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उदयपुर. खांसी, सांस फूलना या सीने में दर्द जैसी समस्याओं को सामान्य मानकर नजरअंदाज करना कई लोगों पर भारी पड़ रहा है। फेफड़ों का कैंसर अब केवल धूम्रपान करने वालों की बीमारी नहीं रहा, बल्कि चूल्हे के धुएं, परोक्ष धूम्रपान, वायु प्रदूषण और फेफड़ों की पुरानी बीमारियों के कारण धूम्रपान नहीं करने वाले लोग भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। विश्व लंग्स कैंसर दिवस पर सुपर स्पेशलिटी अस्पताल के ऑन्कोलॉजी विभाग की रिपोर्ट चिंताजनक तस्वीर पेश करती है। विभाग में पिछले पांच वर्षों में फेफड़ों के कैंसर के नए मरीजों की संख्या में 53.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज हुई है। इस वर्ष जागरूकता अभियान का मुख्य संदेश भी समय पर जांच, शीघ्र पहचान और मरीजों को बेहतर सहयोग पर केंद्रित है।
हर साल बढ़ रहे मरीज, डेढ़ गुना पहुंची संख्या
ऑन्कोलॉजी विभाग के ऑन्कोलॉजी विभाग हेड डॉ नरेंद्र राठौड़ के अनुसार वर्ष 2021 में फेफड़ों के कैंसर के 233 नए मरीज सामने आए थे। इसके बाद यह आंकड़ा लगातार बढ़ता गया और वर्ष 2025 में 357 नए मरीज दर्ज किए गए। यानी पांच वर्षों में मरीजों की संख्या में 124 की बढ़ोतरी हुई। इस अवधि में विभाग में कुल 1,418 नए मरीजों का पंजीकरण हुआ।
महिलाओं में भी बढ़ रही बीमारी
डॉ राठौड़ के अनुसार बीते वर्ष दर्ज मरीजों में लगभग 80 प्रतिशत पुरुष और 20 प्रतिशत महिलाएं थीं। पुरुषों में धूम्रपान और तंबाकू सेवन प्रमुख कारण रहे, जबकि महिलाओं में चूल्हे का धुआं, रसोई में लंबे समय तक धुएं का संपर्क, परोक्ष धूम्रपान और प्रदूषण बड़ी वजह बनकर सामने आए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अब यह बीमारी केवल स्मोकर्स तक सीमित नहीं रही है।
देर से अस्पताल पहुंचना सबसे बड़ी चुनौती
फेफड़ों के कैंसर के अधिकांश मरीज समय पर जांच नहीं कराते। विभाग के अनुसार करीब 75 से 80 प्रतिशत मरीज कैंसर की तीसरी या चौथी स्टेज में अस्पताल पहुंचते हैं। शुरुआती स्टेज में केवल 15 से 20 प्रतिशत मरीज ही जांच के लिए आते हैं। यही कारण है कि पांच वर्ष तक जीवित रहने की समग्र दर केवल 12 से 16 प्रतिशत रह जाती है, जबकि एडवांस स्टेज में यह 5 प्रतिशत से भी कम होती है। इसके विपरीत यदि बीमारी पहली या दूसरी स्टेज में पकड़ में आ जाए तो 55 से 70 प्रतिशत मरीज सामान्य जीवन जी सकते हैं।
सुपर स्पेशलिटी में उपलब्ध आधुनिक इलाज
अस्पताल में फेफड़ों के कैंसर के उपचार के लिए सर्जरी, कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी, इम्यूनोथेरेपी और टार्गेटेड थेरेपी जैसी आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं। मरीज की स्थिति के अनुसार मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट, रेडिएशन ऑन्कोलॉजिस्ट और सर्जन की संयुक्त टीम उपचार योजना तैयार करती है।
पांच वर्षों में नए मरीज
वर्ष नए मरीज वृद्धि
2022 245 5.2%
2023 279 13.9%
2024 304 9.0%
2025 357 17.4%
कुल मरीज (5 वर्ष) : 1,418
कुल वृद्धि : 53.2 प्रतिशत
किन बातों का रखें ध्यान
- मुख्य कारण
धूम्रपान और तंबाकू
परोक्ष धूम्रपान
चूल्हे का धुआं
वायु प्रदूषण
रेडॉन, एस्बेस्टस जैसे रसायन
टीबी और सीओपीडी जैसी पुरानी फेफड़ों की बीमारियां
- बचाव
तंबाकू से पूरी तरह दूरी
धुएं वाले वातावरण से बचाव
तीन सप्ताह से अधिक खांसी होने पर जांच
संतुलित आहार और नियमित व्यायाम
तीन सप्ताह से अधिक रहे खांसी तो कराएं जांच
लगातार तीन सप्ताह से अधिक खांसी रहना, खांसी में खून आना, सांस फूलना, सीने में दर्द, बिना कारण वजन घटना या आवाज बैठना जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। 50 वर्ष से अधिक उम्र के लंबे समय तक धूम्रपान करने वाले लोगों को नियमित लो-डोज सीटी स्क्रीनिंग कराने की सलाह दी जाती है।
डॉ नरेंद्र राठौड़, विभागाध्यक्ष, ऑन्कोलॉजी विभाग
Updated on:
01 Aug 2026 06:36 pm
Published on:
01 Aug 2026 06:36 pm
