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Ulte Hanuman Ji: यहां सिर के बल खड़े हैं हनुमानजी, तुरंत पूरी हो जाती हैं सालों पुरानी मनोकामनाएं

-मान्यता है कि ऐसी प्रतिमा जिसके दर्शन से दूर हो जाते है कष्ट-सिर के बल उल्टे हनुमान, सीधे कर देते हैं श्रद्धालुओं के सभी काम

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उज्जैन। आपने हनुमानजी के मंदिरों में खड़ी और बैठी हुई मूर्ति देखी होगी, लेकिन शायद ही कहीं बजरंगबली की उल्टी प्रतिमा देखी होगी। दरअसल, इंदौर से करीब 25 किलोमीटर दूर उज्जैन रोड पर स्थित सांवेर में एक प्राचीन काल के मंदिर में बजरंगबली की उल्टी प्रतिमा स्थापित है। इसके पीछे पौराणिक कहानी है।

मंदिर के पंडित नवीन बताते है कि बल और बुद्धि के देवता माने जाने वाले भगवान हनुमान की शीर्षासन करती हुई प्रतिमा कहीं और नहीं है। हनुमान जी की विश्व की इकलौती और अनोखी प्रतिमा केवल इंदौर से उज्जैन के रास्ते में सांवेर के पास ही स्थित है। मंदिर में भगवान हनुमान की उल्टी प्रतिमा के बारे में मंदिर के पंडित ने बताया है कि जब भगवान श्रीराम और रावण का युद्ध हो रहा था, तो रावण के मित्र पातालराज अहिरावण ने एक चाल चली। वह भेष बदलकर राम की सेना में शामिल हो गया और रात्रि को जब सभी सो रहे थे, तब अहिरावण मायावी शक्ति से श्रीराम और लक्ष्मण को मूर्छित कर उनका अपहरण कर पाताललोक ले गया।

इस बात की जानकारी वानर सेना और हनुमान जी को पता चली कि राम और लक्ष्मण को अहिरावण पाताल ले जाकर उनकी बलि देने जा रहा है, तब हनुमानजी उन दोनों की खोज में पाताल लोक पहुंच जाते हैं और भगवान राम और लक्ष्मण सहित अहिरावण से युद्ध कर उसका संहार कर देते हैं और उन्हें पाताल से निकाल कर सुरक्षित बाहर ले आते हैं। इसलिए कई लोगों का मानना है कि सांवेर स्थित उल्टे हनुमान मंदिर में स्थापित यह प्रतिमा बजरंगबली के द्वारा उनके पाताल विजय की प्रतीक है। जब केसरीनंदन पाताल लोक जा रहे थे, तब उस समय भगवान के पांव आकाश की ओर और सिर धरती की ओर था। यही कारण है कि यहां उनके इस उल्टे रूप की पूजा की जाती है। इस मंदिर में हनुमानजी के साथ भगवान श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण की भी मूर्तियां विराजमान हैं।

मंदिर में एक मुख्य मान्यता यह है कि यदि कोई व्यक्ति तीन मंगलवार या पांच मंगलवार तक इस मंदिर में दर्शन के लिए लगातार आता है, तो उसके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। उसकी सभी मनोकामनाएं भी पूर्ण होती है। यहां मंगलवार को हनुमानजी को चोला चढ़ाने की मान्यता भी है। मंदिर परिसर में पीपल, नीम, तुलसी, बरगद के पेड़ हैं। यहां कई संतों की समाधियां हैं। सन् 1200 तक का इतिहास यहां मिलता है। मंदिर के आस-पास के वृक्षों पर तोतों के कई झुंड भी हैं।