
विक्रम विश्वविद्यालय का कारनामा
उज्जैन. विक्रम विश्वविद्यालय प्रशासन ने अनोखा कारनामा कर दिया। हजारों की संख्या में त्रुटिपूर्ण उपाधियां तैयार करने पर दोषियों से इसकी राशि वसूल होना थी, लेकिन विवि के कर्ताधर्ताओं ने राशि का भुगतान कर दिया। खास बात यह कि भुगतान के बाद सूची के अनुसार जिसकी पात्रता थी, उन्हें राशि नहीं मिली और अपात्रों ने राशि को बांट लिया।
विक्रम विश्वविद्यालय द्वारा कार्यपरिषद के निर्णय के हवाले से उपाधि जांचने के लिए प्रति उपाधि के मान से कर्मचारियों को विवि द्वारा २० रुपए दिए जाते हैं। विवि ने कर्मचारियों के लिए वर्ष २०१३-१४ की उपाधि जांचने के मानदेय के तौर पर ४.७० लाख रुपए भुगतान कर दिया। राशि कर्मचारियों के खाते में भी पहुंच गई। कार्यपरिषद के निर्णय अनुसार राशि की पात्रता उन कर्मचारियों को है, जिन्होंने उपाधि की जांच का काम किया है। राशि का भुगतान ८ से १० पात्र अधिकारी-कर्मचारी को होना था, लेकिन इनको छोड़कर अन्य अपात्र अधिकारी-कर्मचारी को भुगतान हो गया है। बताया जाता है कि इस राशि का हिस्सा उन कर्मचारियों के खाते में पहुंच गया, जिन्होंने काम नहीं किया और वे मानदेय के पात्र नहीं थे। इस पर पात्र कर्मचारियों के आपत्ति लेने के बाद इसका खुलासा हुआ।
सात हजार उपाधि हुई थीं खराब
विवि में कई स्तर पर जांच की व्यवस्था होने के बाद भी अनेक गलती और विसंगतियों के कारण करीब ७ हजार उपाधि खराब हो गई थी। नतीजतन विवि को इतनी ही उपाधि फिर से प्रकाशित करना पड़ी थी। वर्ष २०१३-१४ की उपाधि जांच के मानदेय ४.७० लाख रु. की फाइल वर्ष २०१७ में तत्कालीन कुलपति एसएस पांडे के समक्ष प्रस्तुत की गई। ७ हजार उपाधि खराब होने पर कुलपति पांडे ने मानदेय को स्वीकृत नहीं किया। वहीं फाइल पर टीप दी कि उपाधि गलत प्रकाशित/तैयार करने में दोषी अधिकारी-कर्मचारी से नई उपाधि तैयार करने में होने वाले खर्च की वसूली की जाए। इसके बाद तीन वर्ष तक किसी ने भी इस मानदेय की चर्चा नहीं की। पूर्व कुलपति द्वारा रोके गए भुगतान पर चार दिन पहले स्वीकृति और फिर राशि जारी होने के बाद जब कुछ अधिकारी-कर्मचारी इस मानदेय से वंचित हो गए तो मामला सामने आया है। इसे लेकर राशि से वंचित अधिकारियों-कर्मचारियों ने कुलपति-कुलसचिव से मिलकर आपत्ति ली है।
एेसे किया जाता है गड़बड़झाला
राशि स्वीकृति के बाद चेक बनते ही अधिक वेतन वाले कर्मचारियों के खाते में टैक्स लगने के कारण छोटे स्तर के कर्मचारियों के खाते में अधिक राशि ट्रांसफर की जाती है। संबंधित कर्मचारी यह राशि खाते से निकालने के बाद विभाग प्रमुख को नकद राशि देते हैं। इसके बाद ही कुलपति, कुलसचिव कार्यालय, ऑडिट विभाग, लेखा विभाग के साथ ही अन्य अधिकारियों- कर्मचारियों को भी बांटी जाती है।
नहीं रुकती है फाइल
पूर्व कुलपति की आपत्ति के बाद ४.७० लाख रुपए के मानदेय की फाइल भले लंबित थी, लेकिन आमतौर विक्रम विवि में कर्मचारियों के भत्तों की फाइल नहीं रुकती है। विक्रम विश्वविद्यालय की व्यवस्थाएं भले ही पटरी पर नहीं हो, लेकिन यहां पर लाखों रुपए के भुगतान के फाइल रुकती नहीं है। दरअसल मानदेय भुगतान में विभागीय अधिकारी और कर्मचारियों का भी हिस्सा तय रहता है। लिहाजा भुगतान की प्रक्रिया तेजी से कराई जाती है। कर्मचारियों के अलावा फाइल को स्वीकृत कराने में सहयोग करने वाले अधिकारी और कर्मचारियों को भी उपकृत किया गया। इसी तरह वर्ष 2013-14 के दौरान विद्यार्थियों को दी जाने वाली उपाधि जांचने के एवज में कर्मचारियों को मिलने वाले मानदेय की फाइल स्वीकृत भी हो गई है।
इस मामले में अधिक जानकारी नहीं
मामले में विक्रम विवि कुलसचिव डीके बग्गा का कहना है कि कार्यपरिषद के निर्णय अनुसार उपाधि चेकिंग के लिए पहले से ही राशि दी जाती है। वर्ष २०१३-१४ के भुगतान के मामले में अधिक जानकारी नहीं है। ४.७० लाख रुपए के मानदेय को लेकर कुछ कर्मचारी आए थे। मानदेय की स्वीकृति कुलपति द्वारा की गई है। आप उनसे चर्चा कर प्रतिक्रया लें। पत्रिका ने कुलपति बीके शर्मा से चर्चा के प्रयास किए, लेकिन संपर्क नहीं हुआ।
Published on:
30 Oct 2019 06:00 am
बड़ी खबरें
View Allउज्जैन
मध्य प्रदेश न्यूज़
ट्रेंडिंग
