
Nutrition does not reach centers
उमरिया. जिले में लगातार कुपोषण को दूर करने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन कुपोषण बीते वर्षों की तुलना में घटने के स्थान पर बढ़ता ही जा रहा है। महिला बाल विकास इसके लिए अजीबो-गरीब तर्क दे रहा है कि पहले कुपोषित बच्चों को खोजा नहीं गया था, विभाग के द्वारा लगातार ढूंढ-ढंूढ कर कुपोषित बच्चों को चिन्हित किया जा रहा है।
इसके कारण पहले से कुपोषित बच्चों की संख्या में वृद्धि दिखाई दे रही है। सन् 2014 में विभाग द्वारा कुपोषित बच्चों की संख्या जिले में 1729 थी, वर्तमान समय में जिले मेंं 2613 के लगभग बतलाई जा रही है। जानकारों के अनुसार जिले में कुपोषण ना घटने का प्रमुख कारण अधिकारियों की लापरवाही के साथ, खाद्यान्न उठाव की स्थिति को बिगाडऩा और इसमें भ्रष्टाचार करना, स्नीप परियोजना को सही तरीके से लागू नहीं कर पाना शामिल है। अधिकांश सालों से जमे परियोजना अधिकारी अपने कार्यालयों से ही सभी आंगनबाड़ी केन्द्रों में निगाह रखने की कोशिश करते हैं, जिसके कारण कई माह में पोषण पुर्नवास केन्द्रों में कुपोषित बच्चों की संख्या नगण्य रहती है।
नहीं होता सही तरीके से खाद्यान्न का उठाव
जिले में मिनी और आंगनबाडी केन्द्रो की संख्या कुल 637 है। इन सभी केन्द्रों में पोषण आहार को सही तरीके से पहुंचाने की जिम्मेदारी विभाग की रहती है। इसके लिए और खाद्यान्न उठाव के लिए जो बजट शासन के द्वारा उपलब्ध कराया जाता है, उसकी बंदरबांट विभाग के अधिकारियों के द्वारा की जाती है। इसकी लिखित शिकायत भी मुख्यमंत्री से की गयी है। परियोजना अधिकारी और विभाग प्रमुख आपसी तालमेल के साथ पोषण आहार को केन्द्रों तक पहुंचाने में धांधली करते हैं। जानकारी के अनुसार मंहगाई के दौर में भी पोषण आहार केन्द्रों तक पहुंचाने वाले सन् 2007 की रेट में पोषण आहार को केन्द्रों में पहुंचा रहे है। वे लोग इसे किस लालच में कर रहे हैं, यह जांच के बाद ही पता चल सकता है।
स्नीप परियोजना फेल
कुपोषण दूर करने वाली योजना स्नीप परियोजना भी अधिकारियों के रवैये के कारण यहां फेल हो गयी। फर्जी बिल बाउचरों के माध्यम से आनन-फानन में स्नीप परियोजना के प्रशिक्षण को साकार किया गया, जिसके कारण अधिकांश आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को इस योजना का एबीसी भी नहीं पता है। वे सभी अपने पुराने और रटे-रटाये ढर्रे पर ही कार्य कर रहे हैं। नोडल अधिकारी के द्वारा किस प्रकार से फर्जी प्रशिक्षण करवाया गया है, जिसके कारण आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को कुछ समझ में नहीं आया है। शिकायत तो विश्व बैंक तक की गयी है।
सालों से जमे परियोजना अधिकारी
जले के तीनों ब्लॉक के परियोजना अधिकारियों को जमे हुए पांच साल से अधिक हो चुके है। इन तीनों पर ही किसी ना किसी तरीके की शिकायत और विभाग द्वारा जांच की कार्यवाही चली है। ऐसे में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के द्वारा सही तरीके से कार्य ना किया कोई बडी बात नहीं हैं। इन्हीं अधिकारियों की लापरवाही के चलते कुपोषण की संख्या में वृद्धि हो रही है। स्नेह सरोकार योजना के तहत परियोजना अधिकारी द्वारा लिये कुपोषित बच्चे भी अभी तक कुपोषण के दंश को झेल रहे हैं। लाडली लक्ष्मी योजना को सही तरीके से लागू नही कर पाना और सैनटरी नेपकिन योजना के शुरू होने के साथ ही बंद होने में भी परियोजना अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध थी, जिसे विभागीय जांच के बाद क्लीन चिट दे दिया गया था। नये डीपीओ शांति बेले के आने के बाद उपरोक्त सभी स्थितियों में धीरे-धीरे सुधार होता हुआ दिखाई दे रहा है।
इनका कहना है
खाद्यान्न उठाव की स्थिति में लगातार सुधार किया जा रहा है। सभी परियोजना अधिकारियों को समय-समय पर निर्देश दिए जा रहे हैं, जिसके पोषण पुनर्वास केन्द्रों में कुपोषित बच्चोंं की संख्या में वृद्धि दिखाई दे रही है। हालात को सुधारने में कुछ समय लगेगा।
शान्ति बैले, डीपीओ, महिला बाल विकास अधिकारी।
Published on:
03 May 2018 04:49 pm
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