
छठ पूजा पर अर्घ्य दान करती व्रती (फाइल फोटो)
वाराणसी. सूर्योपासना का महापर्व सूर्य षष्ठी व्रत अनुष्ठान या पारंपरिक भाषा में डाला छठ की शुरूआत गुरुवार 31 अक्टूबर 2019 से हो गई। इस चार दिवसीय छठ पूजा के महात्म्य और इसके इतिहास (Chhath Puja 2019 Significance and History)को जाने बगैर कोई भी इसे समझ नहीं सकता। आम बोलचाल की भाषा में लोग इसे बिहार का पर्व घोषित कर देते हैं, लेकिन ऐसा है नहीं, यह महापर्व आदि काल से मनाया जाता रहा है। अब तो यह पर्व पूरी दुनिया में मनाया जाने लगा है। इसका उल्लेख रामायण और महाभारत काल में भी आता है। पूरी तरह से यह प्रत्यक्ष देव सूर्य नारायण की पूजा है। खास बात यह कि इसमें अगर छठी मैया से संतान की कामना की जाती है तो उसमें लड़का या लड़की का कोई भेद नहीं होता। प्राचीन भारतीय परंपरा के तहत मांग संतति की होती वो चाहे जो हो। इस अनुष्ठान के लिए सबसे जरूरी है स्वच्छता जो मनसा, वाचा और कर्मणा होनी चाहिए। इस महापर्व के लिए तमाम पारंपरिक गीत प्रचलित हैं जो अब घर-घर गूंजने लगे हैं।
विभिन्न धार्मिक पुस्तकों में इस छठ पर्व की लेकर मान्यता और इतिहास का बखान मिलता है। कहा तो यहां तक जाता है कि व्रती जन के साथ पूरा परिवार या यूं कहें कि पूरा कुटुंब ही इस महापर्व की तैयारी में महीना भर पहले से ही जुट जाता है। खेतों से बांस की कटाई, ताकि बहंगी बनाई जा सके। इस बहंगी पर ही पूजन सामग्री रख कर व्रती और परिजन घर से घाट तक जाते रहे हैं। स्वच्छता की जहां तक बात है तो घर-द्वार तो साफ होता ही रहा है, द्वार से घाट तक के रास्ते की भी सफाई की जाती रही है।
लोकआस्था के इस पर्व में लोकगीतों का विशेष महत्व है। लोक गीतों के माध्यम से ही महापर्व का बखान कर दिया जाता है। ऐसे में छठ महापर्व को लेकर ये पारंपरिक गीत अब घर-घर गूंजने लगे हैं। छठ व्रती इन छठ गीतों को गाते हुए ही गंगा घाटों पर अर्घ्य देने जाएंगे...
छठ महापर्व के पारंपरिक गीत
'दर्शन देहू न अपार हे दीनानाथ..'
'उगऽ हे सूरजदेव अरघ के बेरिया...'
'मरबो रे सुगवा धनुष सेकांचही बांस के बहंगिया...'
'महिमा बा अगम अपार हे छठ मइया...'
'केलवा जे फरेले घवद से वोह पर सुगा मड़राए...’
'कांच ही बांस के बहंगिया बहंगी लचकत जाए...'
'होख न सुरुज देव सहइया बहंगी घाट पहुंचाए... ’
'बाबा कांचे-कांचे बंसवा कटाई दीह फरा फराई दीह... ’
छठ पूजा महापर्व का इतिहास और महत्व
पुराणों व धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक सूर्योपासना ऋग वैदिक काल से होती आ रही है। सूर्य और इसकी आराधऩा का उल्लेख विष्णु पुराण, भगवत पुराण, ब्रह्म वैवर्त पुराण में मिलता है।
क्या है मान्यता
ऐसी मान्यता है कि भगवान राम जब माता सीता से स्वयंवर करके घर लौटे थे और उनका राज्य अभिषेक किया गया था तब उन्होंने पूरे विधान के साथ कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को परिवार के साथ पूजा की थी। माना यह भी जाता है कि छठ मइया का व्रत रखने पर निसंतान जोड़े को भी संतान प्राप्त हो जाती है। छठी मइया का व्रत रखने से सूर्य भगवान प्रसन्न होते हैं।
कहा यह भी जाता है कि लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी यानी छठ के दिन भगवान राम और माता सीता ने व्रत किया था और सूर्यदेव की आराधना की थी। सप्तमी को सूर्योदय के समय फिर से अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था।
कथा यह भी है कि पांडव जब जुए में अपना सारा राज-पाट हार गए, तब पांडवों की दीन दशा देखकर द्रौपदी ने छठ का व्रत किया था। इस व्रत के बाद दौपद्री की सभी मनोकामनाएं पूरी हुई और तभी से इस व्रत को करने की प्रथा चली आ रही है।
छठ पूजा के लिए नहीं है पुरुष व स्त्री का भेद
परंपरा के अनुसार छठ पर्व के व्रत को स्त्री और पुरुष समान रूप से रख सकते हैं। छठ पूजा की परंपरा और उसके महत्व का प्रतिपादन करने वाली पौराणिक और लोककथाओं के अनुसार यह पर्व सर्वाधिक शुद्धता और पवित्रता का पर्व है।
क्यों की जाती है उगते और डूबते सूर्य की पूजा
मान्यता है कि सूर्य देव की शक्तियों का मुख्य आधर उनकी पत्नी ऊषा और प्रत्यूषा हैं। छठ में सूर्य के साथ-साथ दोनों शक्तियों की भी आराधना की जाती है। शाम के अर्ध्य में सूर्य की अंतिम किरण यानी प्रत्यूषा और सुबह के अर्ध्य में सूर्य की पहली किरण यानी ऊषा को अर्ध्य देकर दोनों से प्रार्थना की जाती है।
क्या होता है नहाय खाय
छठ पूजा पर्व चार दिनों तक चलती है। यह पर्व नहाय खाय से शुरू होता है। नहाय खाय के दिन व्रत करने वाले लोग गंगा स्नान करते हैं और इसके बाद सेंधा नमक में पका दाल-चावल और कद्दू खाते हैं। व्रती बस एक वक्त का खाना खाते हैं।
खरना में रखें इस बात का खास ध्यान
छठ पूजा के दूसरे दिन व्रती दिन भर निराजल (बिना पानी के) व्रत रखते हैं। शाम को चंद्रमा को अर्घ्यदान करने के बाद गुड़ से बनी खीर और घी में चुपड़ी रोटी का प्रसाद ग्रहण करते हैं। इस दिन पास-पड़ोस के लोगों को भी बुलाया जाता है और प्रसाद बांटा जाता है।
चार दिवसीय महापर्व के तीसरे दिन ढलते सूर्य को अर्घ्य
चार दिवसीय महापर्व के तीसरे दिन यानी कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि को व्रती दिन भर निराजल व्रत रहते हैं। घर में विविध पकवान बनाए जाते हैं। इसमें ठेकुआ खास होता है जो शुद्ध आंटे से विशेष सांचे में बनाया जाता है। फिर ठेकुआ, गागल (बड़ा नीबू), शरीफा, अनानास, कन्ना, सिंघाड़ा, नारियल, कच्ची हल्दी, मूली, सेब, संतरा, नाशपाती आदि को धो कर स्वच्छ कर सूप (बांस या पीतल का) में सजाया जाता है। इसमें नारियल जरूरी है। सूप में जलता दीपक भी रखा जाता है। फिर व्रती स्नान आदि से निवृत्त हो कर स्वच्छ वस्त्र धारण कर नदी या सरोवर में कमर तक खड़े हो कर सूर्य नारायण के 12 नाम का उच्चारण करते हुए कच्चा दूध और जल से अर्घ्य देते हैं। अर्घ्य दान के बाद आरती उतारी जाती है।
सूर्य देव की आरती उतारने के बाद व्रती के परिवार के लोग पूजन सामग्री को बांस के बने दउरा में रख कर, छठी मैया का गीत गाते हुए घर लौटते हैं। रात भर भजन-कीर्तन, गीत गवनई होती है।
पुनः सप्तमी तिथि की सुबह वो सारी प्रक्रिया अपनाई जाती है और उगते सूर्य को अर्घ्यदान के साथ चार दिवसीय छठ पूजा की पूर्णाहुति होती है। पूर्णाहुति के पश्चात इसका प्रसाद खुद ग्रहण कर व्रत का पारण किया जाता है। उसके साथ ही इसे भाई-बंधु, नाते रिश्तेदार, मित्रों के बीच वितरित किया जाता है। यहां तक पशु-पक्षियों के निमित्त भी प्रसाद निकाला जाता है।
काशी के नामचीन ज्योतिषाचार्य डॉ वेदमूर्ति शास्त्री के अनुसार पंचमी से लेकर लेकर सप्तमी तिथि तक छठ व्रती इन शुभ मुहूर्त में देंगे अर्घ्य...
वाराणसी में अर्घ्य दान का शुभ मुहूर्त
चंद्रोदय शुक्रवार- 10.07
सूर्यास्त शनिवार सायं-05.32
सूर्योदय रविवार प्रातः 06.29
Published on:
31 Oct 2019 01:48 pm
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