
पूंजीवाद, आडंबर, जातिवाद के घोर विरोधी थे महाप्राण निराला
उन्नाव. वर दे, वीणावादिनी वर दे! प्रिय स्वतंत्र - रव अमृत- मंत्र नव भारत में भर दे! के बिना किसी भी कार्यक्रम का शुभारंभ की कल्पना नहीं की जा सकती है। कवियों की कविता लिखने की शुरुआत वाणी वंदना से होती है लेकिन वर दे वीणावादिनी वर दे वाणी वंदना की अनुपम रचना है। जिसके रचनाकार सूर्यकांत त्रिपाठी निराला विद्रोही स्वभाव के कवि माने जाते हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं में समाज में घटने वाली ज्वलंत रूढ़िवादी, परंपरावादी कार्यों, जातिवाद के खिलाफ न केवल अपनी रचनाओं में उल्लेख किया है बल्कि प्रायोगिक तौर पर अपने जीवन में भी अपनाया है, समाहित किया है, आत्मसात किया है।
अपनी रचनाओं को प्रायोगिक तौर पर स्वयं निभाते थे
आज के परिवेश में उनकी कविताओं की प्रसंगिकता पर चर्चा करने पर वरिष्ठ साहित्यकार धीरेंद्र शुक्ला ने बताया कि निराला जी दहेज प्रथा का विरोध करते थे। जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण उन्होंने अपनी पुत्री के विवाह में दिया। जब उन्होंने बिना दहेज, बिना किसी आडंबर और दिखावे के अपनी पुत्री की शादी की। निराला जी धनाढ्य होते जा रहे समाज में आ रही। विकृतियां बढ़ रही है, कुलीनता का उन्माद घट रहा था। आज के परिवेश में निराला जी की रचनाएं पूरी तरह सामाजिक सरोकार से जुड़ी हुई हैं।
बसंत पंचमी के दिन मनाया जाता है महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की जयंती
धीरेंद्र शुक्ला ने कहा कि महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला बसंत पंचमी को अपना जन्मदिन मनाते थे और देश में वर्षगांठ मनाई जाती है। ऐसे में 21 फरवरी को महाप्राण निराला की जयंती विवादों में आ सकता है जबकि महाप्राण निराला की का जन्म मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को संवत 1953 में हुआ था। महादेवी वर्मा को वह सगी बहन मानते थे। जिनसे रक्षाबंधन में राखी भी बनवाते थे।
कभी दिनेश उन्नाव ही ने कहा कि
अरे सुनो ओ गुलाब
तूने जो पाई चमक रंग ओ आब
खून खाद का तूने चूसा असिस्ट
डाल पर इतरा रहा है कैप्टिलिस्ट
पंक्तियों में उन्होंने पूंजीवाद पर करारा प्रहार करते हुए नेहरू पर अपनी वाणी से प्रहार किया था। कवि दिनेश उन्नाव का मानना है की निराला ने उपरोक्त लाइने पंडित जवाहरलाल नेहरू के पूंजीवाद के समर्थक मानने पर किया था। निराला जी पूंजीवाद के जितने घोर विरोधी थे उतने ही आम लोगों के नजदीक थे। उनकी कविता
वह तोड़ती पत्थर
देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर
कोई ना छायादार पेड़
वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार
पश्चिम बंगाल के महिषादल मेदिनीपुर में हुआ था
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी का जन्म पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर गांव में 21 फरवरी 1896 में हुआ था। जबकि मृत्यु उत्तर प्रदेश के प्रयाग में 15 अक्टूबर 1961 में हुई। लगभग 65 साल के जीवन काल में उन्होंने काफी झंझावातों से मुकाबला किया। उनका जीवन संघर्षों से भरा था। उनकी रचनाएं सामाजिक सरोकार से गहरा संबंध रखती है। इस विषय में बातचीत करने पर कवि सुरेश फक्कड़ ने बताया कि निराला जी फक्कड़ स्वभाव के कवि थे। उन्होंने अपने लिए कभी कुछ नहीं रखा। जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण उनकी मौत के बाद कमरे में रखा वह लकड़ी का बक्सा था। जिसमें संपत्ति के नाम पर रामनामी व गीता निकला। जबकि लोगों का मानना था कि इतने बड़े कवि, साहित्यकार, लेखक के पास काफी संपदा होगी।
नई कविताओं के जन्मदाता कहे जाते हैं निराला जी
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के विषय में बातचीत करने पर सुरेश फक्कड़ कवि ने बताया कि छायावादी लेखकों में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का प्रमुख स्थान है। नई कविता की शुरुआत, जन्मदाता भी निराला जी को ही माना जाता है। जिसमें कोई तुक ताल ना हो। इसके साथ ही निराला जी संगीत के बहुत बड़े जानकार थे। पुत्री के निधन पर लिखा गया सरोज स्मृति शोक काव्य की उत्कृष्ट रचना है। सुरेश फक्कड़ कवि ने बताया कि छायावाद के चार स्तंभों में निराला जी का प्रमुख स्थान स्थान था। जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा उस समय के छायाकार रचनाकारों में से प्रमुख थे। निराला जी की रचनाओं में राम की शक्ति पूजा सर्वाधिक लोकप्रिय रचनाओं में है। जिसमें उन्होंने कमाल की भाषा का प्रयोग किया है। शेक्सपियर, रविंद्र नाथ टैगोर की तरह सूर्यकांत त्रिपाठी निराला विश्व साहित्य की बड़ी धरोहर है।
महाप्राण निराला ने कहा ₹2 दो
एक घटना का जिक्र करते हुए सुरेश फक्कड़ ने कहा कि महादेवी वर्मा को सूर्यकांत त्रिपाठी अपनी बहन मानते थे। एक बार रक्षाबंधन में महादेवी वर्मा प्रयाग प्रवास के दौरान राखी बांधने पहुंची। उन्होंने दरवाजा खटखटाया तो अंदर से आवाज आई पहले Rs. 2 दो। फिर दरवाजा खोलेंगे। इस पर महादेवी वर्मा ने पूछा ₹2 क्यों, के जवाब पर निराला जी ने कहा एक रुपए उस रिक्शे वाले को देना है जिस पर तुम बैठ कर आई हो और दूसरा रुपए राखी बांधने के बदले देना है।
स्वयं ही आटा व मसाला बेचते थे और खाना बनाते थे
अपने अपने गांव गढ़ाकोला में रहने के दौरान निराला जी स्वयं ही आटा की चकिया में गेहूं पीसते थे, मसाला भी पीसते थे व भोजन तैयार करते थे। निराला जी रूढ़िवादी परंपरा और जातिवाद के खिलाफ है। उनका सामाजिक सरोकार से उनका गहरा संबंध था। विद्रोही कवि के रूप में जाने वाले निराला जी ने अपने गढ़ाकोला उन्नाव प्रवास के दौरान चतुरी चमार, कुल्ली भाट जैसी रचनाओं को लिखा। ये दोनों किरदार गांव के ही रहने वाले थे। उनका अधिकांश समय इन्हीं लोगों के बीच व्यतीत होता था। जातिवाद के खिलाफ लिखने और उसे आत्मसात करने के कारण गांव वालों का विरोध भी झेलना पड़ा। जनपद उन्नाव के गढ़ाकोला के रहने वाले सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की याद में प्रशासन की तरफ से पुस्तकालय का निर्माण किया गया है। इसके अतिरिक्त निराला जी के नाम पर पार्क बाजार आदि भी बनाए गए हैं। धरोहर के नाम पर निराला जी की स्मृतियों को संजोने के लिए 2 कमरे हैं। लेकिन विश्व साहित्य प्रमुख स्थान रखने वाले निराला जी की गरिमा के अनुरूप नहीं है।
Published on:
18 Feb 2019 06:26 pm
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