
केस 1. 15 वर्षीय कुणाल (परिवर्तित नाम) ने अवसाद में आकर बुखार की कुछ गोलियां एक साथ खा लीं। 2 दिन आई.सी.यू. में इलाज के बाद उसे मनोचिकित्सा विभाग में रेफर किया गया। चिकित्सक ने कुणाल को एंटीडिप्रेसेंट दवा दी एवं साप्ताहिक साइकोथेरेपी (काउंसलिंग) शुरू की गई। साइकोथेरेपी के दौरान पता चला कि बचपन से ही उसने घर में एक अशांति का माहौल देखा, जिसमें अक्सर माता-पिता का झगड़ा होता था। ऐसे में उसे जिंदगी नकारात्मक लगती थी एवं दिनभर उदासीनता रहती थी।
केस 2 . 17 वर्षीय रिदि्धमा (परिवर्तित नाम) का अपने बॉयफ्रेंड से ब्रेकअप हो गया तो उसके बाद उसने आत्महत्या करने की कोशिश की। वह इस रिलेशनशिप में ही उलझ कर रह गई और दूसरे सभी दोस्तों से दूरी बना ली। वहीं परिवार के सदस्यों को भी कुछ नहीं बताती थी। आखिर जब उसका इलाज मनोचिकित्सक के पास शुरू हुआ तो उन्होंने उसको कई तरह की साइको थैरेपी दी, जिसके बाद वह उस अवसाद से पूरी तरह निकल पाई।
आज 15 से 24 साल की उम्र में हर सातवां युवा अवसाद की स्थिति से गुजर रहा है। कोविड के बाद यह स्थिति और गहरी हो गई है। 21 देशों की तुलना में भारत के 41 प्रतिशत लोग ही मानसिक समस्याओं के लिए सहायता लेते हैं और मात्र 20 प्रतिशत ही इलाज की प्रक्रिया की पालना करते हैं, जबकि बाकी देशों में यह आंकड़ा लगभग 83 प्रतिशत है। वैश्विक आंकड़ों के अनुसार बच्चों में अवसाद की संभावना लगभग 2 प्रतिशत रहती है, जबकि किशोरों में यह संभावना लगभग 4 से 8 प्रतिशत हो जाती है और 18 साल तक यह 20 प्रतिशत तक हो जाती है यानी कि हर पांच में से एक युवा अवसाद से ग्रसित है।
अवसाद है आत्महत्या का मुख्य कारण
मनोचिकित्सक डॉ. आरके शर्मा के अनुसार विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक युवाओं में अवसाद आत्महत्या के पीछे का मुख्य कारण है एवं मौत का दूसरा सबसे मुख्य कारण है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार 2030 में वैश्विक तौर पर अवसाद सबसे अहम बीमारी के रूप में पैर पसार लेगा। भारत में लगभग 45.7 मिलियन लोग अवसाद से ग्रसित होकर विकलांगता की जिंदगी जी रहे हैं। यूनिसेफ के अनुसार युवाओं में अवसाद की संभावना 31 से 57 प्रतिशत तक रहती है। ज्यादातर समय अवसाद 8 से 12 महीने तक रहता है। 90 प्रतिशत बच्चों एवं किशोरों में अवसाद 1 से 2 साल में पूरी ठीक हो जाता है। बिना पूर्ण इलाज के अवसाद 34 से 50 प्रतिशत बच्चों में 6 महीने से 1 साल में वापस आ जाता है।
किशोरों में अवसाद के लक्षण
- उदासीनता या चिड़चिड़ाहट ज्यादातर समय या लगातार बने रहना
- काम में अरुचि रहने लग जाना या लोगों से अलगाव हो जाना
- भूख में बदलाव/वजन में कमी
- नींद में बदलाव- बेवजह अत्यधिक थकान
- ध्यान में कमी- जिंदगी बेकार लगने लग जाना
- पढ़ाई एवं खेलकूद जैसी अन्य गतिविधियों में गिरावट
- मरने की बातचीत या कोशिश करना
दवाइयों के साथ ही साइकोथैरेपी, फैमिली थैरेपी भी है कारगर
डॉ. शर्मा के अनुसार अगर अवसाद लंबे समय तक बना हुआ है एवं तीव्रता ज्यादा है तो बाल एवं किशोर मनोचिकित्सक से परामर्श अनिवार्य है। ऐसे मामलों में एंटीडिप्रेसेंट दवाइयां प्राथमिकता है। नए जमाने की दवाइयां काफी सुरक्षित हैं और डिप्रेशन ठीक होने के बाद लगभग 6 से 12 महीने में पूरी तरह बंद हो जाती हैं। अगर मनोचिकित्सक की देखरेख में एवं सामयिक परामर्श से दवाइयां ली जा रही हैं तो ज्यादातर बच्चों एवं किशोरों में इनके कोई दुष्प्रभाव भी देखने को नहीं मिलते हैं। दवाइयों के अलावा किशोरों की इंडिविजुअल साइकोथेरेपी जैसे कॉग्निटिव बिहेवियर थैरेपी, इंटरपर्सनल साइकोथैरेपी इलाज में अहम भूमिका रखती है जिसमें किशोरों को उनके नकारात्मक विचारों पर काम करना सिखाया जाता है एवं आने वाली समस्याओं को बेहतर तरीके से संभालना सिखाया जाता है। अवसाद से ग्रसित बच्चों में फैमिली थेरेपी का खासा महत्व है। अभिभावकों को डिप्रेशन, उसके कारणों एवं इलाज के बारे में सही और सामयिक जानकारी दी जाती है एवं उनकी भ्रांतियों का निवारण किया जाता है।
Published on:
10 Oct 2023 11:33 pm
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