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Kids Care Tips: ‘दादी-नानी न्यू बोर्न बेबी को मालिश के बाद कपड़े में लपेट देती थीं, कंगारू मदर केयर उसी का विकसित रूप’

Kids Care Tips: घर में नवजात या छोटे बच्चे की देखभाल के पुराने कई तरीके आज वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित हैं। दादी-नानी या आया का बच्चे को मालिश कर कपड़े में लपेटना बच्चे की सेहत और विकास के लिए फायदेमंद है। आज बड़े शहरों में खुल रहे कंगारू मदर केयर (केएमसी) इसी का विकसित रूप हैं। ऐसी ही महत्वपूर्ण जानकारी के लिए जरूर पढ़ें इंटरनेशनल पीडियाट्रिक्स एसोसिएशन अध्यक्ष, वरिष्ठ चिकित्सक, शिशुरोग विशेषज्ञ नवीन ठक्कर की ये बातचीत...

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Kids Care Tips: घर में नवजात या छोटे बच्चे की देखभाल के पुराने कई तरीके आज वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित हैं। दादी-नानी या आया द्वारा बच्चे को मालिश कर कपड़े में लपटना, बच्चे की सेहत और विकास के लिए फायदेमंद है। आज बड़े शहरों में खुल रहे कंगारू मदर केयर (केएमसी) इसी का विकसित रूप हैं। बच्चों के स्वास्थ्य और विकास से जुड़ी कुछ ऐसी ही महत्वपूर्ण जानकारी इंटरनेशनल पीडियाट्रिक्स एसोसिएशन के अध्यक्ष वरिष्ठ चिकित्सक शिशुरोग विशेषज्ञ नवीन ठक्कर ने पत्रिका से विशेष साक्षात्कार में दी है। डॉ. ठक्कर उज्जैन में आयोजित दो दिवसीय 54वें एमपी पेडिकॉन कार्यक्रम में शिरकत करने शहर आए थे।

1. सवाल- बच्चों की देखभाल के पुराने तरीके कितने सही हैं, इनसे कोई नुकसान?

जवाब- दादी-नानी वाली कई पद्धतियां सही हैं, लेकिन जिनमें अंधविश्वास है, उनसे बच्चों को खतरा है। जैसे कि बच्चों की आंख में काजल लगाते हैं जबकि इसमें कार्बन होने से यह आंखों के लिए नुकसानदायक है। मां के पहले दूध को नहीं पिलाना गलत सोच है, बच्चे के लिए यह फायदेमंद होता है। दस्त लगने पर इसे यह सोचकर नजरअंदाज करना कि दांत आने से ऐसा हो रहा है या मिजल्स को माताजी आने का नाम देना, गलत मान्यता है। इसी तरह शुरुआत में बच्चे को सिर्फ मां का दूध देना, उसकी मालिश करना, कपड़े में लपेटना, थोड़ा बड़ा होने पर घर ही भोजन देना, यह सही तरीका है।

2. सवाल- क्या बच्चों को प्रोटीन पाउडर देना चाहिए?
जवाब- मिल्क या किसी प्रकार का ऐसा पाउडर देने की आश्वयकता क्या है। मां का दूध और घर का भोजन ही बच्चे के लिए सर्वेश्रेष्ठ है। पाउडर भी इन्हीं से बनाए जाते हैं। यदि आपको बनाने में आलस आता है तो फिर पाउडर दें, चाहे तो बड़े भी इन्हें खा सकते हैं। बच्चों के लिए बोटल फीडिंग भी ठीक नहीं है। ब्रेस्ट फिडिंग करवाना चाहिए।

3. सवाल- कुछ वर्षों में बच्चों में कौनसी बीमारियां कॉमन मिल रही हैं?

जवाब- इसे हम तीन रूप में देख सकते हैं। पहला स्क्रीन टाइम बढ़ने व सोशल मीडिया का साइड इफैक्ट। इससे मेंटल डिसऑर्डर की समस्या बढ़ रही है। दूसरा कम्युनिकेबल डिसीज जिसमें शुगर, ओबेसिटी की शिकायतें मिल रही हैं। तीसरा क्लाइमेंट चेंज। प्रदूषण के कारण बच्चों में अस्थमा, निमोनिया जैसी श्वसन संबंधित समस्या बढ़ी हैं।

4. सवाल- टेस्ट ट्यूब बेबी और प्राकृतिक गर्भधारण के बच्चों के स्वास्थ्य, व्यवहार में कोई अंतर संभव है?
जवाब- इस विषय में कुछ जवाब देना, अभी जल्दबाजी होगा। यह ट्रेंड अभी शुरू हुआ है। कुछ वर्षों की रिसर्च के बाद स्थिति सामने आ सकती है।

5. प्री-मेच्योर डिलीवरी बढ़ रही हैं, इनकी देखभाल नई चुनौती है?

जवाब- क्लाइमेट में बदलाव, बदलती जीवनशैली और आइवीएफ केस बढ़ने के कारण प्री-मेच्योर केस भी बढ़े हैं। इसे स्मॉल एंड लो बर्थ वेट न्यू बोर्न कहते हैं। यह कोई चुनौती नहीं है। ऐसा देखा गया है कि हर जगह एनआइसीयू की जरूरत नहीं है। प्रायमरी केयर, सेकंडरी केयर जिसमें एसएनसीयू वेंटिलेटर आदि मिल जाते हैं और तीसरा केएमसी जैसी स्थिति जिसमें बच्चे को मां के साथ ही रखा जाता है (वेंटिलेटर की स्थिति को छोड़कर)। हमें सेकंडरी लेवल पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। पूरी दुनिया में सेकंडरी लेवल का ही ट्रेंड हैं।

6. सवाल- यूरोपियन देश और भारत में जन्में बच्चों में क्या अंतर पाते हैं?

जवाब- यूरोपियन विकसित देशों में सभी बच्चों का जन्म अस्पताल में ही होता है। सरकार या इन्श्योरेंस कंपनी के जरिए शुरुआत से ही हेल्थ कवर होती है। सभी टीके लगाए जाते हैं। कम उम्र में डिलीवरी या कुपोषण की समस्या नहीं है। भारत में इस तरह की कुछ समस्याएं हैं। इसके विपरित यहां के बच्चों की देखभाल वहां की तुलना में काफी अच्छी है। संयुक्त परिवार इसका कारण है। माता-पिता में नशे की लत की समस्या तुलनात्मक यहां कम है जिससे, बच्चे का स्वास्थ्य अच्छा रहता है। ओबेसिटी और डिसऑर्डर की समस्या वहां अधिक है।

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