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उदयपुर : सेवाधर्मी बने लावारिसों के ‘अपने’, मौत के बाद निभा रहे मानवता का धर्म

उदयपुर में दो संस्थाएं लावारिस शवों और अस्थियों का सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार कर मानवता की मिसाल पेश कर रही हैं। वर्षों से बिना किसी स्वार्थ के ये संगठन हजारों दिवंगतों को अंतिम सम्मान और मोक्ष दिलाने का कार्य कर रहे हैं।
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उदयपुर. समाज सेवा की पहचान केवल जीवित लोगों की मदद तक सीमित नहीं है। उदयपुर में दो संस्थाएं ऐसी भी हैं, जिन्होंने उन लोगों को सम्मान देने का बीड़ा उठाया है, जिनके अंतिम समय में 'अपना' कहने वाला कोई नहीं होता। कोई लावारिस शवों का विधि-विधान से अंतिम संस्कार कर उनकी अस्थियां गंगा में प्रवाहित कर रहा है तो कोई तीन दशक से असहाय परिवारों और लावारिस अस्थियों को अंतिम पड़ाव तक पहुंचाकर मानवता की मिसाल गढ़ रहा है। इन सेवाओं में न प्रचार की चाह है, न प्रतिफल की उम्मीद, केवल एक भावना है हर इंसान को जीवन के अंतिम पड़ाव पर सम्मान मिले।

दो हजार से अधिक शवों को दी विदाई

मानवता की सेवा को अपना धर्म मानने वाली महाराणा प्रताप सेना वर्ष 2008 से उदयपुर संभाग में ऐसे लोगों की अंतिम यात्रा की जिम्मेदारी निभा रही है, जिनका कोई वारिस नहीं होता। संस्थापक मोहन सिंह राठौड़ बताते हैं कि पुलिस से सूचना मिलने पर संस्था के सदस्य शव का विधि-विधान से अंतिम संस्कार कराते हैं। अब तक संस्था 2 हजार से अधिक लावारिस शवों का सम्मानपूर्वक दाह संस्कार कर चुकी है। अनूठी पहल यह है कि अंतिम संस्कार के बाद भी सेवा यहीं समाप्त नहीं होती। पूरे वर्ष जिन लावारिस शवों का दाह संस्कार किया जाता है, उनकी अस्थियों को सुरक्षित संचित किया जाता है। बाद में सभी अस्थियों को हरिद्वार ले जाकर गंगा तट पर विधि-विधान से तर्पण और विसर्जन कराया जाता है, ताकि उन दिवंगत आत्माओं को मोक्ष मिल सके।

जिम्मा इन सेवा कार्यों का भी

संस्था रक्तदान शिविर, पशु-पक्षियों के लिए प्याऊ संचालन सहित कई सामाजिक कार्य भी करती है। सेवा से जुड़े स्वयंसेवकों का मानना है कि किसी अनजान व्यक्ति को भी अंतिम सम्मान देना सबसे बड़ा मानवीय धर्म है। यही सोच वर्षों से संस्था की पहचान बन चुकी है।

अस्थियों को गंगा तक पहुंचाने का निभा रहे संकल्प

मेवाड़ प्रताप दल सेवा संस्थान की सेवा यात्रा वर्ष 1996 में एक मार्मिक घटना से शुरू हुई। संस्थापक लाला सालवी ने श्मशान घाट पर लोगों को अस्थियां नदी में फेंकते देखा तो उन्होंने संकल्प लिया कि आर्थिक या सामाजिक मजबूरी के कारण किसी की अस्थियां यों उपेक्षित नहीं रहेंगी। तभी से संस्था असहाय और लावारिस अस्थियों को हरिद्वार के हर की पौड़ी तक पहुंचाने का कार्य कर रही है। करीब तीन दशक में संस्था 4630 से अधिक असहाय एवं लावारिस अस्थियों का हरिद्वार में विधिवत विसर्जन करा चुकी है। साथ ही 55 लावारिस शवों का अंतिम संस्कार भी कराया गया। संस्था उन परिवारों को भी अपने साथ ले जाती है, जो आर्थिक कारणों से हरिद्वार नहीं जा पाते। पूरी यात्रा, धार्मिक अनुष्ठान और वापसी तक की व्यवस्थाएं सामूहिक सहयोग से होती हैं।

इन सेवा कार्यों में भी जुटी संस्था

पौधारोपण, बावड़ियों की सफाई, निर्धन बच्चों को स्वेटर, जूते-मोजे वितरण, जरूरतमंद बच्चों का उपचार कराती है। कोरोना काल में मोर्चा संभालने वाले वॉरियर्स के लिए कई तरह के सेवा कार्य किए। संस्था से जुड़े स्वयंसेवक बिना किसी भेदभाव के सेवा को आगे बढ़ा रहे हैं।