, विद्युत निरीक्षणालय के वरिष्ठ विद्युत निरीक्षक और राजस्थन सरकार के ऊर्जा सचिव को जिम्मेदार माना है।
इनका कहना
नियामक आयोग की ओर से जारी सुरक्षा सम्बन्धित निर्देशों की पालना नहीं होने की शिकायत हमने विद्युत अधिनियम-2003 की धारा 142 में की। जिसे आयोग ने याचिका का रूप देते हुए वितरण कम्पनियों को नोटिस जारी किया। उनके असंतोषपूर्ण जवाब पर यह सिद्ध हो गया की कम्पनियां सुरक्षा सम्बन्धित निर्देशों की पालना नहीं करने की दोषी है। इसके बावजूद नियामक आयोग ने इनके खिलाफ कार्रवाई नहीं की।
वाइके बोलिया, कोर कमेटी सदस्य, समता पावर
हम हाइकोर्ट में गए, जहां पीआईएल लगाई, नियामक आयोग में भी गए। सुरक्षा मानक तय किए गए हैं, जो विद्युत अधिनियम में आते हैं। इनकी पालना क्यों नहीं की जा रही है। यह हठधर्मिता है। सभ्य समाज में इससे बुरी स्थिति क्या हो सकती है। हाइकोर्ट में पीआईएल पर सुनवाई नहीं हो रही है, नियामक आयोग लाचार है और जिम्मेदार समझने को तैयार नहीं है। इंसानी जीवन अनमोल है, जिसे जिम्मेदार हल्के में ले रहे हैं।
डीपी चिरानिय, अध्यक्ष, आरएसइबी रिटयर्ड अभियन्ता-अधिकारी जनकल्याण ट्रस्ट
जब तब सामाजिक उत्तरदायित्व नहीं हो तब तक नतीजे बेहतर नहीं हो सकते हैं। करंट के खतरे मनुष्य की जान से जुड़ा मुद्दा है, जिनकी अनदेखी की जा रही है, जबकि बेवजह की बयानबाजी करने को उतारु रहते हैं। जो काम एक माह में करना था, उसे सात माह हो गए, लेकिन सुधार नहीं हुए। मानवाधिकार आयोग का भी कहना है कि करंट से हादसों के कारण जानकर सुधार किया जाना चाहिए।
बीएम सनाढ्य, निदेशक, समता पावर