
आसमान से बरसती आग के बीच जब राहगीरों के सूखते हैं कंठ तो मटके नहीं, केन बुझाते हैं प्यास..
धीरेेंद्र जोशी/ उदयपुर . वैशाख माह में आसमान से बरसती आग में राहगीरों का कंठ गीला कर पुण्य कमाने के लिए प्याऊ बिठाने का चलन अतिप्राचीन है। गांवों-कस्बों में हर वर्ष गर्मी शुरू होने के साथ ही दानवीर लोग सार्वजनिक स्थलों पर प्याऊ आरंभ करवाते रहे हैं तो शहरों में भी एकाधिक स्थलों पर बांस की टाटियों से बनी छोटी सी कुटिया और उनमें गीली बजरी पर पर रखे नये मटकों से दूर से ही ठंडे शीतल जल का आभास हो जाता है। इन प्याऊ पर अमूमन बुजुर्ग लोग पूरी मनुहार से आते-जाते लोगों को पानी पिलाते हैं। यह नजारा वर्षों से सबकी आंखों में है, लेकिन शहरों में अब इसमें तेजी से कुछ सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहे हैं।
मटकों की बजाय अब केन
पारंपरिक मटकों वाली प्याऊ की जगह अब प्लास्टिक केन रखे नजर आते हैं। पूरे शहर में इक्का-दुक्का पारंपरिक प्याऊ ही दिखाई देती है, उनमें भी मटके कहीं नहीं दिखाई देते। हां,एक अच्छी बात यह देखने मिलती है कि अब प्राय: हर दुकान के बाहर पानी के केन खुद दुकान मालिक रखवाने लगे हैं, ताकि कोई प्यासा न जाए। दुकानों के बाहर ही नहीं प्रमुख मार्गों पर सडक़ किनारे छोटा टेबल लगाकर तो किसी पेड़ के नीचे केन रखकर पानी का इंतजाम कर रखा है। सार्वजनिक स्थलों के अलावा पर्यटक स्थलों पर भी शीतल जल की व्यवस्था मिल जाती है। कुछ जगह तो बाकायदा लोगों ने आरओ व पानी के कूलर तक लगा रखे हैं। ठण्डे पानी की यह प्याऊ वैशाख ,आष्ााढ़ और ज्येष्ठ तीन माह रहती है ।
तीन माह रहती है जरूरत
जगदीश मंदिर के पुजारी रामगोपाल ने बताया कि हिंदू धर्म में वैशाख माह शुरू होने के साथ ही प्याऊ लगाई जाती है जो सावन माह के आरंभ में हटा दी जाती है। इन तीन माह में काफी गर्मी पड़ती है। पहले हर घर के बाहर जानवरों के लिए भी प्याऊ बनवाई जाती थी,लेकिन यह परंपरा भी अब खत्म होती जा रही है।
Published on:
19 May 2018 05:08 pm
बड़ी खबरें
View Allउदयपुर
राजस्थान न्यूज़
ट्रेंडिंग
