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#Akhirkyun-ऐसे तबाह हुआ बनारसी साड़ी उद्योग

दो गलत फैसले जिनसे बनारस के बुनकरों की कमर टूट गई। बुनकरों को आज भी रुलाता है उन फैसलों का दर्द।

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Varanasi Uttar Pradesh

Aug 28, 2016

weavers of banaras

weavers of banaras

मो. रफत फरीदी

वाराणसी. हम बुनकरों के दर्द से वाकिफ हैं, बुनकरों के लिये जो किया हमने किया, हम सत्ता में आए तो बुनकरों के सारे दुख दर्द दूर कर देंगे, अब तक बुनकरों को केवल वोट बैंक के नजरिये से देखा गया लेकिन हम उन्हें भारत के विकास के रूप में देखेंगे। तकरीबन हर नेता और सरकारों ने बुनकरों के लिये ऐसी ही बातें कीं हैं। बावजूद इसके आज भी बुनकर बदहाल हैं, बल्कि पहले से ज्यादा बदहाल हो गए हैं। क्या आप जानते हैं कि बुनकरों की बदहाली के पीछे कारण क्या है। छोटी-छोटी वजहें तो कई हैं, पर सरकारों के ने दो ऐसे फैसले किये हैं जिन्होंने बनारस के बुनकरों की कमर तोड़ कर रख दी। इन फैसलों के बाद बनारसी साड़ी का कारोबार फिर कभी अपनी चमक को नहीं पा सका और बुनकर लगातार बदहाल होता गया।









सरकार का वो पहला फैसला जिसने बुनकरों को तोड़ा वह था करघे पर डिजाइन के लिये प्रयोग होने वाले जकार्ट की पावरलूम पर इस्तेमाल की इजाजत। जकार्ट ही वह चीज है जिसके जरिये बुनकर बनारसी साड़ी पर डिजाइन बनाते हैं और उस डिजाइन को अपने हुनर की बदौलत बनारसी साड़ी पर हू ब हू उतार देते हैं। जकार्ट का इस्तेमाल पहले पावरलूम पर बैन था। पर शंकर सिंह वाघेला के कपड़ा मंत्री रहते हुए उन्होंने पावरलूम पर जकार्ट के इस्तेमाल की इजाजत दे दी। इसका फायदा बुनकरों को कम सूरत के पावरलूम कारोबारियों को ज्यादा मिला।






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बुनकर बिरादराना तंजीम बारहों के सरदार हाशिम ने बताया कि सूरत के कारोबारियों ने पावरलूम पर इलेक्ट्रॉनिक जकार्ट का धड़ल्ले से इस्तेमाल शुरू कर दिया। जकार्ट लग जाने से पावरलूम पर वह डिजाइन हू ब हू कॉपी होने लगी जो सिर्फ करघे पर ही बन सकती थी। इतना ही नहीं रेशम के बदले पॉलिस्टर का धागा इस्तेमाल कर नकली बनारसी साड़ी बाजार में बेची जाने लगी। करघे पर तैयार 10 हजार हू ब हू साड़ी की नकल पावरलूम की मदद से डेढ़ से दो हजार रूपये में मार्केट में बिक्री होने लगी। इससे बुनकर टूट गए।

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बुनकरों के विकास के लिये काम करने वाले हाजी बदरुद्दीन अंसारी कहते हैं कि जब शंकर सिंह वाघेला बनारस आए और उन्होंने बुनकरों से पावरलूम पर जकार्ट लगाकर काम करने की बात कही तो सभी ने इसका विरोध किया। उन्होंने बुनकरों को पावरलूम पर सब्सिडी देने की भी बात कही। हमारा उनसे यही सवाल था कि आप आखिर क्यों चाहते हैं कि बनारस कीी यह हैरिटेज कलाा जिससे लाखों लोगों की रोजी रोटी जुड़ी है समाप्त हो जाय। हमारे भारी विरोध के बावजूद सरकार ने फैसला लिया और उसका असर आज बुनकरों की तबाही के रूप में साफ देखा जा सकता है।






दूसरा फैसला जिससे बुनकरों पर दोहरी मार पड़ी और वह न सिर्फ बर्बाद हुए बल्कि कर्जदार भी हो गए, वह था सरकार का बुनकरों का माल खरीदना बंद करना। बदरुद्दीन अंसारी ने बताया कि पहले यूपी हैण्डलूम और यूपिका के जरिये बुनकरों से तैयार माल सरकार खरीदती थी। शहर में पांच सेंटर थे और हम खुद अधिकारियों के साथ बैठकर सेंटरों पर बुनकरों की साड़ियां खरीदकर उन्हें कैश पेमेंट करते थे। पर सरकार ने इसे बंद कर दिया और दलील दी कि फण्ड नहीं है। असलियत यह थी कि वहां भ्रष्टाचार होता था और बुनकरों से एक हजार रुपये में खरीदी गई साड़ी को पांच हजार रुपये में बेचा जाता था। कोई निगरानी न होने के चलते भ्रष्टाचार खूब हुआ और यूपी हैण्डलूम व यूपिक को ग्राहक मिलना कम हो गए। पर इसमें बुनकरों की कोई गलती नहीं थी।







इसे बंद कर सरकारों ने ओपन बुनकर मार्केट की परिकल्पना की और वादा किया, लेकिन वह भी जुमला ही साबिह हुआ और जमीन पर कभी नहीं उतरा। जब यह सिस्टम बंद कर दिया गया तो इससे बड़ी तादाद में बुनकरों का पैसा डूब गया। बुनकर कर्जदार बन गए और कई ने तो खुदकुशी तक की कोशिश की। पूर्वांचल पॉवरलूम एसोसिएशन से जुड़े लोग कहते हैं कि बदहाली की वजह पिछली सरकारों की आर्थिक नीतियाँ हैं। पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा ने दक्षिण से आने वाले रेशम को बढ़ावा देने के लिए चीन से आने वाले रेशम की आमद में अड़चनें पैदा कीं। सरदार हाशिम बताते हैं कि एचडी देवगौड़ा ने चाइना के रेशम को रोककर दक्षिण भारत के रेशम को बढ़ावा दिया, जबकि वह चाइनीज रेशम के सामने काफी कमजोर क्वालिटी का होता है। बनारसी साड़ी में आज भी 80 प्रतिशत रेशम चाइना का ही इस्तेमाल होता है। सिर्फ 20 प्रतिशत रेशम ही दक्षिण भारत का प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा निर्यात में भी ऐसी अड़चनें पैदा की गईं जिससे बनारसी साड़ी कारोबार को और तगड़ा झटका लगा।

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