
उदयपुर में बाजार में पांच के नकली सिक्कों की खनक, पहचानना मुश्किल, जानकार व बैंक अधिकारी भी खुद हैरान
मोहम्मद इलियास/उदयपुर. शहर में पकड़ में आए नकली नोट के अलावा गत्ते, स्टील व मिक्स धातु के पांच के नकली सिक्के भी धड़ल्ले से चल रहे हैं। हाइड्रोलिक मशीन में डाई से तैयार किए यह सिक्के कुछ दिनों में ही जंग लगकर काले पड़ रहे हैं। पूर्व में घंटाघर क्षेत्र में ही पकड़ी गई टकसाल के बाद एकाएक नकली सिक्के फिर से बाजार में आने से जानकार व खुद बैंक अधिकारी भी हैरत में हैं। उनका कहना है कि सरकार ने जिन वर्षों में ब्रास के सिक्कों का निर्माण बंद कर दिया उन वर्षों में फर्जी तरीके से स्टील के सिक्के बनाकर चला दिए गए। यह सिक्के सर्वाधिक फल-सब्जी मंडियों, छोटे व्यापारियों व थडिय़ों वालों के पास मौजूद थे।
स्टील व मिक्स धातु से निर्मित सिक्कों पर अशोक स्तम्भ, पांच रुपए व अन्य डिजाइन हूबहू बनाई गई। इतनी बारीकी से फिनिशिंग की गई कि कोई भी उसे पहचान नहीं सके। बताया जा रहा है कि एक सिक्के को बनाने पर महज 50 पैसे का खर्च आ रहा था और 4.50 रुपए मुनाफा कमा रहे थे।
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जारी किए वर्षों का गड़बड़झाला
भारत सरकार की ओर से वर्ष 2007 व 2008 में (डेफिनेटिव) कॉमन स्टील के पांच के सिक्के चलाए थे। वर्ष 2007 में चलन सिक्कों पर प्लस का निशान है तो 2008 में बढ़ते भारत के चिह्न के रूप में नदी की लहर बताई गई। इनके अलावा सरकार ने (कॉमोरनेटिव) स्मारक स्टील के सिक्कों चलाए, जिन पर विभिन्न महापुरुषों व अन्य के चित्र हैं। यह सिक्के कम मात्रा में तथा महापुरुषों की जयंती व विशेष आयोजनों पर चलाए गए। स्मारक सिक्कों के पीछे महात्मा गांधी दांडी मार्च, जगत गुरु नारायण, नारायण गुरुदेव, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, बाल गंगाधर, लालबहादुर शास्त्री, महात्मा बशेश्वर, खादी विलेज ओएनजीसी के अलावा वापस कभी भी सरकार की ओर से स्टील के सिक्के नहीं चलाए गए। वर्ष 2007 में निर्मित 5 रुपए के प्लस वाले सिक्कों की कीमत पांच सौ रुपए तक बताई जा रही है। इसके बावजूद बाजार में वर्ष 2010, 2015 व 2016 पांच के स्टील के नकली सिक्के चल रहे हैं।
कब व कैसे आया पांच का सिक्का
- भारत सरकार ने पांच का प्रथम सिक्का वर्ष 1992 में जारी किया
- 1992 से 2004 तक कॉपर निकल में निकला। इसे भारी सिक्का भी कहा गया।
- सरकार ने वर्ष 2005 व 2006 में किसी भी तरह के (डेफिनेटिव) कॉमन सिक्का नहीं चलाया।
- वर्ष 2007-08 में स्टील के डिजाइन के सिक्के आए।
- 2007 में सिक्के के पीछे प्लस का निशान है।
- 2008 के सिक्के पीछे बढ़ते भारत के चिह्न के रूप में नदी की लहर बताई गई।
- 2009 से 2017 तक सिक्के का प्रकाशन निकल ब्रास में किया जा रहा है।
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पहचान सिर्फ सरकार स्तर पर
लेकसिटी न्यूमिसमेटिक एंड फिलेटिक सदस्य यश जैन के अनुसार सिक्कों के निर्माण में धातु का मिश्रण होता है। सरकारी स्तर पर ही ढालने के दौरान धातु का अनुपात अलग-अलग कर दिया जाता है। इसका पता केवल सरकार स्तर पर ही इसे ढालने वाले अधिकृत लोगों को ही पता होता है। सिक्कों में कोई सिक्यूरिटी मार्क नहीं होता है, लेकिन इसके नीचे की ओर तारे, बिन्दु, चौरस आकृति होती है, जिससे यह पहचान हो सकती है कि यह देश की कौनसी सरकारी टकसाल में बनाया गया।
Updated on:
20 Sept 2018 11:57 pm
Published on:
20 Sept 2018 11:55 pm
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