24 जनवरी 2026,

शनिवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

पेशवा बाजीराव और काशीबाई के प्रेम का गवाह रहा है बनारस

बाजीराव ने बनवाया था दशाश्वमेघ घाट, राजा बनारस ने चोरी करवा दिए थे काशीबाई के घोड़े

3 min read
Google source verification
बाजीराव ने बनवाया था दशाश्वमेघ घाट, राजा बनारस ने चोरी करवा दिए थे काशीबाई के घोड़े
आवेश तिवारी
वाराणसी. पेशवा बाजीराव नहीं होते तो आज का बनारस नहीं होता। आज जब मस्तानी के साथ गाढे प्रेम और काशीबाई के साथ पेशवा बाजीराव बल्लाड की कथित बेवफाई की कहानी रुपहले परदे पर चमक बिखेर रही है, इतिहास एक बार फिर से करवटें बदल रहा है। देश की सांस्कृतिक राजधानी बनारस के पन्नों को पलटें तो साफ़ नजर आता है कि पेशवा बाजीराव ने काशीबाई के साथ-साथ काशी नगरी से भी अटूट प्रेम किया था। शायद वह काशीबाई का प्रेम ही था कि पेशवा बाजीराव ने अपार शक्ति संपन्न होने के बावजूद काशी को अपने कब्जे में करने का ख्याल भी कभी मन में नहीं लाया। वो बाजीराव ही थे जिन्होंने महातीर्थ काशी को बनाया सजाया और उसमे ढेर सारे रंग भर दिए। शायद यही वजह थी कि बाजीराव की मृत्यु के बाद काशीबाई की आँखें बनारस के घाटों, गलियों, चौराहों और मंदिरों में अपने बाजीराव के पदचिन्हों को ढूंढती रही। इतिहासकार बताते हैं कि एक बार बाजीराव, मस्तानी के साथ भी बनारस आये थे।
काशीबाई के साथ यहाँ भी हुई दगाबाजी
बाजीराव की मृत्यु के बाद 1746 में काशीबाई सेना की एक टुकड़ी के साथ बनारस आईं। राजा बनारस बलवंत सिंह के एक बागी भाई दासाराम ने खुद को काशीबाई के हवाले कर दिया, लेकिन बलवंत सिंह ने चतुराई दिखाते हुए नवाब सफदरजंग को शिकायत भेजी कि यदि दासाराम को काशी का आधा राज्य न दिया जाएगा तो मराठा फौजें आक्रमण कर देंगी, जिससे कि नवाब और मराठों में ठन जाए। यह मामला यहीं तक नहीं रुका बलवंत सिंह ने काशीबाई और उनके अनुचरों को भी खूब तंग किया। काशीबाई के साथी विसजी ने एक पत्र में लिखा कि "यहाँ पहुँचते ही बलवंत सिंह ने काशीबाई जी की रहने की व्यवस्था राजमंदिर में की है और घोड़े ऊंट, और सिलेदारों को गढ़ी में रहने की जगह दी है। पहले आठ दिनों में ही बलवंत सिंह ने सरकार के पांच घोड़े चोरी करवा दिए और जब हमने उन्हें धमकाकर घोड़े वापस करने को कहा तो उन्होंने दो घोड़े ही लौटाये ऊपर से हमपर आरोप लगा रहे कि आपकी सेना नगरवासियों को तंग करती है।
बाजीराव ने बनवाये थे बनारस के एक तिहाई घाट
महाराष्ट्र के ब्राह्मणों के लिए काशी अकबर के राज्यकाल से ही एक बड़ा तीर्थ बन गई थी। पेशवाई प्रारम्भ हुई तो बनारस के दिन बदलने लगे। इतिहास बताता है कि बाजीराव पेशवा ने महाराष्ट्र के कई ब्राहमणों को पूजा अर्चना के लिए काशी भेजा, कई ब्रह्मापुरियां बनवाई घाट बनवाए, सुप्रसिद्ध दशाश्वमेघ घाट का निर्माण भी बाजीराव पेशवा ने ही कराया है, इसके अलावा बनारस के तक़रीबन एक तिहाई घाटों के निर्माण में भी पेशवा बाजीराव की अहम् भूमिका रही, जिनमे मणिकर्णिका, राजा घाट, पंचगंगा घाट शामिल है। बनारस शहर के चतुर्दिक विकास के लिए बाजीराव ने अपने विश्वासपात्र सदाशिव नाईक को विशेष प्रभारी बनाकर बनारस भेजा था और उनसे समूचे काशी क्षेत्र का चतुर्दिक विकास करने को कहा था। यह वो वक्त था जब बनारस में रहने को आने वाले हर व्यक्ति को किराया देना पड़ता था।
पेशवा की माँ ने भी किया था खूब दान-पुण्य
इतिहास बताता है कि ठीक उस वक्त जब बाजीराव पेशवा और मस्तानी का प्रेम परवान चढ़ रहा था, बाजीराव की माता राधाबाई काशी यात्रा पर निकल पड़ीं। यह सन 1735 में दिसंबर माह का समय था। राधाबाई ने उमानाथ पाठक को अपना तीर्थ पुरोहित बनाया। बाजीराव के गुरु नारायण दीक्षित जो कि बनारस आकर बस गए थे ने बाजीराव को एक चिट्ठी लिखी जिसमे कहा गया था कि ***** माताजी राधाबाई कार्तिक सुदी 12 को यहाँ आई, यहाँ के दानं धर्म के बारे में लिखना ठीक नहीं और लोगों से इसका पता आपको चल जाएगा, हमसे इस बारे में वह कुछ नहीं पूछती थी, उन्होंने कुछ विद्वानों को उत्तम दान दिया लेकिन महाराष्ट्र के ब्राहमणों को कुछ नहीं मिला। इतना होने पर भी हम बाई के दानधर्म का आसरा लगायें तो हमें काशी छोड़कर देश लौट जाना पड़ेगा।
बालाजी करना चाहते थे बनारस पर कब्ज़ा
पेशवा की मृत्यु के बाद उनके पुत्र बालाजी बाजीराव की पूरी इच्छा थी कि बनारस किसी तरह उनके हाथ लग जाए। 1 जून 1742 को बालाजी बाजीराव ने मिर्जापुर में अपनी सवारी रोक कर बनारस ले जाने की इच्छा की। जब अवध के नवाब सफदरजंग को यह पता चला तो उन्होंने बनारस के पंडितों को इकठ्ठा करके बालाजी बाजीराव के बनारस आने के पहले ही उन्हें मार डालने की धमकी दी, ब्राह्मण क्या करते नारायण दीक्षित की अधीनता में पेशवा के पास पहुंचे और उन्हें लौट जाने के लिए मना लिया। इतिहास बताता है कि दरअसल बालाजी ज्ञानवापी मस्जिद को गिरकार विशेश्वर मंदिर बनाना चाहते थे लेकिन बनारस के ब्राहमणों ने उन्हें ऐसा करने से रोका।