शहर की यातायात व्यवस्था को पटरी पर लाने कि लिए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में राजनाथ सिंह ने रिंग रोड का प्रस्ताव पेश किया था। सरकारर गई योजना भी ठंडे बस्ते में चली गई। अब दोबारा एनडीए के सत्ता में आने के बाद रिंग रोड को पीएम का ड्रीम प्रोजेक्ट बताया गया। पीएम नि इसके लिए आधारशिला भी रखी। प्रशासन तत्काल हरकत में आया और हरहुआ से संदहां तक, यानी दो ब्लाल हरहुआ और चोलापुर गांव के किसानों,गरीबों के मकान, दुकान जमींदोज कर दिए। वे सारे गरीब,किसान सड़क पर आ गए। कुछ को मुआवजा मिला तो किसी को नहीं मिला। जिन्हें मुआवजा मिला उन्हें भी पुराने सर्किल रेट पर दिया गया। ऐसा किसानों का कहना है। अब वे मौजूदा सर्किल रेट पर मुआवजे की मांग को लेकर आंदोलित हैं। चार दिन से काम-काज ठप है। लेकिन सवाल यह कि बिना उचित मुआवजा उनके मकान,दुकान गिराए ही क्यों गए। किसान और गरीबों का तर्क है कि वे किसी योजना का विरोध नहीं करते। मगर वे कहां जाएं। कम से कम सरकार पुनर्वास की योजना तो लाए। हमारे लिए जमीन मुहैया कराए। अगर वे ऐसा कहते हैं तो कुछ गलत भी नहीं कहते। लेकिन प्रशासन है कि पुनर्वास पर उसकी निगाह नहीं। आम आदमी का कहना है कि गांव के किसानों और गरीबों की मांग गलत तो नहीं। पुश्तों से वे जहां रह रहे थे वहां से उनको हटाया गया। सिर से छत तो गई ही दो वक्त की रोटी के लाले भी पड़ गए। करें क्या। खेती की जमीन सरकार ने अधिग्रहीत कर ली। लेकिन किसी की कोई सुनवाई नहीं। किसान न्याय मोर्चा के प्रदेश संयोजक महेंद्र प्रसाद का कहना है कि प्रशासन जमीन का 25 लाख प्रति विश्वा की दर से बैनामा कराए अथवा नए सर्किल रेट से चार गुना अधिक मुआवजा दे। उन्होंने साफ किया कि फरवरी 2014 के सर्किल रेट पर बैनामा नहीं कराएंगे। अब 15 अप्रैल को किसानों की महा पंचायत बुलाई गई है।