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उज्जैन में खास है गुरुपूर्णिमा का महत्व, युगों से चमत्कारी है रही है यह भूमि

विश्वगुरु स्वयं महाकाल यहां विराजमान हैं। यह नगर जहां युगों-युगों से कई विभूतियों और अवतारियों के चरण पड़े हैं।

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उज्जैन. जिस भूमि पर आकर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने महर्षि सांदीपनि से शिक्षा प्राप्त की, 64 विद्या और 16 कलाएं सीखीं। यह नगर युगों से चमत्कारी रहा है और आज भी है। विश्वगुरु स्वयं भगवान महाकाल यहां विराजमान हैं। यह नगर एकमात्र ऐसा केंद्र है, जहां युगों-युगों से कई विभूतियों और अवतारियों के चरण पड़े हैं। सभी तीर्थों से तिलभर बड़ा होने का गौरव भी इसे प्राप्त है। आषाढ़ मास, शुक्ल पक्ष की पूनम का दिन गुरु को समर्पित है। गुरु वही, जो अज्ञानता के अंधेरे को ज्ञान रूपी प्रकाश से दूर करता है।

गुरु-शिष्य परंपरा का विशेष महत्व
भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य परंपरा का विशेष महत्व बताया गया है। प्राचीन समय में बच्चों को पढ़ाने के लिए गुरुकुल भेजा जाता था। जब शिष्य पूरी शिक्षा प्राप्त कर घर लौटता था तो अपने गुरु को सम्मान स्वरूप गुरु दक्षिणा देता था। गुरु-शिष्य की यही परंपरा आज भी जारी है। शुक्रवार को गुरु पूर्णिमा पर पूरे शहर में शिष्य अपने गुरुओं का पाद-पूजन कर उन्हें सम्मानरूपी दक्षिणा प्रदान करेंगे।

कुंडली के अनुसार करें गुरु पूजन
ज्योतिषाचार्य पं. अमर डिब्बावाला ने बताया कि ज्योतिष शास्त्र में गुरु पूजन का विशेष महत्व है। जिन लोगों की कुंडली में गुरु प्रतिकूल स्थान पर होता है, वे यदि आज यह उपाय करें तो उन्हें इससे विशेष लाभ होगा। कुंडली में गुरु नीचस्थ राशि में यानी मकर राशि में है, तो गुरु यंत्र की पूजा करनी चाहिए। गुरु, राहु, गुरु, केतु या गुरु, शनि युति में होने पर भी यह यंत्र लाभदायी होता है। कुंडली में गुरु नीचस्थ स्थान यानी 6, 8 या 12वें स्थान पर है, तो आपको गुरु यंत्र रखना चाहिए एवं उसकी नियमित तौर पर पूजा करनी चाहिए।

क्या करें उपाय
भोजन में केसर का प्रयोग करें, स्नान के बाद नाभि तथा मस्तक पर केसर का तिलक लगाकर साधु, ब्राह्मण एवं पीपल के वृक्ष की पूजा करें। पीले रंग के फूल वाले पौधे घर में लगाएं और पीला रंग उपहार में दें। केले के दो पौधे भगवान विष्णु के मंदिर में लगाएं। मंदिर में खड़े मूंग दान करें और 12 वर्ष से छोटी कन्याओं के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें। शुभ मुहूर्त में चांदी का बर्तन अपने घर की भूमि में दबाएं और साधु संतों का अपमान नहीं करें। जिस पलंग पर आप सोते हैं, उसके चारों कौनों में सोने की कील अथवा सोने का तार लगाएं। जिनकी कुंडली में गुरु वक्री या अस्त है, वे अपने गुरु का बल प्राप्त नहीं कर पाते, गुरु यंत्र की पूजा करनी चाहिए। जिनकी कुंडली में विद्याभ्यास, संतान, वित्त एवं दाम्पत्य जीवन संबंधित तकलीफ है, उन्हें विद्वान ज्योतिष की सलाह लेकर गुरु का पूजन करना आवश्यक है। इसके अलावा कुंडली में हो रहे हर तरह के वित्तीय दोष को दूर करने के लिए आप श्री यंत्र की पूजा करें, तो अधिक लाभ होगा।

वर्षभर में 12 पूर्णिमाएं आती हैं
धर्मशास्त्र की मान्यतानुसार पूरे वर्ष में 12 पूर्णिमाएं आती हैं, इनमें विशेषतौर पर आषाढ़ी पूर्णिमा का बड़ा महत्व है, क्योंकि यह बड़ी पूर्णिमा मानी जाती है। इससे संबंधित सूर्य का गौचर काल, प्रकृति पर व्यापक प्रभाव डालता है। साथ ही इस पूर्णिमा को आषाढ़ी पूनम एवं भैरव पूजनी पूनम के नाम से जाना जाता है। यह पूर्णिमा पूर्ण क्रम से आती है, इसलिए इस दिन को गुरुपूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। यह दिन दैहिक तथा शैक्षिक गुरु की पूजन का भी है।

प्राकृतिक सिद्धांत में सूर्य का विशेष महत्व
माना जाता है कि इस दौरान ग्रह गौचर तथा प्राकृतिक सिद्धांत में सूर्य का विशेष महत्व रहता है। इसका मुख्य कारण यह है कि सूर्य को आत्मा, आध्यात्म तथा ज्ञान एवं अंतर अनुभूति का कारक ग्रह माना गया है, जब यह कर्क राशि में गोचर करता है, तो इसका विशेष प्रभाव होता है। क्योंकि कर्क राशि का स्वामी चंद्रमा है, चंद्रमा मन तथा इंद्रियों का कारक ग्रह है। जब सूर्य चंद्रमा की राशि में गोचरस्थ होता है, तब मन, बुद्धि, आत्मा तीनों का प्रभाव जीवन में देखने को मिलता है। यह अध्यात्म का उदय करते हैं।

अध्यात्म के लिए मार्गदर्शन की आवश्यकता
अध्यात्म के लिए मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। सही दिशा में मार्गदर्शन करने वाला गुरु कहलाता है। यही कारण है कि आषाढ़ी पूर्णिमा पर सूर्य का प्रभाव मुख्य रूप से रहता है। यह पूनम मन, बुद्धि, आत्मा के विकास के लिए श्रेष्ठ मानी जाती है, इसलिए इस दिन का शास्त्रीय महत्व है।

उज्जैन क्यों है खास...
उज्जैन में भगवान महाकाल, माता हरसिद्धि एवं उत्तरवाहिनी शिप्रा है। इसके अलावा नवनाथ की सिद्ध भूमि है। इस कारण गुरु पूर्णिमा का विशेष महत्व और भी बढ़ जाता है। क्योंकि आषाढ़ मास में पूर्णिमा के दिन ही श्रावण की शुरुआत भी होती है। यह समय भक्ति एवं उल्लास का रहता है, इस कारण मन, बुद्धि, आत्मा गुरु का वरण करके दीक्षा तथा शिक्षा के माध्यम से आगे बढ़ते हैं और जीवन को हर तरह से सफल बनाने का प्रयास करते हैं। इसीलिए इस दिन को गुरुपूर्णिमा के नाम से जाना जाता है।