
शुक्रवार सुबह सात बजे से वाराणसी में शुरू होगा ज्ञानवापी परिसर का ASI सर्वे
Gyanvapi Mosque Case: ज्ञानवापी परिसर में ASI सर्वे को लेकर शासन के साथ ही वाराणसी प्रशासन भी हाई अलर्ट पर है। यहां शुक्रवार सुबह सात बजे से सर्वे शुरू होगा। सोशल मीडिया की भी निगरानी की जा रही है। एएसआई की टीम वाराणसी पहुंच चुकी है। पुलिस आयुक्त मुथा अशोक जैन ने कहा कि सर्वे में किसी तरह का व्यवधान नहीं आएगा। इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के बाद ही जिला व पुलिस प्रशासन ने गुरुवार को एएसआई के सहयोग और सुरक्षा की जरूरी तैयारियां पूरी कर ली हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की टीम शुक्रवार सुबह सात बजे से फिर ज्ञानवापी स्थित सील वजूखाने को छोड़कर शेष हिस्से का सर्वे शुरू करेगी। अब आपको बताते हैं कि सर्वे में अगर हिंदू पक्ष द्वारा बताए जा रहे दावे सही साबित होते हैं तो क्या होगा?
इससे पहले आपको अयोध्या में किए गए ASI सर्वे के बारे में बताते हैं। दरअसल, ज्ञानवापी परिसर का मामला भी अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि से मिलता-जुलता दिख रहा है। अयोध्या में भी हिंदू पक्ष के दावों पर कोर्ट ने ASI सर्वे को मंजूरी दी थी। जिसके बाद यहां दूध का दूध और पानी का पानी साफ हो गया था। आइए आपको अयोध्या में ASI सर्वे की रिपोर्ट से रू-बरू कराते हैं।
साल 2003 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के निर्देश पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की टीम ने श्रीराम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद स्थल की खुदाई शुरू की। इसमें पुरातत्वविदों ने एक बड़ी संरचना के संकेत दिए जो बाबरी मस्जिद से पहले की थी। इस खुदाई में 52 मुसलमानों सहित 131 मजदूरों की एक टीम लगी थी। 11 जून 2003 को एएसआई ने एक अंतरिम रिपोर्ट जारी की। जिसमें केवल 22 मई और 6 जून 2003 के बीच की अवधि के निष्कर्षों को सूचीबद्ध किया गया था। अगस्त 2003 में एएसआई ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ को 574 पेज की रिपोर्ट सौंपी। आइए बताते हैं इस रिपोर्ट में क्या कहा गया?
कई युगों के खंडहर मिले, छंदों के शिलालेख का भी जिक्र
ASI ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि सूचीबद्ध संरचनाओं में कई ईंट की दीवारें 'पूर्व-पश्चिम दिशा में', कई 'उत्तर-दक्षिण दिशा में', 'सजाए गए रंगीन फर्श', कई 'स्तंभ आधार' और '1.64 मीटर ऊंचे काले पत्थर से सजाए गए' हैं। चारों कोनों पर मूर्तियों वाला स्तंभ (टूटा हुआ) और साथ ही पत्थर पर अरबी भाषा में पवित्र छंदों का शिलालेख भी है। एएसआई ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि उन्हें अन्य युगों के भी खंडहर मिले हैं।
ये खंडहर किसी जैन मंदिर के खंडहर हो सकते हैं। निष्कर्षों से पता चलता है कि 1000 ईसा पूर्व और 300 ईसा पूर्व के बीच मस्जिद स्थल पर उत्तरी ब्लैक पॉलिश्ड वेयर (एनबीपीडब्ल्यू) संस्कृति मौजूद थी। अशोक की ब्राह्मी में एक किंवदंती के साथ एक गोल हस्ताक्षर , पुरातन विशेषताओं के साथ महिला देवताओं की टेराकोटा मूर्तियाँ, टेराकोटा और कांच के मोती , पहिये और मन्नत टैंक के टुकड़े पाए गए हैं।
200 ईसा पूर्व शुंग काल के मिले थे प्रमाण
विशिष्ट टेराकोटा मातृ देवी, मानव और पशु मूर्तियां, मोती, हेयरपिन, मिट्टी के बर्तन (काले फिसले हुए, लाल और भूरे रंग के बर्तन शामिल हैं), और शुंग काल की पत्थर और ईंट की संरचनाएं मिली हैं। यह 200 ईसा पूर्व शुंगकाल की निशानी हैं। इसके अलावा टेराकोटा मानव और पशु मूर्तियाँ, मन्नत टैंकों के टुकड़े, मोती, चूड़ी के टुकड़े, लाल बर्तन के साथ चीनी मिट्टी की चीज़ें और बाईस पाठ्यक्रमों में चलने वाली बड़े आकार की संरचनाएं इस स्तर से पाई गई हैं। जो कुषाण काल की निशानी हैं।
जानवरों की हड्डियां और मानव अवशेष भी मिले थे
रिपोर्ट में बताया गया था कि पहले की खुदाई में जानवरों की हड्डियां और यहां तक कि मानव अवशेष भी मिले थे। इतिहासकार इरफ़ान हबीब के अनुसार , जानवरों की हड्डियों की मौजूदगी का मतलब है कि यह एक आवासीय क्षेत्र था (और कोई मंदिर नहीं) जहां जरूरी नहीं कि मांसाहारी समुदाय रहता हो और यह उस मुस्लिम निवास स्थान में था जहां 1528 या उसके बाद एक मस्जिद बनाई गई थी।
एएसआई की रिपोर्ट में हड्डियों का जिक्र है, लेकिन यह नहीं बताया गया है कि वे वहां कैसे आईं। फिलहाल अब इसी से मिलता-जुलता मामला ज्ञानवापी परिसर का दिखाई दे रहा है। खैर, यहां अयोध्या जैसी पौराणिक वस्तुएं मिलेंगी कि नहीं मिलेंगी। यह भविष्य के गर्भ में हैं। शुक्रवार सुबह से ASI की टीम सर्वे शुरू करेगी।
Published on:
03 Aug 2023 09:06 pm
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