
...और काशी में टूट गई 350 साल पुरानी परंपरा, नगर वधुएं अर्पित नहीं कर सकीं नृत्यांजली,...और काशी में टूट गई 350 साल पुरानी परंपरा, नगर वधुएं अर्पित नहीं कर सकीं नृत्यांजली,...और काशी में टूट गई 350 साल पुरानी परंपरा, नगर वधुएं अर्पित नहीं कर सकीं नृत्यांजली
वाराणसी. कोरोना के इस बढ़ते सिलसिले और लॉकडाउन के बीच काशी की सदियों पुरानी परंपरा भी टूट गई। इस बार मणिकर्णिका घाट के किनारे स्थित बाबा मसान नाथ को नगर वधुएं अपनी नृत्यांजली अर्पित नहीं कर सकीं। हर साल बाबा के वार्षिक श्रृंगार की रात को नगर बधुएं यहां पहुंचकर आधी रात में नृत्य करती थीं। इस बार कोरोना के कहर के कारण इस आयोजन पर रोक लगाई गई थी।
ऐसा न हो पाने से काशी में 350 सालों से चली आ रही परंपरा टूट गई। कोरोना वायरस के बढ़ते खतरे और लॉकडाउन के कारण चौबीसों घंटे जीवंत रहने वाली काशी सूनी हो गई है। हर वक्त घंटे की गूंज, तिलक लेप की महक और हर हर महादेव के उद्घोष से गुंजायमान रहने वाली काशी में सब कुछ बंद है। बाबा विश्वनाथ, काशी के कोतवाल बाबा काल भैरव और संकट मोचन मंदिर समेत अन्य सभी मंदिरों को श्रद्धालुओं के लिए बंद कर दिया गया है। धर्म की नगरी काशी की संस्कृति भी उदास है। ऐसे में 17वीं सदी की इस परंपरा का टूटना भी इससे जुड़े लोगों को खल रहा है।
क्या है परम्परा
मरनिकर्णिका घाट, गंगा की बहती शीतल धारा, जल रही पचासों चिताओं के बीच नगर बधुएं का बाबा मसान के दर पर झूम-झूम कर नाचना। हर कोई चौंक जाएगा की आखिर ऐसा कैसे हो सकता है कि जल रही लाशों के बीच में कोई उत्सव कर रहा है। पर काशी में बाबा मसान के वार्षिक श्रृंगार की रात ऐसा ही नजारा दिखता था। इसके पीछे मान्यता है कि नगर वधुएं बाबा मसान नाथ के दरबार में नृत्य कर अपने अगले जन्म में बेहतर होने की कामना करती हैं। बाबा के दर पर जाकर कहती हैं कि है मसान नाथ इस बार तो हम ये जीवन जी रहे हैं, लेकिन अगली बार की जिंदगी अच्छी देना।
क्या है इसका महत्व
कहा जाता है की सत्रहवीं शताब्दी में काशी नरेश राजा मान सिंह ने बाबा मसान नाथ के मंदिर का निर्माण कराने के बाद संगीत का कार्यक्रम आयोजित कराना चाहा। पर श्मशान होने के कारण कोई कलाकार आकर यहां संगीत उत्सव नहीं करना चाहा। सभी कलाकारों के इनकार कर देने ले बाद नगर वधुओं ने हामी भरी और मसान नाथ के दरबार में अपनी नृत्यांजलि अर्पित की। जलती चिताओं के बीच अपनी कला का प्रदर्शन किया। साथ ही अपने अगले जीवन के लिए आराधना की। तब से यह परंपरा काशी में निभाई जा रही है, लेकिन इस बार ये टूट गई।
Updated on:
01 Apr 2020 01:18 pm
Published on:
01 Apr 2020 01:17 pm

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