
भगवान सूर्य को अर्ध्य दान
वाराणसी. दशहरा, दीपावली, अन्नकूट को निबटा कर अब लोग Chhath puja या सूर्य षष्ठी का महापर्व की तैयारी में जुट गए हैं। इस चार दिवसीय महापर्व में महज 4 दिन ही शेष रह गए हैं। वाराणसी में हमेशा की तरह इस बार भी व्रतीजनों की कठिन परीक्षा होगी गंगा घाटों पर क्योंकि इस बार बाढ फिर देर तक हुई बारिश के चलते घाटों की सीढ़ियों से मिट्टी नहीं हटाई जा सकी है। घाटों पर फिसलन भी है और गंदगी का अंबार भी। तीन दिन पहले यह सूचना जरूर आई थी कि 84 घाटों पर पंप लगा कर बाढ के दौरान आई गंदगी और मिट्टी को पुनः गंगा में बहाने की प्रक्रिया शुरू करा दी गई है। लेकिन इन सब से इतर डीजल रेल इंजन कारखाना परिसर स्थित सूर्य सरोवर पर इस दफा कोई रोक-टोक नहीं है, सरोवर की सफाई हो चुकी है। व्रतीजन पूजा की बेदी बनाने में जुट गई हैं।
डीएलडब्ल्यू स्थित सूर्य सरोवर पर श्रद्धालु महिलाओं की जुटान होने लगी है। वो पूजा वेदी बनाने में जुट गई हैं। इसे घाट छेकना भी कहा जाता है। यानी जहां जिसने पूजा वेदी बना ली वह वहीं अर्घ्य देगा, दूसरा कोई उस स्थान से अर्घ्य नहीं देगा। दरअसल इस अनुष्ठान में स्वच्छता विशेष महत्व रखा जाता है लिहाजा हर व्रती और उसके परिजन हक काम बड़ी साफगोई से करते हैं।
सरोवर पर होगी चाक चौबंद सुरक्षा, ड्रोन कैमरे की निगहबानी में होंगे सभी
छठ पूजा समिति के अध्यक्ष कमलेश सिंह, महामंत्री अजय कुमार और मीडिया प्रभारी आशीष कुमार, कोषाध्यक्ष अमित कुमार ,कार्यकारी अध्यक्ष गणेश प्रसाद ने बताया कि सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जा रहे हैं। सभी श्रद्धालुओं और परिजनों को पास जारी किए जाएंगे। बिना पास किसी को भी पूजा स्थल तक आने की अनुमति नहीं होगी। सरोवर की निगरानी ड्रोन कैमरे से होगी। चारो तरफ 12 फिट की चार एलईडी लगाई जाएगी। सरोवर पर पूजा के लिए आने वाली व्रती महिलाओं के लिए 16 चेंजिंग रूम बनाये जाएंगे। पूरे सरोवर को झालरों से सजाया जाएगा। व्रती महिलाओं और उनके परिजनों के विश्राम के लिए विश्राम घर बनाया जाएगा।और उसमें रजाई गद्दे की व्यवस्था समिति की तरफ से निःशुल्क होगी। अर्घ्य देने के लिए निःशुल्क दूध की व्यवस्था की गई है। अमरेश मिश्र की तरफ से सभी लोगो को निःशुल्क चाय की व्यवस्था की गई है। मुख्य अतिथि देवेंद्र सिंह जंगपांगी प्रमुख मुख्य सामग्री प्रबंधक डीरेका होंगे। सरोवर पर मुख्य कार्यक्रम 2 नवंबर को और समापन 3 नवंबर की सुबह होगा।
दीपावली के छठें दिन मनाया जाता है यह महापर्व
बता दें कि कार्तिक कृष्ण पक्ष की अमावष्या यानी दीपावली के छठवें दिन मनाया जाता है यह महालोक पर्व। हालांकि इसकी शुरूआत कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से ही हो जाती है और इस महा पर्व का उद्यापन यानी पूर्णाहुति सप्तमी तिथि को होती है। भारतीय परंपरा में इस महा पर्व अनुष्ठान को सबसे कठिन व सर्व सिद्धि कारक माना जाता है।
वैज्ञानिक और ज्योतिषीय दृष्टि से है खास महत्व
वैज्ञानिक और ज्योतिषीय दृष्टि से भी इस छठ पर्व का बड़ा महत्व है। कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि एक विशेष खगोलीय अवसर है, जिस समय सूर्य धरती के दक्षिणी गोलार्ध में स्थित रहता है। इस दौरान सूर्य की पराबैंगनी किरणें पृथ्वी पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्रित हो जाती है। इन हानिकारक किरणों का सीधा असर लोगों की आंख, पेट व त्वचा पर पड़ता है। छठ पर्व पर सूर्य देव की उपासना व अर्घ्य देने से पराबैंगनी किरणें मनुष्य को हानि न पहुंचाए, इस वजह से सूर्य पूजा का महत्व बढ़ जाता है।
धार्मिक और सांस्कृतिक आस्था का है लोकपर्व
छठ पूजा धार्मिक और सांस्कृतिक आस्था का लोकपर्व है। यही एक मात्र ऐसा त्यौहार है जिसमें सूर्य देव का पूजन कर उन्हें अर्घ्य दिया जाता है। वैसे भी हिन्दू धर्म में सूर्य की उपासना का विशेष महत्व है। वे ही एक मात्र प्रत्यक्ष देवता है। वेदों में सूर्य देव को जगत की आत्मा कहा गया है। सूर्य के प्रकाश में कई रोगों को नष्ट करने की क्षमता पाई जाती है। सूर्य के शुभ प्रभाव से व्यक्ति को आरोग्य, तेज और आत्मविश्वास की प्राप्ति होती है। वैदिक ज्योतिष में सूर्य को आत्मा, पिता, पूर्वज, मान-सम्मान और उच्च सरकारी सेवा का कारक कहा गया है। छठ पूजा पर सूर्य देव और छठी माता के पूजन से व्यक्ति को संतान, सुख और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। सांस्कृतिक रूप से छठ पर्व की सबसे बड़ी विशेषता है इस पर्व की सादगी, पवित्रता और प्रकृति के प्रति प्रेम।
डाला छठ पर सूर्य देव और छठी मैया की पूजा का विधान
छठ पूजा में सूर्य देव की पूजा की जाती है और उन्हें अर्घ्य दिया जाता है। सूर्य प्रत्यक्ष रूप में दिखाई देने वाले देवता है, जो पृथ्वी पर सभी प्राणियों के जीवन का आधार हैं। सूर्य देव के साथ-साथ छठ पर छठी मैया की पूजा का भी विधान है। पौराणिक मान्यता के अनुसार छठी मैया या षष्ठी माता संतानों की रक्षा करती हैं और उन्हें दीर्घायु प्रदान करती हैं।
शास्त्रों में षष्ठी देवी को ब्रह्मा जी की मानस पुत्री भी कहा गया है। पुराणों में इन्हें मां कात्यायनी भी बताया गया है, जिनकी पूजा नवरात्रि में षष्ठी तिथि पर होती है। षष्ठी देवी को ही बिहार-झारखंड में स्थानीय भाषा में छठ मैया कहा गया है।
छठ पूजा चार दिनों तक चलने वाला लोक पर्व है जिसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से होती है और कार्तिक शुक्ल सप्तमी को इस पर्व का समापन होता है।
नहाय खाय से होती शुरूआत
छठ पूजा की शुरूात नहाय खाय से होती है। इसका तात्पर्य है पहले दिन यानी चतुर्थी तिथि को स्नान के बाद घर की साफ-सफाई की जाती है और मन को तामसिक प्रवृत्ति से बचाने के लिए शाकाहारी भोजन किया जाता है।
खरना से शुरू होगा निराजल व्रत, दिया जाएगा चंद्र देव को अर्ध्य
छठ पूजा का दूसरा दिन होता है खरना। खरना का मतलब पूरे दिन के उपवास से है। इस दिन व्रत रखने वाला व्यक्ति जल की एक बूंद तक ग्रहण नहीं करता है। संध्या के समय चंद्रमा को अर्घ्यदान के पश्चात गुड़ की खीर, घी लगी हुई रोटी और फलों का सेवन करते हैं। साथ ही घर के बाकि सदस्यों को इसे प्रसाद के तौर पर दिया जाता है। यह क्रिया 1 नवंबर को पूरी की जाएगी।
डूबते सूर्य को पहला अर्घ्य दान
छठ पर्व के तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को संध्या के समय ढलते सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है। शाम को बांस की टोकरी में फल, ठेकुआ, चावल के लड्डू आदि से अर्घ्य का सूप सजाया जाता है, जिसके बाद व्रती अपने परिवार के साथ सूर्य को अर्घ्य देते या देती हैं। अर्घ्य के समय सूर्य देव को जल और दूध चढ़ाया जाता है और प्रसाद भरे सूप से छठी मैया की पूजा की जाती है। सूर्य देव की उपासना के बाद रात्रि में छठी माता के गीत गाए जाते हैं और व्रत कथा सुनी जाती है। यह क्रिया 2 नवंबर को होगी।
उगते सूर्य को अर्घ्य संग पूर्णाहुति
छठ पर्व के अंतिम दिन सुबह के समय उगते सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है। इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले नदी के घाट पर पहुंचकर उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। इसके बाद छठ माता से संतान की रक्षा और पूरे परिवार की सुख शांति का वर मांगा जाता है। पूजा के बाद व्रती कच्चे दूध का शरबत पीकर और थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत को पूरा करते हैं, जिसे पारण या परना कहा जाता है। यह क्रिया 3 नवंबर को होगी।
पूजा सामग्री
- बांस की 3 बड़ी टोकरी, बांस या पीतल के बने 3 सूप, थाली, दूध और ग्लास या लुटिया
-चावल, लाल सिंदूर, दीपक, नारियल, हल्दी, गन्ना, सुथनी, सब्जी और शकरकंदी
- नाशपती, बड़ा नींबू, शहद, पान, साबुत सुपारी, कैराव, कपूर, चंदन और मिठाई
- प्रसाद के रूप में ठेकुआ, मालपुआ, खीर-पुड़ी, सूजी का हलवा, चावल के बने लड्डू लें।
अर्घ्य दान की विधि
बांस की टोकरी में रखी जाती है समस्त पूजा सामग्री। सूर्य को अर्घ्य देते समय सारा प्रसाद सूप में रखा जाता है और सूप में ही दीपक जलाया जाता है। फिर नदी में उतरकर सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है।
छठी मैया का महात्म्य
छठ पर्व पर छठी माता की पूजा की जाती है, जिसका उल्लेख ब्रह्मवैवर्त पुराण में भी मिलता है। एक कथा के अनुसार प्रथम मनु स्वायम्भुव के पुत्र राजा प्रियव्रत को कोई संतान नहीं थी। इस वजह से वे दुःखी रहते थे। महर्षि कश्यप ने राजा से पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ करने को कहा। महर्षि की आज्ञा अनुसार राजा ने यज्ञ कराया। इसके बाद महारानी मालिनी ने एक पुत्र को जन्म दिया लेकिन दुर्भाग्य से वह शिशु मृत पैदा हुआ। इस बात से राजा और अन्य परिजन बेहद दुःखी थे। तभी आकाश से एक विमान उतरा जिसमें माता षष्ठी विराजमान थीं। जब राजा ने उनसे प्रार्थना कि, तब उन्होंने अपना परिचय देते हुए कहा कि- मैं ब्रह्मा की मानस पुत्री षष्ठी देवी हूं। मैं विश्व के सभी बालकों की रक्षा करती हूं और निःसंतानों को संतान प्राप्ति का वरदान देती हूं।
इसके बाद देवी ने मृत शिशु को आशीष देते हुए हाथ लगाया, जिससे वह जीवित हो गया। देवी की इस कृपा से राजा बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने षष्ठी देवी की आराधना की। ऐसी मान्यता है कि इसके बाद ही धीरे-धीरे हर ओर इस पूजा का प्रसार हो गया।
छठ पूजाः अर्घ्य दान का शुभ मुहूर्त
2 नवंबर- (संध्या अर्घ्य) सूर्यास्त का समय :17:35:42
3 नवंबर- उषा अर्घ्य सूर्योदय का समय :06:34:11
Published on:
29 Oct 2019 01:56 pm
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