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कहानी ! 100 साल पुरानी हिंदी साहित्य समिति की जुबानी …

चार मंत्रियों को नहीं भान, नीलामी के कगार पर ज्ञान- सिसक रही समृद्ध साहित्य को समेटने वाली हिन्दी साहित्य समिति

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कहानी ! 100 साल पुरानी हिंदी साहित्य समिति की जुबानी ...

कहानी ! 100 साल पुरानी हिंदी साहित्य समिति की जुबानी ...

भरतपुर . मैंने दिन, महीने, साल, दशक और अब शताब्दी भी पूरी कर ली है। मेरी पहचान ज्ञान के भंडार के रूप में है। मेरे जैसा समृद्ध साहित्य विरले स्थानों पर ही होगा। मैंने यह ज्ञान का खजाना हमेशा इसके कद्रदानों पर न्यौछावर किया है, लेकिन अब ज्ञान बोरियों में बंद होकर सड़ न जाए। यह चिंता मुझे रोज कचोट रही है। जिले से चार विधायकों को मंत्री पद से नवाजा है। ऐसी ऐतिहासिक उपलब्धि देख मेरी 100 साल से अधिक बूढ़ी आंखें भी चमक उठी हैं, लेकिन आलमारियों में सजे इस ज्ञान के भंडार पर सरकारी सितम ने नीलामी की तलवार लटका दी है। मेरे सीने पर चिपके इन नोटिसों ने मेरी धड़कनें बढ़ा दी हैं। दर्द मेरे अंत का नहीं, बल्कि पीड़ा यह है कि यदि ऐसा हुआ तो इस ज्ञान के खजाने से आने वाली पीढियां महरूम रह जाएंगी। यह अनकही पीर है भरतपुर की सबसे पुरानी विरासतों में से एक हिन्दी साहित्य समिति की।
बरसों-बरस से अपने ज्ञान से लोगों को लाभान्वित करने वाली समिति अब सिसकती नजर आ रही है। वजह, पहले समिति को राज्य सरकार की ओर से शिक्षा विभाग के तहत करीब 80 प्रतिशत अनुदान मिलता था, जो वर्ष 2003 से बंद कर दिया। इसके बाद समिति भाषा एवं पुस्तकालय विभाग में मर्ज हो गई और यहां काम करने वाले कर्मचारियों का वर्ष 2010 में समायोजन कर दिया गया, लेकिन यहां कार्यरत लाइब्रेरियन दाऊदयाल शर्मा एवं क्लर्क त्रिलोकीनाथ शर्मा का समायोजन नहीं हुआ। ऐसे में सरकारी कार्मिक के लिहाज से इनके वेतन एवं भत्ते बढ़ते गए और अगस्त 2019 तक इनका वेतन करीब 1 करोड़ 11 लाख 73 हजार 13 रुपए बकाया रहा, जो अब करीब डेढ़ करोड़ रुपए के आसपास है। इन दोनों कार्मिकों के न्यायालय की शरण लेने के बाद अब कोर्ट ने इनका बकाया दिलाने के लिए हिन्दी साहित्य समिति भवन की नीलामी का नोटिस जारी कर दिया है। समिति को मिले दूसरे नोटिस में अब नीलामी संबंधी तिथि 7 जनवरी तय की थी। हालांकि नीलामी के लिए कोर्ट से नियुक्त कार्मिक पहुंचे, लेकिन बोली लगाने वाला कोई नहीं आया।

राष्ट्रगीत के रचयिता ने भरतपुर में लिखी नीलमणि

हिन्दी साहित्य समिति के समृद्ध ज्ञान की बदौलत यहां कई विभूतियों ने दौरा किया। इसमें खास नाम का उल्लेख राष्ट्रगीत के रचयिता रविन्द्रनाथ टैगौर का मिलता है। टैगौर ने हिन्दी साहित्य समिति भवन में नीलमणि लता लिखी। टैगौर यहां 17वें साहित्य सम्मेलन के दौरान पहुंचे थे। हिन्दी साहित्य समिति से जुड़े लोग बताते हैं नीलमणि की रचना उन्हें यहीं बैठकर लिखी। इसका उल्लेख टैगौर की गीतांजलि में मिलता है। गीतांजलि में नीलमणि के लेखन का जिक्र करने के साथ भरतपुर को भी इसमें शरीक किया है।

मुख्यमंत्री भी कर चुके हैं दौरा

हिन्दी साहित्य समिति के ज्ञान के प्रकाश से प्रदेश भी अछूता नहीं है। वर्ष 2013 में मुख्यमंत्री रहते हुए अशोक गहलोत ने रात्रि को समिति का दौरा किया था। इस दौरान उन्होंने यहां की किताबों को देखकर इसकी तारीफ की थी। बताते हैं कि इस दरिम्यान समिति को करीब 50 लाख रुपए की सहायता भी मिली थी, लेकिन वह इसमें पत्थर लगाने के नाम पर खर्च की गई।

विदेशी भी इस ज्ञान के दीवाने

हिन्दी साहित्य समिति में रखे ज्ञान के खजाने की महक विदेशों तक हैं। देश की तमाम हस्तियां यहां का दौरा कर ही चुकी हैं। विदेश से भी शोध के लिए यहां विद्यार्थी पहुंचे हैं। रूस में हिन्दी के विद्वान के रूप में पहचान रखने वाले बारान्निकोव समिति का दौरा कर चुके हैं। उन्होंने इस भंडार को खूब सराहा था। इसके साथ जापान में हिन्दी के विद्वान रहे मुराई नोबिस्ता एवं पािकस्तान के नाटककार अली अहमद यहां आ चुके हैं। इसके अलावा अमेरिका से भी यहां शोधार्थी शोध के लिए पहुंचे थे। ज्ञान के खजाने की बात करें तो यहां 44 विषयों में हिन्दी का हर पक्ष संग्रहित है। इसमें कविता, कहानी, दोहे, आलोचना, भाषा, विज्ञान, इतिहास, भूगोल, राजनीति विज्ञान आदि समाहित हैं। वर्तमान के लिहाजसे यह पुस्तकें अब अनमोल सरीखी हैं।

यह भी बेहद चिंतनीय

कर्मचारियों का पैसा देने के लिए न्यायालय की ओर से नोटिस जारी कर दिए हैं। यदि अब कोई रास्ता नहीं निकला तो नीलामी हो सकती है, लेकिन खास बात यह है कि न्यायालय भवन की नीलामी करेगा। ऐसे में इस ज्ञान के खजाने का क्या होगा। न्यायालय के आदेश के बाद इन पुस्तकों को रखने के लिए भी जगह मुहैया करानी होगी। यदि इन्हें बोरियों में बंद कर रखा गया तो कागज पुराना होने के कारण यह बर्बाद हो सकता है।

यह विशिष्ट विभूतियां कर चुकी हैं दौरा

- राजमाता मांजी गिर्राज कौर (1914)
- ब्रजेन्द्र सवाई महाराजा कृष्ण सिंह। (इन्होंने वर्ष 1919 में हिन्दी राजभाषा घोषित की)
- गौरीशंकर हीराचंद ओझा (1921)
- विश्व कवि गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगौर (1927)
- महामना पंडित मदनमोहन मालवीय (1927)
- राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन (1927)
- सेठ गोवंदिदास (1927 एवं 1968)
- बाबू गुलाबराय (1941)
- ब्रजेन्द्र सवाई महाराजा बृजेन्द्र सिंह (1936)
- डॉ. रामविलास शर्मा (1954)
- मोहनलाल सुखाडिय़ा पूर्व मुख्यमंत्री (1957)
- सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णनन पूर्व उपराष्ट्रपति (1961)
- मुराई नोबिस्ता, हिन्दी विद्वान जापान (1964)
- लोकनायक जयप्रकाश नारायण (1965)
- जैनेन्द्र कुमार, सुविख्यात कथाकार (1965)
- मोरारजी देसाई (1966)
- बाबू राज बहादुर केन्द्रीय मंत्री (1966)
- मन्मथनाथ गुप्त, अमर क्रांतिकारी (1968)
- आचार्य काका कालेलकर (1972)
- वियोगी हरि, गांधीवादी विचारक (1973)
- डॉ. प.अ. बारान्निकोव, रूसी हिन्दी विद्वान (1975)
- बी.डी. जत्ती, पूर्व उपराष्ट्रपति (1975)
- डॉ. विद्यानिवास मिश्र (1979)
- अली अहमद, नाटककार पाकिस्तान (1984)
- भीष्म साहनी, सुविख्यात कथाकार (1984)
- कमलेश्वर सुविख्यात कहानीकार (2004)

एक नजर में समिति

- 80 प्रतिशत मिलता था अनुदान
- 2003 के बाद से नहीं मिला अनुदान
- 2010 में हुआ कर्मचारियों का समायोजन
- 1 करोड़, 11 लाख 73 हजार रुपए बकाया हैं, अगस्त 2019 तक
- 1.50 लाख रुपए करीब बकाया हैं कार्मिकों के


इनका कहना है

सुजानगंगा में मर रही मछलियों की सरकार को फिक्र है, लेकिन यहां जीवंत साहित्य सिमटने के कगार पर है। इसको लेकर भी सरकार को फिक्रमंद होना चाहिए, जिससे आने वाली पीढियां इस ज्ञान के भंडार से लाभान्वित हो सकें।
- मोहनबल्लभ शर्मा, अध्यक्ष हिन्दी साहित्य समिति भरतपुर

कर्मचारियों का भुगतान नहीं मिलने के कारण अब समिति पर नीलामी जैसी तलवार लटक रही है। सामूहिक प्रयासों से इस ज्ञान के खजाने को बचाने की महती जरूरत है। इसके लिए सभी को आगे आना चाहिए।
- रामबाबू शुक्ल, पूर्व अध्यक्ष हिन्दी साहित्य समिति