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कैंसर का इलाज है पर एमएनडी की तो दवा तक नहीं, बढ़ते प्रदूषण की है देन, अब BHU के न्यूरोलॉजिस्ट की फिल्म करेगी जागरूक

नसों को गला देने वाले जानलेवा रोग की भयावहता पर बना डाली डाक्यूमेंट्री जो अगले महीने होगी रिलीज, भौतिक विज्ञानी, स्टीफन हॉकिंग थे रोगी।

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मोटर न्यूरॉन्स डिजीज फिल्म की सीडी की लांचिंग

मोटर न्यूरॉन्स डिजीज फिल्म की सीडी की लांचिंग

डॉ अजय कृष्ण चतुर्वेदी


वाराणसी. लोगों को पता ही नहीं चलता और उनके शरीर की नसें धीरे-धीरे गल जाती हैं। विज्ञान क्या मेडिकल साइंस चाहे जितनी ऊंचाई पर पहुंच गया हो पर इस रोग की दवा अब तक नहीं है। लेकिन यह असाध्य रोग। इसके तहत रीढ़ की नसों और दिमाग की नसें काम करना लगभग बंद कर देती हैं। ऐसे रोगियों की उम्र बमुश्किल पांच से सात साल ही होती है। कुछ अपवादों में लोग ज्यादा से ज्यादा 10 साल तक जी पाते हैं। ऐसे में बीएचयू के न्यूरोलॉजिस्ट ने इस कैंसर से भी घातक जानलेवा बीमारी के प्रति लोगों को जागरूक करने और उससे बचने के लिए एक डाक्यूमेंट्री तैयार की है। यह डाक्यूमेंट्री काशी के घाटों पर बनी है। स्थानीय लोगों ने इसमें काम किया है। अब इस डाक्यूमेंट्री के रिलीज का वक्त आ गया है। इसे जुलाई में रिलीज करने की तैयारी है। यह जानकारी विख्यात न्यूरोलॉजिस्ट डॉ विजय नाथ मिश्र ने पत्रिका को दी। बताया कि अंग्रेजी भौतिक विज्ञानी, स्टीफन हॉकिंग थे इस रोग से पीड़ित।

बनारस पूर्वाचल में एमएनडी की आशंका ज्याद

उन्होंने बताया कि इस घातक बीमारी का नाम मोटर न्यूरॉन्स डिजीज (एमएऩडी) है। कहा कि मोटर न्यूरॉंस तंत्रिका कोशिकाएं हैं जो मांसपेशियों को बिजली की तरह संकेत भेजती हैं। इससे मांसपेशियों की कार्य क्षमता प्रभावित होती है। यह रोग किसी भी उम्र में हो सकता है। यह महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों को ज्यादा प्रभावित करता है। बताया कि मोटर नूरान डिज़ीज़ के प्रमुख कारणों में प्रदूषण सबसे ऊपर है। वह भी धातु प्रदूषण, चाहें वो जल में हो या वायु में या खाने में, जिसमें प्रमुख रूप से, ज़िंक, क्रोमियम, अलमुनियम शामिल है। इसमें सबसे ज़्यादे ख़तरनाक धातु है, क्रोमियम जो कि पेंट में इस्तेमाल होता है। उन्होंने बताया कि बनारस में क्रोमियम की इतनी अधिकता है कि पूछें नहीं। ऐसे में इसके प्रकोप की आशंका बनारस और आसपास के जिलों में ज्यादा है। अब इस फिल्म की सीडी को डॉ मिश्र के नेतृत्व में न्यूरोलॉजी विभागाध्यक्ष व आईएमएस के डायरकेटर ने वीसी डॉ राकेश भटनागर को भेंट किया।

डॉ मिश्र ने बताया कि नसों को गला देने वाली इस भयावह बीमारी ‘मोटर न्यूरॉन डिजीज’ (एमएनडी) पर अभी तक दवा नहीं बनी है ऐसे में इसके खतरे से लोगों को आगाह करने के लिए यह डाक्यूमेंट्री बनाई गई है ताकि लोग सजग हो सकें। उन्होंने बताया कि प्रदूषण चाहे जल का हो या वायु का वह इतना घातक स्तर तक पहुंच गया है कि अब ऐसी-ऐसी बीमारियों का असर दिखने लगा है जिनका कोई इलाज ही नहीं है। एक बार ऐसे रोगों की चपेट में आए तो मरना तय है। यह रोग ज्यादा वक्त भी नहीं देता। महज दो माह से अधिकतम डेढ़ साल के भीतर मरीज का दम तोड़ना तय है। अब तो बनारस सहित पूर्वांचल में भी इस रोग ने तेजी से पांव पसारना शुरू कर दिया है। इतना ही नहीं एक बारगी इस रोग की चपेट में आने के बाद मरीज तिल-तिल कर हर क्षण मरता ही रहता है। मोटर न्यूरॉन रोगियों को चलने-फिरने में बहुत गंभीर रूप से कठिनाई पंहुचाता है। समय गुजरने के बाद आदमी उठ बैठ भी नहीं पाता। इसका बखूबी चित्रण किया गया है इस फिल्म में।

ऐसे में बीएचयू के न्यूरोलॉजी विभाग के डॉक्टरों की टीम ने इस अति गंभीर बीमारी के इलाज के लिए दुनिया के वैज्ञानिकों से अपील की है। उन्होंने इसके लिए एक फिल्म भी तैयार की गई थी जिसे सेंसर बोर्ड से मंजूरी मिल गई है। फिल्म का नाम है ‘द डाइंग मैन एंड हिज डाइंग सिटी’, जो जुलाई में रिलीज होगी। इस फिल्म के निर्देशक हैं नरेंद्र आचार्य जिन्होंने बताया है कि किस तरह से मनुष्य के शरीर की नसें गलती जाती हैं और इसका क्या असर उनके शरीर पर पड़ता है। इस डाक्यूमेंट्री में मणिकर्णिका महाश्मशान पर मोक्ष की अवधारणा भी दिखेगी और रामनगर किले के वैभव से लेकर और महामना की कर्मस्थली बीएचयू में कर्तव्य पथ पर बढ़ने की प्रेरणा भी।

फिल्म के कलाकार

उन्होंने बताया कि विश्व में सबसे भयावह बीमारियों में से एक, मोटर नूरॉन डिज़ीज़ पर आधारित नरेंद्र आचार्य की 18 मिनट की फ़िल्म "the Dying Man & his Dying city" तैयार की गई है। इस फ़िल्म में बीएचयू के नूरॉलॉजी विभाग के डोक्टरों प्रो. दीपिका जोशी, प्रो अभिषेक पाठक, प्रो. रामेश्वर चौरसिया के अलावा वाराणसी की अलका राय और हरीश सेवत द्विवेदी, हरेंद्र शुक्ला आदि ने काम किया है। साथ ही मैं खुद और मेरी पत्नी भी इस फिल्म का हिस्सा हैं। इसका फिल्म का उद्देश इस बीमारी के बारे में लोगों को बताना और चिकित्सकों तथा वैज्ञानिकों से इस पर और अधिक से अधिक रीसर्च करेने की अपील करना है ताकि रोगियों के इलाज के लिए दवा का इज़ाद हो सके। इस फिल्म में हरीश द्विवेदी और अलका राय ने उम्दा कार्य किया है।

बीएचयू के न्यूरोलॉजी विभाग में आने वाले कुछ मरीजों की केस स्टडी

केस-1 गाजीपुर निवासी अमरपाल उम्र 62 वर्ष, जब वह 60 वर्ष की अवस्था में पोस्ट्मास्टर पद से सेवानिवृत्त हुए तभी बीचयू के नूरॉलॉजी विभाग में आए। उन्हें कंधे एवं पैर की माशपेशियों में फड़फड़ाहट की शिकायत थी एक महीने से। छह महीने बाद पैर और हाथों की मांसपेशियां गल गईँ। खाना घोटने में दिक़्क़त होने लगी। कोई दवा काम नही कर रही थी। फिर एक दिन दवा खाते समय वह सरक गई, दो महीने तक उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया। मर्ज शुरू होने के दो वर्ष के भीतर ही उनकी मौत हो गई।

केस-2 चुनार निवासी फ़ातिमा बीबी एक दिन आईं ओपीडी (बहिरंग विभाग) में, उन्हें तीन महीने से सांस लेने में दिक़्क़त हो रही थी। कुछ भी निगल नहीं पा रही थीं। इलाज शुरू हुआ लेकिन तीन महीने बाद ही एक दिन खाना खाते समय एक निवाला सरक गया और उनकी मौत हो गई। इसे बलबर एमएन डी कहा जाता है।

केस-3 वाराणसी निवासी 35 वर्षीय बदरीनाथ पिछले एक साल से इस मर्ज से जूझ रहे है। हाथ पैर सूख रहा है। खाने में दिक़्क़त है। अब चलना फिरना मुश्किल हो गया है।

मोटर न्यूरॉन रोग अवस्था के लक्षण
- अगर आपको कोई चीड पकड़ने में दिक्कत हो, किसी चीज को उठा न सकें
-शरीर में हमेशा थकान का अनुभव हो
- मांसपेशियों में दर्द और ऐंठन
-पैरों में कमजोरी
- कुछ भी निगलने में दिक्कत हो
- सांस लेने में दिक्कत हो
-मांसपेशियों में दर्द और कमजोरी में वृद्धि
-अंग निरंतर कमजोर हो जाते हैं
मांसपेशियों को असामान्य रूप से कठोर हो सकता है
-खाने, पीने और निगलने में कठिन हो
- मुख में बनने वाला लार अनियंत्रित हो जाता है
-जबड़ों में तीव्र जलन
- बोलने में दिक्कत
-हंसने, रोने की प्रक्रिया में बलाव
- अनिद्रा , चिंता, और अवसाद

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