
अखिलेश यादव
वाराणसी. कार्यकाल के चार साल पूरे होने के बाद जिस तेवर के साथ पीएम नरेंद्र मोदी ने 2019 लोकसभा चुनाव का बिगुल फूंका उसने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी थी। राजनीतिक विश्लेषक भी विपक्ष के एकजुट होने को लेकर तमाम सवाल उठाने लगा था। ऐसे में सबकी निगाह एक बार फिर से यूपी के कैराना और नूरपुर उपचुनाव पर टिक गई थीं। और अब जब दोनों परिणाम विपक्षी सियासत की नई इबारत नजर आने लगी है। ये संकेत कहीं न कहीं से सीएम योगी आदित्यनाथ के बतौर सीएम राजनीतिक भविष्य पर बड़ा सवालिया निशान खड़ा करने लगी है। कारण योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से यूपी में कुल चार सीटों (लोकसभा और विधानसभा) पर उप चुनाव हुए और चारों में बीजेपी चारो खाने चित्त नजर आई। बतौर सीएम योगी की सियासत के लिए गंभीर संकट दर्शाता है। उधर पूर्व सीएम अखिलेश यादव की रणनीति पूरी तरह से कामयाब नजर आने लगी है।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यूपी विधानसभा चुनाव में भले ही विपक्षी गठबंधन (कांग्रेस-सपा) को बुरी हार का सामना करना पड़ा लेकिन उस पराजय के बाद जिस तरह से पूर्व सीएम अखिलेश ने नई रणनीति अख्तियार की वह उसमें लगातार सफल होते नजर आ रहे हैं। विपक्षी दलों को एकजुट करने में वह काफी हद तक सफल रहे हैं चाहे वह फूलपुर और गोरखपुर संसदीय उपचुनाव रहा हो या अब कैराना उपचुनाव। बता दें कि कैरान जिसे लेकर बीजेपी ने अखिलेश सरकार के वक्त से लेकर अब तक जो विरोध के तेवर दिखाए थे। पूरी तरह से जिस तरह से हिंदू कार्ड खेला गया, उससे विपक्षी फतह को लेकर राजनीतिक गलियारों में भी दांव नहीं लग रहे थे। लेकिन जिस तरह से कैराना में मतगणना के शुरूआती दौर से आरएलडी ने बढ़त बनाई वो फिर बढ़ती ही गई। इस जीत से आरएलडी जो अब तक हासिये पर जाती नजर आ रही थी उसने भी अपने पुनर्जीवन का एहसास करा दिया है। इस जीत के पीछे कहा जा रहा है कि अजित सिंह ने काफी मेहनत की और यह साबित कर दिया कि उनका राजनीतिक जीवन अभी शेष है। वह चुके नहीं है और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनकी पैठ अभी बरकरार है। आरएलडी का यह प्रदर्शन महागठबंधन के लिए शुभ संकेत है। अगर इसी तरह से अजित सिंह अपनी खोई जमीन पर फिर से पकड़ बनाते दिख रहे हैं उससे लगता है कि 2019 फतह की राह बीजेपी के आसान नहीं रहने वाली।
उधर सपा की बात करें तो फूलपुर और गोरखपुर यानि डिप्टी सीएम और सीएम की सीट पर जीत से पुनर्वापसी करने के बाद अब नूरपुर में जिस तरह से पार्टी ने फतह हासिल की है, वह बताता है कि पूर्व सीएम अखिलेश यादव को अब राजनीति में बबुआ नहीं रहे। अब वह कम से कम यूपी की सियासत को अच्छी तरह से जान व पहचान चुके हैं। दूसरे बीजेपी के विरुद्ध विपक्षी गठबंधन बनाने में भी वह पूरी तरह से कामयाब है। जिस तरह से उन्होंने 19 साल पुराने विवाद को खत्म कर मायावती तक को महागठबंधन का हिस्सा बनाया। राहुल गांधी की दोस्ती अभी भी कायम है। और अब बसपा, कांग्रेस के साथ आरएलडी को जोड़ कर उन्होंने यूपी में तो कम से कम महागठबंधन को काफी हद तक मजबूत कर दिया है। फिर जिस तरह से अपनी स्थिति, अपनी ताकत को समझते हुए राहुल गांधी यूपी की राजनीति कर रहे हैं उससे भी महागठबंधन को काफी हद तक मजबूती मिल रही है। एक बात तो तय है कि 2019 लोकसभा चुनाव के माध्यम से केंद्र की सत्ता पर वही काबिज होगा जो यूपी में सर्वाधिक सीट पाएगा। ये अब तक का रिकार्ड रहा है। इस लिहाज से फूलपुर और गोरखपुर के बाद कैराना और नूरपुर उपचुनाव परिणाम ने विपक्ष की उम्मीदों को फिर से जिंदा कर दिया है।
Published on:
31 May 2018 03:48 pm
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