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मेवाड़ की धरोहरों को मिला जीआइ टैग, अब यूनेस्को सूची में शामिल होने की दरकार

जब मेवाड़ की भूमि की बात होती है तो यहां का इतिहास, धार्मिक स्थल, प्राकृतिक धरोहरें, सांस्कृतिक विरासतें इसे सबसे श्रेष्ठ बनाती हैं। यहां की 4000 हजार वर्ष पुरानी आयड़ नदी, जहां आहाड़ सभ्यता ने जन्म लिया वो किसी अमूल्य संपदा से कम नहीं।

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उदयपुर . जब मेवाड़ की भूमि की बात होती है तो यहां का इतिहास, धार्मिक स्थल, प्राकृतिक धरोहरें, सांस्कृतिक विरासतें इसे सबसे श्रेष्ठ बनाती हैं। यहां की 4000 हजार वर्ष पुरानी आयड़ नदी, जहां आहाड़ सभ्यता ने जन्म लिया वो किसी अमूल्य संपदा से कम नहीं। ऐतिहासिक सास-बहू मंदिर, जगत मंदिर, एकलिंगजी मंदिर धार्मिक विरासतें हैं तो गणगौर, गवरी की सांस्कृतिक विरासतें यहां की पहचान हैं। हाल ही उदयपुर की कोफ्तगिरी कला और नाथद्वारा की पिछवई कला को जीआई टैग मिला है, जिससे अब इन कलाओं को और फायदा मिलेगा। इसी तरह वर्ष 2021 में बंगाल की दुर्गा पूजा को अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के रूप में यूनेस्को सूची में शामिल किया गया तो मेवाड़ के गणगौर उत्सव को भी ये दर्जा मिलना चाहिए। धरोहरों से पूरी मेवाड़ की धरती समृद्ध है, ऐसे में कई स्थलों, मंदिरों और यहां की बरसों पुरानी परंपराओं को यूनेस्को सूची में शामिल किया जाना चाहिए।


सांस्कृतिक विरासत सूची में गणगौर, गवरी हों शामिल
मेवाड़ी परम्परा व संस्कृति के साथ धार्मिक व सामाजिक मान्यताओं को बयां करने वाला गणगौर उत्सव का विशेष महत्व है। होली के अगले दिन से ही गणगौर की पूजा शुरू हो जाती है। गणगौर महोत्सव के प्रचार-प्रसार के लिए व इसके माध्यम से पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए पर्यटन विभाग ने इस महोत्सव का आयोजन शुरू किया। अब उदयपुर का गणगौर उत्सव देश-विदेश में मशहूर है। इसी तरह आदिवासी लोक संस्कृति का परिचायक गवरी नाट्य राखी के अगले दिन से शुरू हो जाता है। वनवासियों के सवा मासी लोक नाट्य अनुष्ठान गवरी में पौराणिक घटनाओं के साथ मौजूदा पुलिस प्रशासन, समाज की व्यवस्थाओं का मंचन कर वनवासी कलाकार 40 दिन तक दर्शकों का मनोरंजन करते हैं।

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धार्मिक विरासतों में शामिल हों हमारे मंदिर
मेवाड़ के एक से बढक़र एक मंदिर यहां की धार्मिक विरासत में आते हैं। हम बात करें उदयपुर के भगवान जगदीश मंदिर की या फिर मेवाड़ के आराध्य प्रभु एकलिंगनाथ की, सबके मन में बसे श्रीनाथजी मंदिर के तो क्या कहने और जगत का अंबिका मंदिर और नागदा का सास-बहू मंदिर तो परिचय का मोहताज ही नहीं। ना केवल ऐतिहासिक, धार्मिक दृष्टि से बल्कि ये कलात्मक दृष्टि से भी समृद्ध हैं। यहां चारों दिशाओं और हर कोने में अनूठे और धार्मिक विरासतें भरी पड़ी हैं। ऐसे में धार्मिक पुरा वैभव हर ओर बिखरा है।


यूनेस्को की सूची में भारत के 40 और राजस्थान के 6 किले समेत 3 स्थल
यूनेस्को विश्व धरोहर की सूची में भारत के 40 स्थलों के नाम शामिल हैं। इसमें राजस्थान में सबसे पहले 2010 में जयपुर के जंतर-मंतर को शामिल किया गया था, इसके बाद 2013 में आमेर के किले और 2019 में शहरी क्षेत्र परकोटे को विश्व धरोहर का तमगा मिला था। वहीं, किलों की सूची में चित्तौड़ और कुंभलगढ़ का किला शामिल हो चुका है।

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मेवाड़ की ये धरोहरें शामिल हों यूनेस्को की सूची में -
- जगदीश मंदिर, एकलिंगजी मंदिर, श्रीनाथजी मंदिर, सास-बहू मंदिर, अंबिका माता मंदिर
- गवरी नाट्य
- गणगौर महोत्सव
- आहाड़ सभ्यता स्थल आयड़
- जावर की खदानें करीब तीन हजार वर्ष पुरानी

वर्ष 2021 में दुर्गा पूजा को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में यूनेस्को की सूची में शामिल किया गया है। बंगाल के दुर्गा पूजा उत्सव की तरह गणगौर महोत्सव का भी मेवाड़ सहित पूरे राजस्थान में उत्साह होता है। ऐसे में इसे भी इस सूची में शामिल किया जाना चाहिए। इसके लिए विभाग प्रस्ताव बनाकर भेजेगा। इसके अलावा गवरी भी इसमें शामिल हो सकता है। साथ ही कई अन्य ऐतिहासिक व धार्मिक स्थल भी इस सूची में शामिल किए जाने चाहिए।
शिखा सक्सेना, उपनिदेशक, पर्यटन विभाग राजस्थान

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