
Asi river (File photo)
वाराणसी. इस पौराणिक शहर के वजूद को ही नकारा जा रहा है। पुराणों में वर्णित है कि वरुणा और असि नदी के बीच शहर को ही 'वरुणोसि'' कहा गया जिसका अपभ्रंश है वाराणसी। इसे नकारा नहीं जा सकता। नदी वैज्ञानिक और शहर को जानने वाले विद्वतजनो का मानना है कि प्रशासन पूरे शहर का इतिहास ही बदलने पर तुला है। इसका पुरजोर विरोध होना चाहिए। प्रशासन किसी कीमत पर असि नदी को नाला नहीं करार सकता।
बता दें कि असि नदी का वर्तमान स्वरूप जरूर नाले में तब्दील हो गया है, लेकिन ये हकीकत नहीं है। प्राचीन नगरी काशी की दो नदियों शहर उत्तरी में वरुणा और दक्षिणी में असि नदी रही और इन दोनों के बीच बसे शहर को ही वरुणोसि कहा गया जो बाद में वाराणसी हो गया। गंगा वैज्ञानिक प्रो बीडी त्रिपाठी ने पत्रिका से बातचीत में यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि कोई असि नदी को सिरे से खारिज कैसे कर सकता है। प्रशासन जाने किस नक्शे के आधार पर असि नदी को नाला बता रहा है लेकिन इसका पौराणिक महत्व है जिसे नकारा नहीं जा सकता। इसके लिए वराणसी के नागरिकों को संघर्ष करना ही होगा।
वाराणसी के पुराने निवासियो का कहना है कि दरअसल जिन लोगों ने पिछले 50 या 100 साल पहले असि नदी के पाट पर कब्जा कर मकान बना लिया अब वो ही शासन प्रशासन पर दबाव बना कर असि नदी के पौराणिक महत्व को खारिज करते हुए अपना मकान बचाने में लगे हैं। ये उन्हीं की कोशिश है।
यहां बता दें कि नदी वैज्ञानिक, पर्यावरणविद और स्वयंसेवी संस्थाएं लंबे अरसे से वरुणा और असि नदी के पुनर्जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इनमें से एक साझा संस्कृति मंच कई बार अलग-अलग तरीके से आंदोलन भी चला चुका है। इसमें संकट मोचन फाउंडेशन का भी सहयोग रहा है। संकटमोचन और असि पुलिया पर पोस्टर प्रदर्शनी तक लगाई गई थी बल्लभाचार्य पांडेय की अगुवाई में। इन संस्थाओं और प्रबुद्ध लोगों ने एनजीटी तक रिपोर्ट कर नदी के अस्तित्व को बचाने की मांग की थी। उसके बाद ही एनजीटी की टीम गत फरवरी में आई थी। एनजीटी की यूपी सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट मॉनीटिरिंग कमेटी के अधिकारियों ने नगर भ्रमण के दौरान वरुणा व असि किनारे काफी संख्या में भवनों के अतिक्रमण पर चिंता जताई थी। कमेटी के अध्यक्ष देवी प्रसाद सिंह व सचिव राजेंद्र प्रसाद सिंह ने विभागों के साथ बैठक कर अतिक्रमण को चिह्नित कर कार्रवाई का निर्देश दिया था। साथ ही खुले वाले स्थानों पर पौधरोपण कर अतिक्रमण से बचाने के लिए भी कहा था।
अब उसके बाद वाराणसी के राजस्व विभाग ने एनजीटी को जो रिपोर्ट भेजी है उसमें 1883 के बंदोबस्ती नक्शे का हवाला देते हुए असि नदी को नाला करार दिया है। बताया है कि उस नक्शे के आधार पर यह नदी नही नाला है और इसके किनारे किसी तरह का अतिक्रमण नहीं है। राजस्व विभाग ने अपने सर्वे में 10 किमी लम्बी नदी को नाला बताया। रिपोर्ट के मुताबिक 1883 में राजस्व विभाग की ओर से तैयार बंदोबस्ती नक्शे में नदी नाले के रूप में दर्शायी गई है। इसमें कई जगहों पर निजी जमीन पर नाला बह रह रहा है। सदर एसडीएम संजीव कुमार ने बताया कि सर्वे की रिपोर्ट एनजीटी को सौंप दी गई है।.
असि नदी का उद्गम
असि नदी का उद्गम स्थल कंदवा है। वहां से चितईपुर, करौंधी, करमजीतपुर, नेवादा, सरायनंदन, नरिया, नगवां और भदैनी आदि मौजा से गुजरती है। कुल 10 किलोमीटर है नदी की लंबाई। कंदवा उद्गम स्थल पर नदी का व्यास वर्तमान में 30 से 40 फीट है लेकिन नरिया से संकटमोचन मंदिर के पास वह नाले के रूप में आठ फीट तक सिमट कर रह गई है।
असि नदी को भले ही राजस्व विभाग नाला बताए लेकिन वह नदी है। नदी और नालों पर कई स्तर पर अंतर होता है। नदी के स्वरूप में भूमि गत जल का रिसाव होता है। नदी के दोनों तरह की ओर से सतह का ढाल होता है जिसमें भूमिगत जल निकलता रहता है। वहीं, नाले का स्तर ऊपर होता है। असि नदी के सतह में करीब सात से आठ फीट खुदाई करने के बाद पानी निकलेगा। यह नदी को साबित करने काफी होता है।
कोट
" असि नदी है, इसका पौराणिक महत्व है। प्रशासन के पास वो कौन सा नक्शा या आधार है जिस आधार पर वे इसे नाला घोषित कर रहे हैं ये वो जानें। पर यह हकीकत नहीं है। दरअसल वरुणा और असि नदी के बीच बसे शहर को ही वरुणोसि का नाम दिया गया जो कालांतर में वाराणसी हो गया। यही सच है।"- प्रो बीडी त्रिपाठी, बीएचयू स्थित महामना मालवीय गंगा शोध केंद्र के चेयरमैन, गंगा बेसिन अथॉरिटी के पूर्व सदस्य व गंगा वैज्ञानिक
Published on:
12 Jul 2019 02:23 pm
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