अपनी टीम तैयार करना और संगठन को खड़ा करना भी कम चुनौती भरा नहीं।
डॉ अजय कृष्ण चतुर्वेदी
वाराणसी. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने छोटी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा को एआईसीसी का महासचिव और पूर्वी ईस्ट का प्रभारी नियुक्त कर दिया है। उनके शुक्रवार एक फरवरी को अपना कार्यभार संभालने की उम्मीद जताई जा रही है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक वह एक फरवरी को स्वदेश लौटते ही कार्यभार संभाल लेंगी। लेकिन लोकसभा चुनाव जो कुछ ही महीनों में होंगे उसके लिए प्रियंका को अपनी टीम का गठन सबसे बड़ी चुनौती होगी। कारण साफ है, पूर्वी ईस्ट में ऐसा कोई चेहरा सामने नहीं दिख रहा जो बीजेपी के इस गढ़ में अच्छीखासी पैठ रखता हो। ऐसे में प्रिंयका को अपनी टीम चुनना और सेंधमारी के लिए रणनीति तय करना आसान नहीं होगा।
पिछले करीब 29 साल से यूपी की सियासत के हाशिये पर चल रही कांग्रेस के पास पूर्वांचल में एक भी सर्वमान्य बड़ा चेहरा नहीं है। यही वजह है कि कांग्रेस अध्य़क्ष राहुल गांधी को अपनी बहन को इस इलाके का प्रभारी बनाना पड़ा है। लेकिन अकेले प्रियंका के लिए तीन-चार महीने में पार्टी को खड़ा करना, बूथ स्तर पर संगठन को खड़ा करना बड़ी चुनौती होगी। यहां यह भी बता दें कि प्रियंका अब तक केवल रायबरेली और अमेठी तक ही सीमित रही है। पूर्वांचल यानी वाराणसी, मिर्जापुर, आजमगढ, गोरखपुरप, इलाहाबाद मंडल से उनका दूर-दूर तक का कोई नाता नहीं रहा है।
दूसरे इन सभी मंडलों में कांग्रेस की हालत काफी पतली है। बूथ स्तर तक कमेटियों का पत नहीं है। मंडल स्तर पर भी संगठन काफी कमोजर है। ऐसे में प्रियंका के लिए सबसे बड़ा चैलेंज होगा संगठन को खड़ा करना, लोगों में पार्टी के प्रति विश्वास पैदा करना। घोषणा पत्र के लिए मुद्दे तलाशना। इसके लिए बड़ी और संघर्षशील टीम की दरकार होगी। यह दीगर है कि प्रियंका जमीनी हकीकत की सारी जानकारी है। वह संगठन में जोश भरना भी जानती हैं। लेकिन इसके लिए उन्हें अपनी टीम बनानी होगी जो चुनौतीपूर्ण होगा।
वैसे राजनीतिक गलियारों में जो चर्चाएं चल रही हैं उसके अनुसार कांग्रेस चुनाव घोषणा पत्र तैयारी समिति के सदस्य और मिर्जापुर मड़िहान से विधायक रह चुके पंडित कमलापति त्रिपाठी के प्रपौत्र ललितेशपत्रि त्रिपाठी को बड़ा ओहदा मिल सकता है। उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश का अध्यक्ष मनोनीत कर प्रियंका का सहयोगी बनाया जा सकता है। इसके अलावा कुशीनगर से सांसद रह चुके आरपीएन सिंह को भी प्रियंका के सहयोगी के रूप में जगह दी जा सकती है।
बावजूद इसके अन्य पिछडा वर्ग व मुस्लिम वोटबैंक को साधना आसान नहीं होगा। इसमें अन्य पिछडा वर्ग को साधना कांग्रेस के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण है। इस वर्ग का कोई भी बड़ा नेता कांग्रेस के पास नहीं। और ये ऐसा वर्ग है जो फिलहाल बीजेपी के साथ है। बीजेपी ने 2014 और 2017 में इन अन्य पिछड़ा वर्ग की बदौलत ही जबरदस्त फतह हासिल की थी। इसके लिए कई छोटे-छोटे दलों से गठबंधन भी किया जिसमें अपना दल और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी प्रमुख है। इसमें अपना दल (एस) तो तमाम विरोधाभाष के अब भी बीजेपी के साथ है। यह जरूर है कि सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर यूपी कैबिनेट के मंत्री रहते हुए बीजेपी सरकार पर लगातार हमलावर हैं।
राजनीतिक हल्कों में व्याप्त चर्चा के तहत कांग्रेस बड़ा प्रलोभन दे कर ओमप्रकाश राजभर को बीजेपी से तोड़ सकती है। राजभर की पहले भी कांग्रेस से दोस्ती रही है। और यह काम ललितेशपत्रि त्रिपाठी अच्छी तरह से कर सकते हैं क्योंकि राजभर के संबंध ललितेशपति के पिता पूर्व एमएलसी राजेशपति त्रिपाठी से काफी मधुर हैं। उधर आरपीएन सिंह पर बड़ी जिम्मेदारी होगी गोरखपुर और आसपास के बड़े वोटबैंक पर असर रखने वाली निषाद पार्टी को साधने की। यह निषाद पार्टी ही है जिसके चलते गोरखपुर संसदीय सीट के उपचुनाव में सीएम योगी आदित्यानाथ की परंपरागत सीट बीजेपी से छिन गई थी।
इन दो नामों के अलावा कांग्रेस के पास और कोई बडा नाम नहीं दिखता जिसकी आमजन पर अच्छीखासी पकड हो। दूसरे आरपीएन सिंह को बड़ा ओहदा देने पर भले पार्टी के भीतर कोई कलह न पैदा हो पर ललितेशपित त्रिपाठी के साथ ऐसा नहीं है। उन्हें बनारस से ही चुनौती देने के लिए कई धड़े खड़े हैं। ऐसे में यह काम और भी पेंचीदा हो सकता है।
वैसे राजनीतिक विश्लेषकों के बीच बसपा का दामन छोड़ कर कांग्रेस में शामिल हुए मुस्लिम नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी का नाम भी चर्चा में है। कहा जा रहा है नसीमुद्दीन प्रियंका के सहयोगी के तौर पर मुसलमानों के बीच घुसपैठ कर सकते हैं।