मदनपुरा के मकबूल अभी पिछले महीने कराची से लौटे हैं ,हाल के दिनों में हुई घटनाओं से बेहद भयभीत मकबूल कहते हैं यहाँ और वहां में अंतर केवल इतना है कि हम गंगा और वरुणाकिनारे वाले हैं वो ल्यारी और म्यारी के किनारे वाले। मकबूल कहते कि पाकिस्तान के बनारस में वही लोग हैं जो विभाजन के वक्त बनारस से पाकिस्तान पलायन कर गए। इन लोगों की न बोली बदली न बनारसियत ही कम हुई, वही खाना पीना वही मौज मस्ती।आज के वक्त में पाकिस्तान के बनारस मोहल्ले में साड़ियो की अकेले 500 से 600 दूकाने हैं।बेहद खूबसूरत कारीगरी का असर यह है कि पाकिस्तान में होने वाली शादियों में खरीददारी का एक बड़ा केंद्र कराची का बनारस बाजार ही होता है। हालांकि समय के साथ-साथ वहां पर भी मंदी का असर नजर आने लगा है, आय के अवसर काम हुए हैं।पाकिस्तान के बनारस में चार मोहल्ले हैं जिनके नाम सुलेमानी, रहमानी, फ्रंटियर और रब्बानी है।लगभग हर दूसरे घर में यहां साड़ियों का काम होता है। वही धागा, वही कारीगरी, वही हाथ के काम होते हैं जो यहाँ हिन्दुस्तान के बनारस में होते।