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आओ बापू अब देखि जाव, सब जन सुराजि मा भटकि रहे

पं0 मनीराम द्विवेदी 'नवीन' जी की 112वीं जयंती पर विशेष...

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Pandit Maniram Dwivedi Navin jayanti Unnao UP hindi news

आओ बापू अब देखि जाव, सब जन सुराजि मा भटकि रहे

उन्नाव. शब्दाडंबर भाव हीन कवि चुन मत लेना, बिना अर्थ की व्यर्थ कहानी सुन मत लेना‘‘ उपरोक्त पंक्तियों के रचयिता पं. मनीराम द्विवेदी नवीन का जन्म 30 नवम्बर 1905 को हुआ था। उनकी माता का नाम मेधावी देवी और पिता पंडित हरि नारायण द्विवेदी बीघापुर तहसील के गांव नैकामऊ रहते थे। जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। आर्थिक स्थित ठीक न होने के कारण शिक्षा दीक्षा सुचारु रुप से न हो पायी। वयोवृद्ध अधिवक्ता हनुमान प्रसाद मिश्र ने उप जानकारी देते हुए बताया कि नवीन जी के साथ दुर्भाग्य रहा कि माता पिता का साथ भी बचपन से ही नही मिल सका। अल्प आयु में ही नवीन जी को रोजी रोटी के लिए अपना घर भी छोडना पडा और वह अपने परिचितों के साथ कोलकाता चले गये। वहीं पर आचार्य गया प्रसाद शुक्ल सनेही की पत्रिका सुकवि पढने का अवसर प्राप्त हुआ।


कोलकाता में कई काव्य संग्रह की रचना की

उन्होंने बताया कि ईश्वर की कुछ ऐसी कृपा हुयी कि कुछ कुछ समय बीतने के बाद उनका ध्यान धीरे-धीरे लिखने की तरफ बढ़ा और कालान्तर में वह विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में कविताएं छपने भी लगी। नवीन जी ने कोलकाता प्रवास में ही 14 पुस्तकों की रचना की जिनमें नवीन नवीन, नवीन बापू गौरव, नवीन चिन्गारी, नवीन भक्ति सरोवर, नवीन समाज विप्लय आदि प्रमुख है। नवीन जी ने जैसा जीवन जिया उसी का चित्रण अपनी कविताओं के माध्यम से समाज के सम्मुख प्रस्तुत किया। आप की कविताओं में बनावटीपन नही दिखायी देता था। समाज में व्याप्त भेदभाव, छुआछूत, गरीबी, जमीदारी, अशिक्षा आदि विषयों पर उन्होने कलम चलायी। समाज को जागरुक करने का भी पुनीत कार्य अपनी कलम के माध्यम से किया।


आजादी के बाद उन्होंने बापू को कुछ इस प्रकार याद किया

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अपनी कलम चलाते हुए पूज्य बापू को याद किया। जिसमें उन्होने लिखा


आओ बापू अब देखि जाव, सब जन सुराजि मा भटकि रहे।
तुम सदा अहिंसा व्रत पालेउ, अब हिंसा कै गति कहिन जाये।
तुम शांति बात बोले सबते, अब झूठ कहे बिनु रहि न जाये।
तुम छा पडसा मा दिनु काटेउ, अब हाथु भरे कै जीभि बढ़ी।

लगभग 50 वर्षो तक हिन्दी साहित्य की सेवा करते हुए नवीन जी 80 वर्ष की अवस्था में 17 अप्रैल 1985 को हमारे बीच से चले गये। आज उनकी 112वीं जयन्ती है। उनके पैतृक नैकामउ में एक वृहद साहित्यिक समारोह का आयोजन किया जाता है। जिसमें प्रदेश स्तर के अनेक साहित्यकार पत्रकार एवं जनप्रतिनिधि सम्मिलित होकर उन्हे श्रद्धा सुमन अर्पित करेंगें।

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