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@KUMBH: शाही स्नान के साथ प्रारंभ होगी खूनी नागा योद्धाओं की दीक्षा

अवधूतों को देनी होगी कठिन परीक्षा, मृत्यु से पूर्व करना होगा पिंडदान,  नागा साधु बनाने की प्रक्रिया कुम्भ के दौरान ही पूरी की जाती  है।

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Lalit Saxena

Apr 22, 2016

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उज्जैन.आज सिंहस्थ के प्रथम शाही स्नान के साथ ही उज्जैन में नागा साधु बनाने की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाएगी। नागा साधुओं द्वारा क्षिप्रा में 108 डुबकी लगवाकर नए साधुओं को संस्कारित करने का अनुष्ठान शुरू कर दिया जाएगा। सिंहस्थ में दीक्षित किये जाने वाले साधु खूनी नागा कहलाएंगे। गौरतलब है कि नागा साधु बनाने की प्रक्रिया कुम्भ के दौरान ही पूरी की जाती है।

simhastha-2016/index.php" target="_blank">कुंभ2016 की ख़बरों को पढ़ने के लिए यहांCLICK करें

उज्जैन में दीक्षा लेने वाले खूनी नागा
अलग-अलग कुम्भ में दीक्षित नागाओं को अलग अलग नाम से पुकारा जाता है, जिससे कि इस बात की पहचान हो सके कि उन्होंने दीक्षा कहां से ली है। प्रयाग के महाकुम्भ में दीक्षा लेने वालों को नागा, उज्जैन में दीक्षा लेने वालों को खूनी नागा, हरिद्वार में दीक्षा लेने वालों को बर्फानी व नासिक वालों को खिचडिय़ा नागा के नाम से जाना जाता है। इन्हें अलग-अलग नाम से केवल इसलिए जाना जाता है, जिससे उनकी यह पहचान हो सके कि किसने कहां दीक्षा ली है।

अखाड़ों की जांच के आधार पर चुने जाएंगे योग्य
नागा साधु का जीवन और उनके नागा बनने की प्रक्रिया बेहद मुश्किल होती है ,नागा साधुओं को दीक्षा लेने से पहले कई मुश्किल परीक्षाओं से होकर गुजरना पड़ता है। जूना अखाड़े के खाकी बाबा कहते हैं। एक नागा साधु अपने जीवित रहते हुए मृत्यु उपरान्त के सारे संस्कार कर लेता है।


नहीं करते अखाड़े में शामिल
जब भी कोई व्यक्ति साधु बनने के लिए किसी अखाड़े में जाता है तो उसे कभी सीधे अखाड़े में शामिल नहीं किया जाता। अखाड़ा अपने स्तर पर उस व्यक्ति की जांच करता है। अगर अखाड़े को ये लगता है कि वह साधु बनने के लिए ठीक व्यक्ति नहीं है तो उसे बाहर कर दिया जाता है।

क्षिप्रा में लगानी होगी 108 डुबकी, करना होगा दंडी त्याग
अखाड़ों के नियमों के मुताबिक नए संतों को अखाड़ों में प्रवेश के बाद प्रारम्भिक तीन वर्ष अपने गुरुओं की सेवा करने के साथ-साथ अखाड़ों के नियमों को समझने में व्यतीत होते हैं। इसी दौरान गुरुओं द्वारा उनके ब्रह्मचर्य की परीक्षा ली जाती है। अगर अखाड़ा यह समझता है कि व्यक्ति दीक्षा देने लायक हो चुका है तो फिर अगली प्रक्रिया कुम्भ मेले में प्रारम्भ होती है। इस दौरान दीक्षा के इच्छुक व्यक्ति का मुंडन कराने के साथ उसे 108 बार क्षिप्रा में डुबकी लगवाई जाती है।

होते हैं पांच गुरू
अखाड़ों के भीतर उसके पांच गुरु बनाए जाते हैं। भस्म, भगवा, रूद्राक्ष आदि चीजें दी जाती हैं। ऐसा करके वो ब्रह्मचारी से महापुरुष बन जाता है, पुन: उसे अवधूत बनाया जाता है। अवधूत का जनेऊ संस्कार कराने के साथ उसे संन्यासी के तौर पर जीवनयापन करने की शपथ दिलाई जाती है। इस दौरान उससे परिवार के साथ उसका भी पिंडदान कराया जाता है। इसके पश्चात दंडी संस्कार कराया जाता है और रातभर उसे ओम नम: शिवाय का जाप करना होता है।

महामंडलेश्वर कराते हैं विजया हवन
जाप के बाद भोर में अखाड़े के महामंडलेश्वर उससे विजया हवन कराते हैं। उसके पश्चात सभी को फिर से क्षिप्रा में 108 डुबकियां लगवाई जाती है। स्नान के बाद अखाड़े के ध्वज के नीचे उससे दंडी त्याग कराया जाता है। इस प्रक्रिया के बाद वह नागा साधु बन जाता है।

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