
प्रोफेसर आनन्द कुमार
जब भी भारत में महाकाव्य काल के बाद के इतिहास के योद्धाओं का अध्ययन किया जाता है तो उसमें जहाँ एक ओर अज्ञातशत्रु, चन्द्रगुप्त मौर्य, अशोक तथा समुद्र गुप्त का नाम आता है तो वहीं दूसरी ओर पृथ्वीराज चौहान, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी और पेशवा बाजीराव का नाम भी प्रमुखता से लिया जाता है।
यह आलेख मराठा युद्धकला तथा छापामार प्रणाली के जनक छत्रपति शिवाजी को आधुनिक भारत मे प्रचिलित समावेशी प्रक्रिया के प्रथम पुरुष तथा राष्ट्रवाद के महानायक के रूप में न केवल स्वीकार करता है अपितु स्थापित भी करेगा। शिवाजी ने मराठा साम्राज्य की स्थापना मात्र और मात्र किसी क्षेत्र विशेष में अपने आधिपत्य को स्थापित करने के उद्देश्य से नहीं अपितु भारत को एक राष्ट्र स्वरूप में पिरोने की पवित्र मंशा के साथ के साथ की थी।
डा0 ईश्वरी प्रसाद के शब्दों में अगर देखे तो शिवाजी ने जिन संस्थाओं की स्थापना की, वे तत्कालीन मौजूदा व्यवस्था में न केवल सुधारगामी थे अपितु अपनी प्रजा की भलाई के लिए उचित भी थे। आइये देखते है कि आखिर शिवाजी ऐसे क्यों थे?......वास्तव में छत्रपति शिवाजी ने अभावों का जीवन जीते हुए स्व-पराक्रम और शौर्य के साथ-साथ अपनी जनता के मध्य रहते हुए उनके सुख-दुःख का प्रत्यक्ष अनुभव किया था।
ग्रामीण पर्वतीय वायुमण्डल में रहते हुए उन्होने पर्वतीय क्षेत्र के युद्ध कौशल का प्राकृतिक प्रशिक्षण प्राप्त किया था। माता जीजाबाई एवं संरक्षक दादाजी कोणदेव के संरक्षण में शिवाजी के भीतर न केवल प्रशासनिक क्षमता का उदय हुआ अपितु उनकी चारित्रिक सुदृढता भी निर्धारित हुई। शिवाजी को समर्थ गुरू रामदास का भी आशीर्वाद प्राप्त था। उन्ही की दीक्षा व प्रेरणा से शिवाजी ने असाधारण कर्तव्यों के पालन में सफलता हासिल की।
शिवाजी ने शासन में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रश्रय दिया। मंत्रिमंडल के सभी सदस्यों के विचारों का पूर्ण सम्मान था। परन्तु, वे कई बार स्वविवेक से मंत्रिमंडल के निर्णयों को न मानते हुए जनता के लिए जो भी उचित होता वही करते थे। अष्टप्रधान के मंत्रियों में प्रमुख पदाधिकारी पेशवा (प्रधानमंत्री) होता था, जो अन्य मंत्रियों के कार्यों की देखभाल करता था और यथा समय छत्रपति की अनुपस्थिति में शासन संचालन का दायित्व निर्वहन करता था।
उसे 15 हजार होन (मुद्रा) वेतन के रूप में प्रतिवर्ष प्राप्त होते थे। अमात्य, चिटनिस, सेनापति, वाकयानवीस, सुमन्त, न्यायाधीश, पंडित राव और इन सबका प्रमुख पेशवा अर्थात प्रधानमंत्री सहित कुल आठ जनो से बनी थी शिवाजी की अष्टप्रधान व्यवस्था।
इन अधिकारियों में से मात्र पंडित राव और न्यायाधीश को छोड़कर अष्टप्रधान के सभी अधिकारियों को समय-समय पर सैनिक कार्यवाहियों में हिस्सा लेना होता था। सेनापति को छोड़कर अन्य पदाधिकारी ब्राहमण थे। वर्तमान भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रचिलित मंत्रिमंडल का यह प्राथमिक स्वरूप ही था।
छत्रपति शिवाजी बखूबी जानते समझते थे... कि बगैर मजबूत सैन्य-तंत्र के उनका राष्ट्रव्यापी स्वरूप और एक स्वस्थ सुरक्षित भारत का सपना साकार नहीं हो सकता। इसीलिए उन्होंने सैन्य-संगठन व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया। शिवाजी ने परम्परागत रूप से चली आ रही सैन्य-व्यवस्था में तत्कालीन परिस्थितियों के अनुरूप आमूल-चूल बदलाव किये।
शिवाजी की इस नई सैन्य व्यवस्था का आधार स्थायी सेना थी। शिवाजी ने राजपूतों की सामन्तवादी सैन्य व्यवस्था से सबक ले लिया था.... इसलिए उन्होने अस्थायी सेना की बजाय स्थायी सेना पर विश्वास रखा। शिवाजी ने मराठा सेना में घुड़सवार तथा पैदल सेना को सैन्य गतिविधियों के केन्द्र के रूप में प्रयास किया।
गज सेना को आवश्यकतानुसार उपयोग हेतु रखा गया। जबकि नौसेना का विकास किया गया। इसके अलावा मराठा सेना में तोप खाने को भी महत्व दिया गया। जिसका सीधा आशय यही है कि शिवाजी ही वह व्यक्तित्व थे जिन्होंने भारतीय सेना के विविध स्वरूप के साथ-साथ पर्वतीय तथा जंगल युद्धकला के साथ छापामार शैली के समावेशी स्वरूप की आधारशिला रखी।
शिवाजी का अध्ययन करने से एक बात साफ हो जाती है कि वह युद्ध के सिद्धान्तों को न केवल बखूबी जानते थे अपितु उनका प्रयोग युद्ध क्षेत्र में करते भी थे। गतिशीलता और आश्चर्यचकित करने का सिद्धान्त उनकी युद्धकला का आधार थी। इसके अलावा गोपनीयता उनके कार्यवाहियों के लिए अनिवार्य तत्व थी। उन्होंने बड़ी-बड़ी योजनाओं के लिए भी छापामार प्रणाली का उपयोग किया।
भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप छापामार प्रणाली की युद्धकला सर्वोचित थी। इसीलिए शिवाजी को भारत में छापामार युद्धकला का जनक भी माना जाता है। पहाड़ियों में छिपे मराठा सैनिक अचानक निकलकर शत्रु पर हमला करते थे। लूटपाट करके पुनः पहाडियों में गायब हो जाते थे। पूरे लाव-लश्कर के साथ चलने वाली भारी भरकम मुगल सेना के लिए छापामार युद्धकला से निपट पाना आसान नहीं था।
अनुशासन प्रिय शिवाजी ने अपनी सेना को पूर्णरूपेण अनुशासित कर रखा था। विशेषकर सैन्य प्रयाण काल एवं शिविरों में तथा युद्ध-क्षेत्र में सैनिक एवं अफसर कठोर अनुशासन का पालन करते थे। चरित्र एवं पौरूष की रक्षा हेतु सैन्य शिविरों में स्त्रियों, नर्तकियों आदि पर प्रतिबंध था। युद्ध के उपरान्त स्त्री को कैद करने पर प्रतिबंध था।
वास्तव में शिवाजी का स्थान भारतीय इतिहास में उनकी व्यक्तिगत उपलब्धियों के साथ-साथ समाज के लिए किये गये कार्यों के कारण है। शिवाजी विषम परिस्थितियों से कभी विचलित नहीं हुए। आपात स्थितियों में धैर्य धारण करना, उनका विवेकशील होना उन्हें दूसरों से अलग करता था।
शिवाजी ने जब भी कोई योजना बनाई पहले तो शत्रु भॉप नहीं पाये और बाद में जब तक समझ पाते तब कर तीव्रता के साथ शिवाजी की कार्यवाही समाप्त हो जाती थी। शत्रु की दुर्बलताओं को भॉपने में शिवाजी सिद्धहस्त थे। शिवाजी कट्टर हिन्दू थे, लेकिन उन्होने किसी भी अन्य धर्म के अनुयायी को हिन्दू बनने के लिए बाध्य नहीं किया।उनकी सेना में सभी धर्म के लोग मौजूद थे। ऐसे ही तमाम कारण और उदाहरण हैं जो शिवाजी को सिद्ध करते हैं कि वह वास्तव में छत्रपति थे और भारतीय राष्ट्रवाद के महानायक भी थे।
डॉ० आनन्द कुमार सिंह
प्रोफेसर एवं अध्यक्ष
रक्षा एवं स्त्रातेजिक अध्ययन विभाग,
हिन्दू कालेज, मुरादाबाद
Updated on:
31 Jan 2023 09:41 pm
Published on:
31 Jan 2023 09:40 pm
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