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CM योगी की संसदीय सीट का उपचुनाव होगा रोचक, विपक्ष ब्राह्मण नेता पर लगा सकता है दांव

जानिए क्या है विपक्ष की रणनीति, कौन हो सकता है बीजेपी का उम्मीदवार...

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सीएम योग आदित्यनाथ

सीएम योग आदित्यनाथ

डॉ अजय कृष्ण चतुर्वेदी

वाराणसी. सीएम योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री और विधान परिषद सदस्य बनने से रिक्त गोरखपुर संसदीय सीट पर इस बार रोचक मुकाबला होने जा रहा है। इस सीट पर 1989 से बीजेपी और हिंदू महासभा यानी एक तरह से गोरक्षनाथ पीठ का कब्जा रहा है। चाहे मंदिर के महंत अवैध्यनाथ रहे हों या योगी आदित्यनाथ। इन दोनों के आगे विपक्ष की सारी रणनीति लगातार फेल होती रही है। लेकिन योगी आदित्यनाथ के हटने के बाद अब विपक्ष को लग रहा है कि वह इस बार इस सीट पर कब्जा कर सकती है। इसके लिए साझा उम्मीदवार उतारने की तैयारी चल रही है और वह भी किसी ब्राह्मण को। हालांकि सीएम योगी आदित्यनाथ भी अपने चहेते एक ब्राह्मण को ही मैदान में उतारने सकते है, ऐसे संकेत गोरखपुर की फिजाओं में तैरने लगे हैं।

गोरखपुर संसदीय सीट 1989 से गोरक्षनाथ मंदिर के कब्जे में है। विपक्ष ने तमाम कोशिश की मगर सारी कोशिशें जाया हुईं। ऐसे में अब यह पहला मौका है कि विपक्ष को लग रहा है कि यहां से सफलता मिल सकती है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि विपक्ष यह सोचता है कि इस बार बीजेपी को मंदिर से कोई प्रत्याशी नहीं मिलने जा रहा है। ऐसे में वह इस खाली मैदान में अपना झंडा गाड़ने को बेताब है। विपक्ष यहां गुरुदासपुर दोहराने की कोशिश में लगा है। ऐसे में एक ऐसे ब्राह्मण प्रत्याशी की तलाश हो रही है जो भले ही गोऱखपुर में न रह रहा हो पर उसका जुड़ाव किसी न किसी रूप में गोरखपुर से जरूर हो। कोशिश यह है कि मुख्यमंत्री बनने के तत्काल बाद जिस तरह से योगी आदित्यनाथ ने प्रतिद्वंद्वी हरिशंकर तिवारी के आवास पर छापा मरवाया था और वहां कुछ आपत्तिजनक मिला भी नहीं। इसे लेकर गोरखपुर की ब्राह्मण लॉबी में सीएम को लेकर खासी नाराजगी भी है। उस नाराजगी को भुनाने की कोशिश में जुटा है विपक्ष। ऐसे में एक नाम ऐसे नाम पर आम सहमति बनाने की कोशिश की जा रही है जो हरिशंकर तिवारी से खास माने जाते हैं। छात्र राजनीति से लेकर अब तक उनका संबंध हरिशंकर तिवारी से काफी नजदीक का रहा है। वह मूल रूप से गोरखपुर-देवरिया से ताल्लुख रखते हैं। सूत्र बताते हैं कि उन्होंने अपनी नई पारी के लिए तैयारी भी शुरू कर दी है। पूर्व में भी वह पूर्वांचल के ही एक संसदीय सीट से सांसद रह चुके हैं।

गोरखपुर का अब तक का संसदीय इतिहास


गोरखपुर के संसदीय इतिहास पर नजर डालें तो 1952 में पहली बार हुए चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी दशरथ प्रसाद द्विवेदी ने फतह हासिल की। फिर 1957 व 1962 में कांग्रेस के राम सिंहासन सिंह ने इस सीट पर कब्जा जमाया लेकिन 1967 में पहली बार कांग्रेस को झटका दिया हिंदू महासभा के उम्मीदवार और गोरक्षनाथ पीठ के तत्कालीन महंत दिग्विजयनाथ ने। उसके बाद 1970 में हुए मध्यावधि चुनाव में हिन्दू महासभा ने अपनी सीट पर कब्जा बनाए रखा और इस सीट से अवैद्यनाथ विजयी हुए। लेकिन 1971 में हुए आम चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी नरसिंह नारायण पाण्डेय ने हिंदू महासभा से यह सीट छीन कर कांग्रेस की झोली में डाल दी। फिर 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर हरिकेश बहादुर विजयी हुए। हरिकेश बहादुर ने 1980 में भी इस सीट पर कब्जा बरकरार रखा लेकिन तब वह कांग्रेस के उम्मीदवार थे। 1984 में भी यह सीट कांग्रेस के ही पास रही और जीत हासिल की मदन पाण्डेय ने। लेकिन 1989 में फिर से गोरक्षनाथ पीठ के. महन्त अवैद्यनाथ ने हिन्दू महासभा के टिकट पर जीत हासिल कर कांग्रेस से पिछला हिसाब चुक्ता कर लिया। महंत अवैद्यनाथ ने 1991 और 1996 में भी सीट पर कब्जा कायम रखा। इस सीट पर पहली बार 1998 में योगी आदित्यनाथ काबिज हुए तो फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा और 1999, 2004, 2009 और 2014 में इस सीट से विजयी रहे। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि गोरखपुर संसदीय सीट पर अब तक के इतिहास में कांग्रेस का मुकाबला हिंदूवादी संगठन यानी हिंदू महासभा या भारतीय जनता पार्टी से ही रहा है। ऐसे में साझा विपक्ष अगर चुनाव लड़ता है तो यहां से कांग्रेस मजबूत दावेदारी पेश करेगी। ऐसे में हरिशंकर तिवारी के करीबी ब्राह्मण नेता को तरजीह मिल सकती है।

सीएम योगी का उम्मीदवार भी ब्राह्मण

वैसे बीजेपी या यूं कहें कि गोरखपुर के निवर्तमान सांसद और गोरक्षपीठ के महंत योगी आदित्यनाथ की ओर से भी एक ब्राह्मण नाम गोरखपुर की फिज़ाओं में तैरने लगा है। गोरखपुर की राजनीति से गहरे ताल्लुख रखने वाले राजनीतिक पंडितों का कहना है कि योगी आदित्यनाथ कभी नहीं चाहेंगे कि उनकी सीट पर कोई राजनीतिक व्यक्ति आए। उनकी पूरी कोशिश होगी कि मंदिर से ही जुड़े किसी व्यक्ति को मैदान में उतारा जाए जो उनके लिए रबर स्टांप की तरह काम कर सके। लोगों का कहना है कि योगी आदित्यनाथ अपने कट्टर विरोधी शिव प्रताप शुक्ला के खिलाफ डॉ राधामोहन दास अग्रवाल (हिन्दू महासभा) को मैदान में उतारने जैसी गलती दोबारा नहीं कर सकते। बता दें कि योगी आदित्यनाथ ने भाजपा प्रत्याशी शिवप्रताप शुक्ला के खिलाफ डॉ अग्रवाल को हिंदू महासभा से मैदान में उतारा था और आज डॉ अग्रवाल उऩकी मुखालफत का कोई मौका नहीं चूकते। उन्होंने संगठन में अपनी अच्छी पैठ बना ली है। ऐसे में ज्यादा संभव है कि वह मंदिर से ही किसी को उतारेंगे और जो उनका खास होगा। वर्तमान में भी वही गोरखपुर में योगी आदित्यनात के कामकाज देख रहे हैं। यानी इस बार गोरखपुर में दो ब्राह्मणों के बीच सियासी जंग की जमीन तैयार होने लगी है।