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बदलते दौर में शिक्षा के स्वरूप में परिवर्तन, लेकिन शिक्षक का महत्व बरकरार

बदलते दौर में शिक्षा के स्वरूप में भले ही परिवर्तन हो गया है, लेकिन भारतीय समाज में शिक्षक का महत्व बरकरार है।

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उज्जैन. बदलते दौर में शिक्षा के स्वरूप में भले ही परिवर्तन हो गया है, लेकिन भारतीय समाज में शिक्षक का महत्व बरकरार है। आज भी शिक्षक को भगवान से बढ़कर दर्जा है और समाज में सम्मान है। हो भी क्यों न शिक्षक भले ही कितनी परेशानी में हो लेकिन अपने विद्यार्थियों के उज्जवल भविष्य में कभी कोताही नहीं बरतता। अब तो शिक्षकों की भूमिका बच्चों को पढ़ाने ही नहीं उन्हें भविष्य के लिए तैयार करने महती भूमिका की ओर बढ़ रहे है।

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था कि 'शिक्षक वह नहीं जो छात्र के दिमाग में तथ्यों को जबरन ठूंसे बल्की वह है जो उसे आने वाले कल की चुनौतियों के लिए तैयार करें । Ó शहर में ऐसे ही कई शिक्षक हैं, जिन्होंने पढ़ाई को मिशन समझा और एक कदम आगे बढ़कर विद्यार्थियों का भविष्य गढ़ा। शिक्षक दिवस पर शहर के कुछ ऐसे भी शिक्षक हैं, जो अपना सर्वस्व देकर नई पीढ़ी को कामयाब बना रहे हैं।

बच्चों को दिए ऐसे शिक्षा संस्कार, बन रहे डॉक्टर-इंजीनियर
पढ़ाई में रटनतोता की जगह अगर हम उसे प्रैक्टिकल के रूप में समझाएं तो आसानी से याद हो जाता है और जब पढ़ाई के कोर्स को घर की एक्टिविटी से जोड़ दें तो यह बच्चों के सीधे जेहन में बैठ जाती है। बस जरूरत है तो पढ़ाने का खास तरीका, बच्चों के प्रति प्रेम और उन्हें समझने की। एक बार बच्चों में संस्कार भावना पैदा हो जाए तो फिर उनकी उन्नति कभी नहीं रुक सकती। कुछ ऐसा ही केंद्रीय विद्यालय से सेवानिृवत्त प्राइमरी कक्षा की शिक्षिका विद्या शर्मा ने किया है। इवीएस जैसे विषय को पढ़ाते-पढ़ाते उन्हें ऐसी कई टेक्निक अपनाई, जिससे बच्चों की पढ़ाई आसान हुई तो साइंस जैसे विषय भी सरल लगने लगे। शर्मा का कहना है कि पढ़ाई की पहली नींव प्राइमरी शिक्षा है। नवंबर १९९९ में सेंट्रल स्कूल में पढ़ाने आई, तब से ही प्राइमरी बच्चों में संस्कार के साथ, पढऩे के प्रति दिलचस्पी, अनुशासन और समझने-जानने के प्रति जिज्ञासा बढ़ाने का काम किया। पढ़ाई के हर विषय को घर में होने वाली एक्टिविटी से जोड़ा। बच्चों को बताया कि कैसे घरों के गमले में हम एक बीज बोते हैं, खाद और पानी देते हैं तो वह बढ़कर पौधा और फिर फूल खिलते हैं। बचपन से सीखने की ललक हो जाए तो उनका भविष्य हमेशा उज्जवल होता है। बच्चों के साइंस जैसे विषय के प्रति जोडऩे पर शर्मा को रमन शताब्दी पर सरकार की और साइंस डेवलपमेंट के लिए पुरस्कृत भी किया जा चुका है।

बच्चों से दिल से जुडऩे की जरूरत
अगर आप शिक्षक हैं तो आपको बच्चों से दिल जुडऩे की जरूरत है। उनकी कमियां, अच्छाई, आदतों से आपको सीधे जुडऩे होगा। जब तक एक शिक्षक में अपने विद्यार्थियों के बारे में पता नहीं होगा वह उसे अच्छा विद्यार्थी नहीं बना सकेगा। शर्मा के मुताबिक उन्हें ३३ वर्ष की नौकरी में हर दिन विद्यार्थियों को आत्मीयता के साथ पढ़ाया।

अभाव में पढ़े, इसलिए दूसरों को कमी नहीं खलने देते
शिक्षक कल्याण शिवहरे... रसायन शास्त्र का शायद ही कोई ऐसा विद्यार्थी हो जो इस नाम से परिचित न हो, लेकिन यह कम ही लोग जानते हैं कि सुबह से देर शाम तक पढ़ाने वाले शिवहरे सर की क्लास में लगभग २० प्रतिशत बच्चे ऐसे होते हैं, जिनसे वह फीस नहीं लेते या नाम मात्र लेते हैं। आदिवासी छात्रावास की छात्राओं को तो वह वर्षों से नि:शुल्क शिक्षा दे रहे हैं। इनके अलावा ऐसे जरूरतमंद व होनहार विद्यार्थी जो रुपयों के अभाव में कोचिंग नहीं जा पा रहे हैं, उनके लिए शिवहरे सर एक बड़ा सहारा हैं। कोचिंग सेंटर संचालक कल्याण शिवहरे ने स्वयं अभाव में रहकर अपनी पढ़ाई पूरी की। उनके अनुसार परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी कि वह बेहतर कोचिंग, अतिरिक्त पुस्तकें ले सकें। जैसे-तैसे वह संसाधन जुटाते और पढ़ाई करते। अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए कम उम्र में ही घर-घर जाकर बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। ट्यूशन से जो रुपए मिलते, वह अपनी पढ़ाई पर खर्च कर देते। अभाव में पढऩे के दौरान ही उन्होंने तय कर लिया कि कॅरियर के रूप में वह कोचिंग सेंटर शुरू करेंगे और किसी वास्तविक जरूरमंद विद्यार्थी को रुपयों के अभाव में ट्यूशन से वंचित नहीं होने देंगे। आज उनके साथ कुछ अन्य शिक्षकों का भी समूह है जो जरूरतमंदों को नि:शुल्क पढ़ाने के कार्य में सहयोग करता है।

जनसहयोग से फर्नीचर जुटाया, पंखे भी लगवाए
बडऩगर. तहसील के गावड़ीलोधा में स्थित प्राथमिक विद्यालय में पदस्थ सहायक शिक्षक ने गांव के लोगों में शिक्षा के प्रति ऐसी जागरुकता फैलाई कि ग्रामीणों ने जनसहयोग कर विद्यालय का नक्शा ही बदल दिया। शिक्षक के आग्रह पर ग्रामीणों ने विद्यालय भवन के लिए जमीन, कक्ष, फर्नीचर, अलमारी, बिजली उपकरण, मध्याह्न भोजन के लिए थाली, गिलास जैसी तमाम व्यवस्थाएं जनसहयोग से उपलब्ध करा दी हैं। कहा गया है कि समाज निर्माण में शिक्षक की अहम भूमिका होती है। किसी देश के निर्माण में शिक्षक का विशेष महत्व होता है। इन पक्तियों को प्राथमिक विद्यालय गावड़ीलोधा मेंं सहायक शिक्षक के पद पर पदस्थ सुरेश शर्मा (57) निवासी सोमेश्वर पथ बडऩगर ने चरितार्थ किया है। शिक्षक ने सन् 1986 में गांव के स्व. भवरसिंह सिसाौदिया से करीब आधा बीघा जमीन विद्यालय के लिए दान में ली थी। इसके बाद से तो जनसहयोग का सिलसिला आज-तक चल रहा है। शिक्षक ने पारदर्शिता और ईमानदारी रखने के उद्देश्य से किसी भी दान दाता से नकद राशि नहीं ली। सभी से सामग्री ही प्राप्त की और उन सामग्रियों पर दानदाता का नाम अंकित कराया।

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