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सफाई के नियुक्त श्रमिक कैसे बन गए प्रशासनिक अधिकारी

एक साल नियुक्ति प्रक्रिया की जांच, ९ में से एक श्रमिक को कर चुके हैं बाहर

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उज्जैन. विक्रम विश्वविद्यालय में विवादित दैनिक वेतन भोगी नियुक्ति प्रक्रिया ने सभी कर्मचारियों को फंसा दिया है। विवि के दैवेभो कर्मचारियों को स्थाईकर्मी का दर्जा प्रदान किया जाना है। इसके लिए उच्च शिक्षा विभाग विश्वविद्यालय से सूची मांगी है, लेकिन उक्त सूची में त्रुटियों के चलते मामला अटक गया है। विक्रम विवि में भी करीब ९ कर्मचारियों की नियुक्ति विवादित है। नियमों को ताक पर रखकर नियुक्त हुए इन दैवेभो की जांच करीब एक साल से चल रही है, लेकिन नतीजा नहीं निकला है। इन ९ में से एक कर्मचारी को विवि ने बाहर का रास्ता भी दिखा दिया है।

सफाई के लिए नियुक्त हुए कर्मचारी
विवि के एसओइटी संस्थान में मई २०१२ में चार कुशल और पांच अकुशल श्रमिकों को कक्षा, प्रयोगशाला और परिसर की साफ-सफाई के लिए रखा गया। इसमें कुशल में नवीन राजौरिया, प्रज्ञा पाठक, संजय शर्मा, लोकेश टोपे और अकुशल में राहुल पराते, विनोद कुशवाह, मनीष शेखवार, सादव खान, गौरव सिरोलिया शामिल है। इन सभी कर्मचारी को ६० दिन के लिए कलेक्टर रेट पर नियुक्त किया गया। नियुक्ति प्रस्ताव में इन सभी को श्रमिक के रूप में दर्शाया है।

गड़बड़ी को सफाई से दिया अंजाम
विवि के अधिकारियों ने नियुक्ति की प्रक्रिया की गड़बड़ी को बड़ी ही सफाई से अंजाम दिया। पहली बार चली नोटशीट में ६० दिन सफाई के लिए श्रमिक मांगे गए, लेकिन अगस्त २०१२ में इन लोगों की पुन: नियुक्ति प्रस्तावित हुई। इसमें विभाग में विद्यार्थियों की संख्या बढऩे के चलते कर्मचारी की आवश्यकता होने की बात शामिल कर दी गई। बता दें, उक्त अवधि में ही उच्च शिक्षा विभाग ने दैवेभो की नियुक्ति पर रोक लगा दी थी। नोटशीट पर रोक दिनांक के पहले और नियुक्ति प्रक्रिया बाद में होने की बात सामने आई।

त्रुटियों के चलते अटकी लिस्ट
उच्च शिक्षा विभाग ने दैवेभो की सूची मांगी। इस सूची में कई तरफ की तकनीकी त्रुटि पाई गई है। शुक्रवार को भोपाल में विश्वविद्यालय की समीक्षा बैठक में उच्च शिक्षा मंत्री जयभान सिंह पवैया ने दैवेभो को जल्द ही नियमित व स्थाई करने की बात कही, लेकिन सूची में त्रुटि को समस्या बताया।

एक बाहर, शेष को काम
विवि ने वर्ष २०१६ में उक्त कर्मचारियों के काम की अवधि को आगे बढ़ाने से रोक दिया। इसमें एक कर्मचारी प्रज्ञा पाठक बाहर हो गई। राजनीतिक दबाब में शेष कर्मचारियों की फाइल को आगे बढ़ा दिया। इस सूची में अधिकांश कर्मचारी छात्र संगठन एबीवीपी के पूर्व पदाधिकारियों से संबंध रखते हैं।