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उज्जैन की गली-गली में घूमे हैं राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, शादी के कपड़े भी यहीं सिलाए, जानिए बार-बार क्यों आते थे यहां

30 मई को है राष्ट्रपति कोविंद की विवाह वर्षगांठ  

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30 मई को है राष्ट्रपति कोविंद की विवाह वर्षगांठ

उज्जैन। राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द रविवार को उज्जैन के दौरे पर हैं। वे सुबह यहां आए और एक कार्यक्रम में शामिल हुए। इसके बाद राष्ट्रपति सपत्नीक महाकाल मंदिर पहुंचे जहां महाकाल के दर्शन कर पूजा—अर्चना की। राष्ट्रपति अब सर्किट हाउस में दोपहर का भोजन कर शाम को उज्जैन से इंदौर के लिए रवाना हो जाएंगे। धर्मनगरी उज्जैन से राष्ट्रपति का पुराना नाता रहा है। राष्ट्रपति बनने के पूर्व वे यहां कई बार आए और अनेक दिनों तक रुके. अपने संबोधन में भी उन्होंने खुद कहा कि मैं यहां की गलियों में खूब घूमा हूं। राष्ट्रपति कोविंद की शादी के कपड़े भी यहीं सिलाए गए थे. यहां तक कि उनके विवाह का भोजन भी उज्जैन के हलवाइयों ने ही तैयार किया था।

उज्जैन के दौरे ने उनकी यादें ताजा कर दी हैं. देवास और मुरैना के पूर्व सांसद स्वर्गीय हुकुमचंद कछवाय को राष्ट्रपति कोविंद से बहुत स्नेह और प्रेम था. जब वे दिल्ली अध्ययन करने गए तो कछवाय ने अपने दिल्ली स्थित सरकारी बंगले में ही उनकी रहने—खाने की व्यवस्था की। इतना ही नहीं, पूर्व सांसद स्वर्गीय कछवाय ने ही महानगर टेलीफोन निगम में मुख्य सेक्शन सुपरवाइजर रहीं सविता से उनका विवाह भी कराया। रविवार को उज्जैन आगमन पर पूर्व सांसद की पत्नी रामकुमारी बाई और बेटे सुनील कछवाय उनसे विशेष रूप से मिलने आए हैं।

सुनील कछवाय बताते हैं कि रामनाथ कोविन्द से हमारे परिवार का गहरा नाता है। पिताजी ने न केवल उनकी अध्ययन, रहने आदि की व्यवस्था की बल्कि उनका विवाह भी कराया था। उनके विवाह के लिए मालीपुरा स्थित गोथरवाल टेलर ने कपड़े सिले थे। राष्ट्रपति कोविंद की शादी में भोजन भी उज्जैन के गोला मंडी क्षेत्र निवासी लादूराम एवं लालू राम नामक हलवाइयों ने बनाया था। 30 मई को राष्ट्रपति कोविंद की विवाह वर्षगांठ है।

सत्यनारायण पंवार कोली समाज के पूर्व अध्यक्ष और सांसद हैं। वे भी राष्ट्रपति से मिलने आए हैं। उन्होंने बताया कि कोविंद से उनकी बहुत पुरानी मित्रता है। मैंने सामाजिक संगठन को मजबूत बनाने के लिए रामनाथ कोविन्द के साथ देश के कई राज्यों में भ्रमण किया है। इस काम के अलावा भी रामनाथ कोविन्द कई बार उज्जैन आए। अंतिम बार वे बिहार के राज्यपाल के रूप में महाकाल दर्शन करने उज्जैन आए थे।