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52 मोहल्लों से डंडे लेकर बनाई जाती है यह अदभुत् ताजिया, मोहर्रम पर सबसे खास, मुस्लिमों के साथ देखने आते हिंदू

कौमी एकता के लिहाज से बावन डंडे के ताजिये का खास महत्व...

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52 मोहल्लों से डंडे लेकर बनाई जाती है यह खास ताजिया, मोहर्रम पर हिंदू-मुस्लिम सभी के लिये बेहद खास

52 मोहल्लों से डंडे लेकर बनाई जाती है यह खास ताजिया, मोहर्रम पर हिंदू-मुस्लिम सभी के लिये बेहद खास

सीतापुर. कौमी एकता के लिहाज से बावन डंडे के ताजिये का खास महत्व है। खैराबाद में बरसों पहले ताजिये की यह परंपरा बहुत ही अकीदत और शिद्दत के साथ शुरू हुई थी जो आज भी पूरी अकीदत और शिद्दत के साथ बरकरार है। इस ताजियेदारी में हिन्दू मुस्लिम दोनों धर्मो के लोग बहुत अकीदत के साथ शामिल होते हैं। जिसके चलते इसे गंगाजमुनी तहजीब की बड़ी मिशाल माना जाता है।


52 मोहल्लों से लिया जाता है एक एक डंडा

मुगल शासनकाल में अवध की राजधानी कहे जाने वाले खैराबाद कस्बे को सूफियों की नगरी कहा जाता है। यूं तो यहां बड़ी तादात में हर रोज लोग जियारत के लिए आते हैं, लेकिन बावन डंडे की ताजियेदारी के दिन अकीदतमंदों की संख्या एक लाख तक पहुंच जाती है। ताजिये के बारे में बताया जाता है कि कभी खैराबाद कस्बे में बावन मोहल्ले हुआ करते थे। हर मोहल्ले की भागीदारी तय करने के लिए सभी मोहल्लों से एक एक डंडा लाकर बावन डण्डे का ताजिया तैयार किया गया। इस ताजियेदारी में सभी लोग शिरकत कर सके। इसलिए इस ताजिये को उठाने की तारीख दसवीं मोहर्रम के बजाय ग्यारहवीं मोहर्रम मुकर्रर की गयी।


लाखों की संख्या में पहुंचते हैं लोग

इसे मोहल्ला रौजा दरवाजा से उठाकर पूरे कस्बे में घुमाया जाता है। ताजिये का त्योहार काफी संवेदनशील माना जाता है। जिसके चलते सुरक्षा के कड़े इंतजाम भी किये जाते हैं। लेकिन यह गर्व की बात है कि सीतापुर में खैराबाद कस्बे का मशहूर बावन डंडे का ताजिया आज भी न सिर्फ कौमी एकता को और मजबूत करने में जुटा हुआ है, बल्कि सांप्रदायिक सदभाव की महक फिजाओं में फैला रहा है।

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