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वरुणा कॉरिडोर बनाम रिंग रोड- गांव, गरीब और किसान बने अबरे की लुगाई 

मोदी के लिए गरीबों किसान उजाड़े गए, अखिलेश की राह में अमीर में बने रोड़ा. ये है वाराणसी जिला प्रशासन. 

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Ajay Chaturvedi

Apr 13, 2016

KASHI

KASHI

वाराणसी. पीम नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में फिलहाल दो दिग्गजों के ड्रीम प्रोजेक्ट पर काम शुरू हुआ है। एक है देश के महानायक जिनका ड्रीम प्रोजेक्ट है रिंग रोड तो दूसरे हैं प्रदेश के गरीबों के मसीहा अखिलेशख यादव। इनका सपना है वरुणा कारीडोर। अब जिला प्रशासन को देखें, पीएम के ड्रीम प्रोजेक्ट के लिए गरीबों किसानों को उजाड़ दिया गया वे महीनों से सड़क पर हैं। वहीं अखिलेश के सपने की आड़ में आ रहे हैं पूंजीपति। उन्हें अब तक छुआ भी नहीं जा सका है। या यूं कहें कि उन्हें छूने की जहमत तक उठाना गवारा नहीं। उठाएं भी कैसे जिनकी जिम्मेदारी है उन्होंने ही तो इन पूंजीपतियों को बसाया है नदी में। यानी गरीब, किसान अबरे की लुगाई बन गए हैं। विकास के नाम पर शासन-प्रशासन इन्हें उजाड़ते देर नहीं लगती। वहीं पूंजीपति हैं कि वे कुछ भी करें उन्हें छूने वाला कोई नहीं। ये है वाराणसी जिला प्रशासन।

रिंग रोड के लिए उजाड़े गए गरीब,किसान
शहर की यातायात व्यवस्था को पटरी पर लाने कि लिए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में राजनाथ सिंह ने रिंग रोड का प्रस्ताव पेश किया था। सरकारर गई योजना भी ठंडे बस्ते में चली गई। अब दोबारा एनडीए के सत्ता में आने के बाद रिंग रोड को पीएम का ड्रीम प्रोजेक्ट बताया गया। पीएम नि इसके लिए आधारशिला भी रखी। प्रशासन तत्काल हरकत में आया और हरहुआ से संदहां तक, यानी दो ब्लाल हरहुआ और चोलापुर गांव के किसानों,गरीबों के मकान, दुकान जमींदोज कर दिए। वे सारे गरीब,किसान सड़क पर आ गए। कुछ को मुआवजा मिला तो किसी को नहीं मिला। जिन्हें मुआवजा मिला उन्हें भी पुराने सर्किल रेट पर दिया गया। ऐसा किसानों का कहना है। अब वे मौजूदा सर्किल रेट पर मुआवजे की मांग को लेकर आंदोलित हैं। चार दिन से काम-काज ठप है। लेकिन सवाल यह कि बिना उचित मुआवजा उनके मकान,दुकान गिराए ही क्यों गए। किसान और गरीबों का तर्क है कि वे किसी योजना का विरोध नहीं करते। मगर वे कहां जाएं। कम से कम सरकार पुनर्वास की योजना तो लाए। हमारे लिए जमीन मुहैया कराए। अगर वे ऐसा कहते हैं तो कुछ गलत भी नहीं कहते। लेकिन प्रशासन है कि पुनर्वास पर उसकी निगाह नहीं। आम आदमी का कहना है कि गांव के किसानों और गरीबों की मांग गलत तो नहीं। पुश्तों से वे जहां रह रहे थे वहां से उनको हटाया गया। सिर से छत तो गई ही दो वक्त की रोटी के लाले भी पड़ गए। करें क्या। खेती की जमीन सरकार ने अधिग्रहीत कर ली। लेकिन किसी की कोई सुनवाई नहीं। किसान न्याय मोर्चा के प्रदेश संयोजक महेंद्र प्रसाद का कहना है कि प्रशासन जमीन का 25 लाख प्रति विश्वा की दर से बैनामा कराए अथवा नए सर्किल रेट से चार गुना अधिक मुआवजा दे। उन्होंने साफ किया कि फरवरी 2014 के सर्किल रेट पर बैनामा नहीं कराएंगे। अब 15 अप्रैल को किसानों की महा पंचायत बुलाई गई है।

वरुणा कारीडोर की राह में बिल्डर बने रोड़ा
उधर सीएम का सपना है काशी के अस्तित्व से जुड़े वरुणा का जीर्णोद्धार। वह इसका सौंदर्यीकरण कराना चाहते हैं। इसे जुहू बीच बनाना चाहते हैं। लेकिन बने कैसे। प्रशासन ने काम शुरू भी किया है। इसके तहत वरुणा की ड्रेजिंग शुरू की गई है। लेकिन सबसे बड़ी समस्या वरुणा के पेटे में बहुमंजिली इमारतें। उन पर किसी की निगाह नहीं। इन इमारतों के खिलाफ कार्रवाई करे कौन। जिसकी है जिम्मदारी उन्होंने ही तो इनका नक्शा पास किया है। उन्होंने ही तो इन्हें बिजली का कनेक्शन दिया। उन्होंने ही तो इन्हें मकान नंबर आवंटित किया। पेयजल का कनेक्शन दिया। फिर इनके खिलाफ कार्रवाई कौन करे। क्यों करे। लिहाजा सीएम का ड्रीम प्रोजेक्ट परवान चढ़ता नजर नहीं आता। विशेषज्ञ बताते हैं कि अगर नदी के पेटे में बनीं इन इमारतों को हटाया नहीं गया तो ड्रेजिंग के बाद वरुणा तटवर्ती लाखों लोग तबाह हो जाएंगे। अगर वरुणा में बाढ़ आती है तो उस पर काबू पाना आसान नहीं होगा। लेकिन इन बिल्डरों को कौन रोके। कौन करे इन पर कार्रवाई। दरअसल वरुणा के पेटे में बहुमंजिली इमारतों के खड़े होने के पीछे असल जिम्मेदार वही है जिसने गंगा किनारे पहले इमारतें बनवाईं फिर हाईकोर्ट को दिखाने के लिए महाश्मशना, प्राचीन केदारेश्वर मंदिर, स्वामी करपात्री जी द्वारा निर्मित विश्वनाथ मंदिर, तुलसी मंदिर को अवैध निर्माण ठहरा दिया। यहां तक कि काशी में पाकिस्तानी मंदिर तक खोज निकाला। हालांकि कमिश्नर नितिन रमेश गोकर्ण ने इसे गंभीरता से लिया है। इसके बाद कुछ आधा दर्जन लोगों को नोटिस भी दिया गया है। लेकिन क्या इतने भर से वरुणा की रक्षा हो जाएगी। क्या इससे सीएम का ड्रीम प्रोजेक्ट परवान चढ़ जाएगा। ये है काशी वासियों का सवाल।






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