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उज्जैन के क्लासिकल गायक ने पाई देश-विदेश में ख्याति, बनाया ये मुकाम

घर से ही हुई गायन की शुरुआत, 4 वर्ष की आयु में पिता से ली संगीत की पहली शिक्षा

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ललित सक्सेना@उज्जैन. शहर के क्लासिकल गायक रवि परचुरे ने अपनी गायिकी के बल पर न सिर्फ सिंगापुर, बल्कि देश-विदेश में ख्याति प्राप्त की है। महज चार वर्ष की उम्र से ही अपने पिता श्रीपाद परचुरे (वकील) से प्रथम गुरु के रूप में गायन कला सीखी, इसके बाद वे सीढ़ी दर सीढ़ी आगे बढ़ते चले गए। उज्जैन के कालिदास समारोह, श्रावण महोत्सव से लेकर देशभर में आयोजित होने वाले क्लासिकल प्रोग्रामों में उन्होंने अपनी कला का जौहर दिखाया। उज्जैन में अप्पा साहब फड़के से गायन सीखा। माता प्रतिभा परचुरे जो कि ग्वालियर से थीं तो वहां के घराने संस्कार भी विरासत में मिले। साथ ही मनोहर भागवत जी से भी संगीत शिक्षा ली।

कुछ ऐसा रहा संगीत यात्रा का सफर

रवि परचुरे ने उज्जैन में एलएलबी तक शिक्षा प्राप्त की। फिर कॅरियर बनाने की ललक क्लासिकल संगीत की ओर ले गई। पुणे में ललित कला केंद्र नामक संस्था में म्यूजिक में मास्टर डिग्री ली। पुणे में एचओडी डॉ. शुभांगी बहुलीकर ने मुंबई के पं. अरुण कशालकर जी का पता दिया, वहां 5 वर्ष तक उनके घर रहकर गुरुकुल पद्धति से संगीत की शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद पुणे में ही प्रसिद्ध सितार वादक उस्मान खान साहब से मुलाकात हुई, वे मलेशिया, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड व सिंगापुर आदि देशों में स्वामी शांतानंद सरस्वती जी द्वारा स्थापित संस्थाओं से वे जुड़े थे, उन्होंने पूछा कि क्या सिंगापुर जाकर गायन सिखाने में दिलचस्पी है, तो मैंने अपने गुरुजी से इस बारे में चर्चा की। उन्होंने इसकी आज्ञा दी और 2007 में मैं सिंगापुर चला गया। वहां की संस्था में अभी विदेशी बच्चों को गायन सिखा रहा हूं।

भाषा को लेकर कभी परेशानी नहीं आई
उन्होंने बताया कि सिंगापुर में जो हिंदी भाषी और बृजभाषा को जानने वाले लोग हैं, उनमें सीखने का नजरिया और ललक बहुत ज्यादा है। वे इसके लिए पहले से तैयारी करते हैं, फिर गायन सीखने आते हैं।

कौन से राग व घराना से हैं

ग्वालियर और आगरा घराने को गाते हुए मैंने संगीत में यह मुकाम हासिल किया है। हाल ही में पुणे में आयोजित कार्यक्रम में आगरा घराने के मोमतोम अलापी, राग भीम पलासी, धु्रपद अलापी, बड़ा ख्याल-छोटा ख्याल और रागश्री में प्रस्तुतियां दीं। गुरु पं. ओम कछालकर द्वारा रचित बंदिश और अंत में तराना से कार्यक्रम का समापन किया।

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