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उज्जैन. मित्रता का साक्षी है यह मंदिर। भागवत पुराण के दसवें स्कंद में इसका प्रमाण मिलता है। यहां भगवान श्रीकृष्ण की अनेक लीलाओं में से एक महत्वपूर्ण कहानी भी जुड़ी है। इस स्थान से एक किलोमीटर दूरी पर स्वर्ण गिरी पर्वत है। जहां कृष्ण-सुदामा ने गुरुमाता की आज्ञा से लकडिय़ां चुनी थीं। कृष्ण-सुदामा ने एक रात यहां विश्राम किया था। सुदामा की प्यास बुझाने के लिए श्रीकृष्ण ने भूमि से मिट्टी हटाई थी, वहां से जल निकला था, जिसे आज दामोदर कुंड के नाम से जाना जाता है। गुरु सांदीपनि ने भगवान कृष्ण को इसी स्थान पर नारायण की उपमा दी थी, इसी वजह से इस स्थान का नाम नारायणा पड़ा। यह स्थान जाति-पाति, अमीरी-गरीबी, ऊंच-नीच के भेदभाव से दूर होकर नर-नारायण की मित्रता का जीवंत प्रमाण है। यह अद्वितीय तीर्थ सच्ची मित्रता और गुरु भक्ति का संगम है। विश्व के प्राचीन, पौराणिक, ऐतिहासिक एवं धार्मिक तीर्थ स्थलों में विशिष्ट स्थान रखता है।
उज्जैन से 35 किमी दूर नारायणा ग्राम
वर्ष में तरह-तरह के डे मनाने का प्रचलन है, इसी तर्ज पर 5 अगस्त को फ्रेंडशिप डे मनाया जाएगा। मंदिरों की राजधानी उज्जैन, जहां सभी देवी-देवताओं के कई मंदिर हैं। इसी शृंखला में शहर से करीब 35 किलोमीटर दूर आगर रोड पर जैथल से एक रास्ता नारायणा गांव की ओर जाता है, जहां दो दोस्तों का अनूठा मंदिर है, जिसे कृष्ण-सुदामा धाम के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर अतिप्राचीन है।
कृष्ण-सुदामा की दुर्लभ प्रतिमाएं
फें्रडशिप डे पर जहां लोग अपने प्रिय मित्रों को फें्रडशिप बेल्ट बांधेंगे, उपहार देंगे या अन्य तरीके से इस दिन को सेलिब्रेट करेंगे, वहीं मंदिरों के शहर में एक मंदिर दो दोस्तों के नाम पर भी है, जहां कृष्ण और सुदामा की दुर्लभ प्रतिमाएं मौजूद हैं। यहां के पुजारी का कहना है कि विश्वभर में इनका और कहीं मंदिर नहीं है। यह मंदिर दोस्ती के नाम पर मिसाल है। यहां प्रतिदिन दर्शनार्थी आते हैं। सामान्य दिनों में यहां कथा भागवत व भजन-कीर्तन आदि किए जाते हैं। कृष्ण जन्माष्टमी के दिन यहां मेला लगता है। करीब दो लाख श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं। जन्माष्टमी उत्सव रक्षाबंधन से ही आरंभ हो जाता है।
सांदीपनि आश्रम से गए थे लकड़ी बीनने
पुजारी अंबाराम शर्मा ने बताया कि महर्षि सांदीपनि का आश्रम उज्जैन के मंगलनाथ रोड पर है, जहां द्वापर युग में भगवान कृष्ण और सुदामा ने शिक्षा ग्रहण की थी। गुरुकुल में अध्ययनरत हर छात्र गुरुमाता की आज्ञा से बारी-बारी लकडिय़ां चुनने जंगल जाते थे। माता की आज्ञा से एक दिन कृष्ण-सुदामा भी लकडिय़ां बीनने जंगल गए। दोनों लकडिय़ां चुनते-चुनते दूर तक चले गए। रात हो गई, बारिश होने लगी। दोनों ने रात पेड़ पर चढ़कर गुजारी और चुनी हुई लकडिय़ों को अलग-अलग जगहों पर रख दिया। लकडिय़ों के गट्ठर पानी के कारण भारी हो गए, जिन्हें वे वहीं छोड़कर वापस आश्रम लौट आए। कृष्ण-सुदामा द्वारा रखे गए वे लकडिय़ों के गट्ठर आज पेड़ों के झुरमुट के रूप में नजर आते हैं। इसी स्थान पर दामोदर कुंड भी है।
Published on:
04 Aug 2018 07:10 pm
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