21 जनवरी 2026,

बुधवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

2 हजार दुकानों पर कारोबार, कुमकुम-मेहंदी का सबसे बड़ा बाजार

अब धार्मिक ग्रंथ, पौशाकें, माला, अष्टगंध आदि वस्तुओं की भी बिक्री, गोपाल मंदिर के बाहर 1960 से सज रहा मेहंदी-कुमकुम का बाजार

2 min read
Google source verification
kumkum.png

1960 से सज रहा मेहंदी-कुमकुम का बाजार

उज्जैन. सुहाग से जुड़ी कुमकुम और मेहंदी हमारे शहर की पहचान बन गई। विदेशियों तक को यहां की मेहंदी-कुमकुम लुभाती है। दर्शनार्थी शहर के अनेक मंदिरों में घूम-फिर कर जब लौटने की बारी आती, तो यहां आकर वे अपने साथ कुमकुम-मेहंदी जरूर ले जाते थे। उज्जैन से इंदौर व अन्य शहरों में अपडाउन करने वालों से भी लोग यहां की प्रसिद्ध मेहंदी-कुमकुम मंगाते थे, यह सिलसिला आज भी जारी है। शहर की बहन-बेटी यहां से कहीं दूर ब्याह कर चली जाती हैं, लेकिन जब भी वे अपने मायके आती हैं, तो जाते समय कुमकुम-मेहंदी ले जाती हैं। पैकेट वाली मेहंदी का उठाव कुछ कम जरूर हुआ है, लेकिन कुमकुम की आज भी वही डिमांड है।

गोपाल मंदिर के बाहर मेहंदी-कुमकुम की कई दुकानें हैं। बाहर से आने वालों को ये दुकानें बरबस ही अपनी तरफ आकर्षित करती हैं। 1960 से इन वस्तुओं का बाजार यहां लगता आ रहा है, तब यहां सिर्फ 8 दुकानें ही हुआ करती थीं। मेहंदी और कुमकुम सबसे ज्यादा शादी-ब्याह के सीजन में बिकते हैं। ऑफ सीजन में इसका सीजन सामान्य रूप से चलता है, लेकिन फिर भी उज्जैन क्योंकि धार्मिक शहर है। देश-विदेश के श्रद्धालुओं के आने का सिलसिला चलता है, इसलिए इस बाजार की रौनक कभी खत्म नहीं होती, बल्कि लगातार साल-दर-साल बढ़ती जा रही है।

मल्टीपर्पज हो गए बाजार- व्यापारी नीलेश सुगंधी का कहना है कि अब कुमकुम-मेहंदी पर ही व्यापारी आश्रित नहीं रहते, बाजार मल्टीपर्पस हो गए हैं। पान की दुकान वाला भी अष्टगंध, कुमकुम-मेहंदी के पैकेट रखने लग गए। इसलिए इन चीजों का बाजार पूरे शहर में फैल चुका है।

मेहंदी पर भारी पड़ रहे मेहंदी के कोण
व्यापारी राकेश माहेश्वरी ने बताया कि रेडिमेड मेहंदी पावडर का पैकेट क्वालिटी के अनुसार 80 से 150 रुपए तक मिलता है, लेकिन मेहंदी के कोण बाजार में कहीं भी 3-3 रुपए में मिल जाते हैं। आजकल महिलाओं के पास भी समय नहीं रहता, इसलिए वे 60-80 रुपए में दोनों हाथ बाजार में ही मंडवा लेती हैं, इसलिए भी बाजार में पैकेट वाली मेहंदी का उठाव कम हो गया है, लेकिन कुमकुम की आज भी वही डिमांड है। लोग रंग वाला और नकली कुमकुम से बचना चाहते हैं, क्योंकि वह प्रतिमाओं को खराब कर देता है।

धार्मिक नगरी के कारण अधिक प्रचलित
मेहंदी व्यापारी एसोसिएशन के अध्यक्ष बालकृष्ण चौरसिया ने बताया धार्मिक नगरी के कारण यह धंधा काफी प्रचलित है। पहले के समय में इतना ज्यादा उठाव नहीं रहता था, लेकिन अब न सिर्फ वैवाहिक सीजन, बल्कि हर मौसम वार-त्योहार में इन चीजों की डिमांड बनी रहती है। अब व्यापारी अपने यहां मेहंदी-कुमकुम के साथ-साथ मूर्तियां, पौशाकें, मालाएं, चंदन, अगरबत्ती आदि रखने लगे हैं।